शनिवार, 12 सितंबर 2015

           
कहानी

मेरे दूसरे कहानी संग्रह  'उजाले दूर नहीं ' में से एक कहानी  यहाँ प्रस्तुत है .यह कहानी 1998 में मनोरमा पत्रिका में प्रकाशित हुई थी  

                               छल
                                                   
                                                   पवित्रा अग्रवाल

 "दीदी मेरी एक सहेली मुसीबत में है। असल में वह एक धोखे का शिकार हो गई है। आपसे कुछ सलाह-मशवरा करना चाहती है। आपसे बिना पूछे ही मैंने उसे यहाँ आने को कह दिया है। मैंने कुछ गलत तो नहीं किया दीदी ? "
 "नहीं अनु, तुमने कुछ गलत नहीं किया है। कब आएगी वो ? उसके साथ क्या धोखा हुआ है  ? उस विषय में तुम मुझे कुछ बता सकोगी ?"
 "हाँ, दीदी .. जो थोड़ा-बहुत मुझे ज्ञात है वह मैं आपको बता देती हूँ। मेरी उस सहेली का नाम सुरभि है। उसने मेरे साथ ही इंटर पास किया है। उम्र यही अठारह साल के आसपास है। वह छह बहनें हैं, भाई एक भी नहीं है। बहनों में उसका नंबर चौथा है।"
 "दो वर्ष पूर्व उसकी सबसे बड़ी बहन पूनम, जो शादीशुदा थी, की मौत हो गई थी। अभी ढ़ाई महीने पहले अपने उसी बहन के पति भीष्म से सुरभि का विवाह हुआ है। सुरभि के दूसरे नंबर की बहन नीलम की शादी में उसके ये जीजा जी आए थे। नीलम के विदा हो जाने के बाद वह अपनी पत्नी पूनम को याद करके बहुत रोये और सुरभि के पिता से अनुरोध किया कि सुरभि की सूरत मेरी पत्नी पूनम से बहुत मिलती है। मैं उसे भुला नहीं पाया। मैं पूनम को बहुत प्यार करता था। मैं सुरभि से शादी करना चाहता हूँ।"
 "सुरभि के पिता तैयार नहीं थे। उनका कहना था कि सुरभि से बड़ी एक बहन अभी अविवाहित है। उससे पहले वे सुरभि की शादी नहीं कर सकते। हाँ सुरभि की बड़ी बहन से शादी करना चाहो तो विचार किया जा सकता है।"
      "लेकिन उसके जीजा भीष्म ने सुरभि की बड़ी बहन से शादी करने से इन्कार कर दिया और वे सुरभि से ही शादी करने की जिद्द करने लगे। उन्होंने कहा, सुरभि की बड़ी बहन की शादी में मैं धन से आपकी मदद करूँगा क्योंकि दामाद भी बेटे की तरह ही होता है। उसके लिए अच्छा मैच भी बताऊँगा। अब मैं और अकेला नहीं रह सकता। सुरभि से शादी करके अब अपने साथ ही ले जाऊँगा।"
      "सुरभि के पिता ने शादी में आए रिश्तेदारों से सलाह-मशवरा किया। सभी ने यही सलाह दी कि जाना-पहचाना लड़का है। जमीन-जायदाद है, अच्छी नौकरी में है। मौका हाथ से मत जाने दो। उम्र भी अधिक नहीं है सुरभि से आठ-नौ वर्ष बड़ा होगा बस। यह शादी करके एक और बेटी की जिम्मेदारी से निबट जाओगे। सुरभि को भी सभी ने यही समझाया कि तुम्हारे पिता का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता । तेरे अतिरिक्त अभी तीन लड़कियों की शादी और करनी है। पता नहीं कब और कैसे कर पाएँगे। तू भाग्यशाली है, तुझे तो माँग कर ले रहा है।"
    "पिता ने शादी की स्वीकृति देते हुए दो-तीन सप्ताह का समय माँगा था ताकि कुछ पैसे का इंतजाम कर सके किंतु वह नहीं माना। उसने कहा, "भगवान की कृपा से मेरे पास सब कुछ है। मुझे सुरभि के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहिए। उसने जबर्दस्ती दस हजार रुपये सुरभि के पिता के हाथ में रख दिये कि तैयारी में ये रुपये खर्च कर लें।'
 "इस तरह दूसरे दिन ही सुरभि की शादी हो गई। शादी के बाद वह सुरभि को लेकर घूमने चला गया। बीस-पच्चीस दिन सुरभि के साथ हनीमून मना कर वह दो दिन के लिए अपनी पोस्टिंग  वाली जगह भी गया फिर सुरभि को यहाँ छोड़ गया। तब से सुरभि यहीं पर  है। उसने पत्र में लिखा था कि उसका स्थनांतरण होने वाला है। तब लेने आएगा।'
 "तो अब समस्या क्या है अनु ?"
      "दीदी, अभी सुनने में आया है कि सुरभि से शादी करने के पन्द्रह दिन पहले भी उसने एक और शादी की थी। पता नहीं क्यों वह उस पत्नी के साथ एक दिन भी नहीं रहा और अब उससे तलाक लेने की कोशिश कर रहा है। यद्यपि यह बात उसने स्वयं न सुरभि को बताई न उसके घर वालों को।"
    तभी अनु की सहेली सुरभि आ गई थी । बहुत उदास थी। उसकी आखें रो-रोकर सूज गई थीं। मैंने उसे पास बैठा कर समझाया था कि "परेशान मत हो, हर समस्या का हल होता है। इसका समाधान जरूर होगा। मुझे विस्तार से पूरी बात बताओ। तुम्हें यह कैसे ज्ञात हुआ कि तुम्हारे पति ने तुम से पहले भी एक शादी की है।"
     "मेरे पति आदम पुर में हैं। वह एयरफोर्स में हैं। अभी चार-पाँच दिन पहले की बात है कि मेरी छोटी बहन, जो दसवीं कक्षा में पढ़ती है, अपनी एक सहेली से बात कर रही थी। बातों के दौरान उसने कहा, "मेरी जीजा जी आदमपुर में रहते हैं।"
 मेरी बहन ने कहा, "हमारे जीजा जी भी आदमपुर में रहते हैं।"
 उसने बताया, "वह एयरफोर्स में हैं, उनका नाम भी भीष्म सिंह है"।'
        मेरी बहन ने यह बात घर आकर बताई तो हम लोग चौंके कि कहीं ये दोनों व्यक्ति एक ही तो नहीं हैं।"
     "मेरे पिता उस लड़की के घर गये। उसके पिता ने बताया कि मेरी भतीजी की शादी करीब तीन महीने पूर्व हुई है। उसका पति भीष्म एयरफोर्स में है और आजकल आदमपुर में है। फोटो देख कर बोले कि हाँ इसी से मेरी भतीजी की शादी हुई है। शादी के दूसरे दिन ही उसने मेरी भतीजी को वापस भेज दिया और अब वह तलाक चाहता है। यह सब समाचार मुझे भाई के पत्र से ज्ञात हुए हैं। भतीजी की शादी के बाद से मेरी मुलाकात भाई से नहीं हुई है। अत: डिटेल में मुझे जानकारी नहीं है। यदि उसी लड़के ने पुन: आपकी बेटी से भी शादी की है तो यह तो सरासर धोखा है। सरकारी नौकरी में है। इस धोखाधड़ी के जुर्म में उसकी नौकरी तो जायेगी ही, उसे जेल भी हो सकती है। उसे सजा मिलनी चाहिए। मैं अपने भाई को यहाँ बुलाता हूँ। आप दोनों मिल कर उस पर केस कर दें तो उसकी तो ऐसी की तैसी हो जाएगी।"
      "दीदी, हमारे घर में मातम का सा माहौल है। इधर ज्ञात हुआ कि मैं माँ बनने वाली हूँ। क्या करूँ, कुछ भी समझ में नहीं आता। मेरी जिंदगी तो उसने बरबाद कर दी है। मन होता है आत्महत्या कर लूँ।" वह सुबक-सुबक कर रोने लगी थी।
     मैंने उसे सांत्वना देने का प्रयास किया और पूछा, "अब तुम और तुम्हारे पिताजी क्या करना चाहते हैं ?'
    "पिताजी उस पर कोर्ट केस करना चाहते हैं। उन्होने वकील से नोटिस भिजवाया है। वह आजकल में आता ही होगा।"
    मैंने सुरभि से कहा, "उसके आने पर हो सके तो एक बार मेरे पास लेकर आना। पता तो चले कि उसने ऐसा क्यों किया और अब वह क्या चाहता है। तभी आगे के विषय में कुछ निर्णय लिया जा सकेगा।"
    दूसरे दिन ही सुरभि अपने माता"पिता के साथ मेरे पास आई थी। उन्हीं से पता चला कि भीष्म सिंह भी आया हुआ है।
  मैंने उनसे पूछा, "वह चाहता क्या है ? और उसने आपके साथ ये धोखा  क्यों किया ?'
   "जब से वह आया है बस रो रहा है। कहता है मैंने आपके साथ कोई धोखा नहीं किया। सुरभि मेरी पत्नी है और जिंदगी भर मेरे साथ रहेगी। मैं उसे बहुत प्यार करता हूँ, उसे पूरे सम्मान के साथ रखूँगा।"
    पहली शादी के विषय में कहता, "हाँ मैंने वो शादी की थी। किंतु लड़की वालों ने मेरे साथ धोखा किया है। उस लड़की के शरीर पर व पैरों पर सफेद दाग हैं, जो कपड़ों में ढके रहते हैं, ऊपर से दिखाई नहीं देते। उन्होंने पहले बता दिया होता तो मैं वह शादी नहीं करता। मैंने उस लड़की को छुआ तक नहीं है, दूसरे दिन ही वापस भेज दिया दिया था। अब वह लोग फोन पर धमकी दे रहे हैं कि लड़की को साथ रखो वर्ना दहेज के लालच में लड़की को सताने और वापस भेज देने के जुर्म में सजा कराएँगे। चाहे वे मेरी जान ले लें लेकिन मैं उस लड़की के साथ नहीं रह सकता।"
    "उसका कहना है कि सुरभि की बहन नीलम की शादी में सुरभि को देख कर मुझे अपनी पत्नी पूनम की याद आ गई और तभी सुरभि से शादी करने का ख्याल मन में आया और मैंने आपके आगे अपनी इच्छा जाहिर कर दी। यदि मैं शादी की बात बता देता तो आप सुरभि की शादी मुझसे नहीं करते। हाँ, ये मेरी गलती है। आप जो चाहें सजा मुझे दे लें। मुझे मंजूर होगी।"
    सुरभि के पिता ने सब बातें विस्तार से बताते हुए मुझसे पूछा, "बेटी, अब तुम बताओ, हमें क्या करना चाहिए।"
      मैंने कहा, "अंकल मैं जानना चाहती हूँ कि आप क्या चाहते हैं ?...उससे समझौता करना चाहते हैं या उसे सजा दिलाना चाहते हैं ?'
   "यों तो भीष्म ने हमारे साथ सरासर धोखा किया है .. हमारी बेटी की जिंदगी के साथ खिलवाड़ किया है फिर भी हम यदि उस पर मुकदमा दायर करते हैं तो उस के साथ-साथ हमारी बेटी की जिंदगी भी बरबाद हो जाएगी। अभी वह इतनी पढ़ी-लिखी नहीं है कि अपने पैरों पर खड़ी हो सके। साथ ही वह माँ भी बनने वाली है। हम इतने समृद्ध नहीं हैं कि बेटी को इतना कुछ दे दें कि वह आसानी से जीवन निर्वाह कर सके। मैं तो अपनी तीन कुँवारी बेटियों की ही शादी नहीं कर पा रहा, उसकी दूसरी शादी कैसे कर पाऊँगा। कोर्ट केस करो भी तो बरसों लग जाएँगे और पैसा भी पानी की तरह बहेगा, जो हमारे पास नहीं है। यदि हम केस जीत गये और उसे सजा भी करा दी तब भी मेरी बेटी की जिंदगी की कोई समस्या हल नहीं होगी। अभी तो वह माफी माँग रहा है। मेरी बेटी को अपने साथ रखना चाहता है। उसकी एक यही विनती है कि पहले पक्ष के साथ मिलकर हम उसके विरुद्ध खड़े न हों और कोर्ट में ये गवाही भी न दें कि उसने हमारी बेटी से शादी की है क्योंकि पहले पक्ष का साथ देने का मतलब उसकी सजा निश्चित है।"
     "अपनी बेटी के हित को ध्यान रख कर हमने भी यही फैसला किया है कि हम भीष्म के विरुद्ध न जाएँ। बेटी क्या हम कुछ गलत सोच रहे हैं ?"
     "नहीं अंकल, आप जिन परिस्थितियों में हैं उनमें आपका यह निर्णय गलत नहीं है फिर भी मैं चाहती हूँ कि आप अपने दामाद भीष्म सिंह से मेरी एक मुलाकात करा दें।"
    सुरभि के माता-पिता के जाते ही मेरी छोटी बहन अनु मुझ पर बरस पड़ी, "वाह दीदी, आप तो नारी स्वतंत्रता, नारी न्याय की बड़ी-बड़ी बातें करती व सोचती हैं। यह तो उस धोखेबाज के सामने हथियार डालना हुआ। उसके किए की सजा उसे कहाँ मिली ? उसे तो जेल की सजा होनी चाहिए यदि आपके साथ या मेरे साथ ऐसा होता, तब भी आप यही निर्णय लेती ?'
     "देखो, अनु कोई भी निर्णय व्यक्ति विशेष की परिस्थितियों के हिसाब से लिया जाता है। मेरे साथ यदि ऐसा होता तो मेरा फैसला यह नहीं होता। मैं अपने पैरों पर खड़ी हूँ, पढ़ी-लिखी हूँ, बोल्ड हूँ। वैसे भी सुरभि के पिता को मैंने कोई सलाह नहीं दी है। यह उनका अपना फैसला है किंतु मुझे उनके इस फैसले में कोई बुराई नजर नहीं आई, बशर्ते भीष्म की नीयत में खोट न हो।"
 शाम को सुरभि भीष्म के साथ आई थी।
  आते ही भीष्म ने कहा था, "सुरभि आपको दीदी कहती है। क्या मैं भी आपको दीदी कह सकता हूँ ?'
 "हाँ, क्यों नहीं।"
 "दीदी, इस सुरभि को समझाए। आपको तो पता होगा कि यह माँ बनने वाली हैं किंतु यह इस गर्भ को समाप्त कर देना चाहती है, कहती है "मुझे तुम जैसे धोखेबाज के साथ जीवन नहीं बिताना है.. मुझे अपनी जिंदगी अकेले ही काटनी है... इसके लिए मुझे आत्मनिर्भर बनना होगा, पढ़ना होगा। यह बच्चा मेरे पैरों की बेड़ी बन जाएगा।'
     "हाँ, दीदी, मैंने कुछ गलत नहीं कहा। वैसे भी बच्चा पति-पत्नी के प्रेम की निशानी होता है। लेकिन हमारे विवाह का आधार प्यार नहीं छल है। मैं इस बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती और न ही  इनके साथ रहना चाहती हूँ।उस लड़की के परिवार ने इनके साथ धोखा किया इसलिए इन्होंने उनकी लड़की को त्याग दिया। इन्होंने मेरे साथ धोखा किया है इसलिए मैं इनका त्याग करती हूँ। ये मेरी प्रिय बहन के पति रहे हैं बस, इस नाते इनको अपनी तरफ से यह सहयोग दे सकती हूँ कि हम इनके खिलाफ कोर्ट में खड़े नहीं होंगे किंतु दूसरी पार्टी बहुत संपन्न है, इनको सजा कराके रहेगी। इस धोखेबाज को सजा मिलनी ही चाहिए।'  कह कर सुरभि रोती हुई वहाँ से उठ कर चली गई।
      मेरे पूछने पर भीष्म सिंह ने कहा, "दीदी, मैं कोई क्रिमिनल नहीं हूँ, जिसका एक के बाद एक शादी करते जाना शौक हो। हाँ, मैंने एक सच को छिपा कर बहुत बड़ा अपराध किया है। यद्यपि उसके पीछे भी मेरा सुरभि के प्रति प्यार ही था। मैं बता देता तो सुरभि को नहीं पा सकता था। अभी तो यह मुझसे बहुत नाराज है। यद्यपि इसकी नाराजगी सही है। अभी मैं जा रहा हूँ, उधर का केस सुलझते ही फिर आऊँगा। आपसे एक निवेदन है, किसी तरह समझा-बुझाकर सुरभि को गर्भपात कराने से रोक लें।...आपका अहसान जीवन भर नहीं भूलूँगा। उसके माता-पिता ने तो मुझे माफ़ कर दिया है।"
     भीष्म सिंह तो वापस लौट गया था। सुरभि को मैंने समझाया था कि गर्भपात भी हत्या ही है। तुम बच्चे को जन्म दो, यदि तुम उसे साथ नहीं रखना चाहोगी तो मेरे भाई-भाभी को दे देना। उनके कोई संतान नहीं है, वह उसे गोद ले लेंगे।...बहुत समझाने पर वह मान गई थी किंतु वह अपने फैसले पर अटल थी कि भीष्म के साथ नहीं रहेगी।
     एक दिन सुरभि ने बताया कि पुलिस ने दहेज के लिए पत्नी को छोड़ने व सताने के आरोप में भीष्म सिंह को गिरफ्तार  कर लिया है।
 इस समाचार के सात-आठ दिन बाद ही एक दिन अचानक भीष्म सिंह सुबह-सुबह मेरे घर आ पहुँचा, "दीदी स्टेशन से सीधे आपके पास आ रहा हूँ। सुरभि या उसके घर वालों को तो मेरे यहाँ आने के विषय में कुछ नहीं पता है।"
    पूछने पर उसने बताया कि पुलिस तो उसे गिरफ्तार करके ले गई थी। उस लड़की के घर वाले  मेरे पीछे पड़े थे किंतु उस लड़की ने मुझे मुक्त करा दिया। उसने साफ कह दिया कि मुझे दहेज के लिए नहीं सताया गया। मेरे माता-पिता ने एक सच को छिपाया था। मुझसे तो कहा था कि सफेद दाग होने की बात लड़के को बता दी गई है, जबकि इनको नहीं बताई गई थी। मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है। मैं तो शादी करना ही नहीं चाहती थी क्योंकि मैं जानती थी कि उसका अंत ऐसा ही कुछ होगा।'
 "आपसी सहमति से हमारा तलाक हो गया है।...यहाँ सुरभि के माता-पिता तो मुझे माफ कर चुके हैं किंतु सुरभि मुझसे नफरत करती है।'
   बहुत-सी बातें वह मुझसे करता रहा फिर सुरभि के घर चला गया। शाम को वह पुन: आया था।.. बहुत निराश दिख रहा था। उसने बताया "माता-पिता के समझाने का भी सुरभि पर कोई असर नहीं हो रहा। कहती है, "जबर्दस्ती इनके साथ भेजोगे तो आत्महत्या कर लूँगी।'
   सोचता हूँ आज वापस लौट जाऊँ।'
    थोड़ी देर बाद सुरभि को उसके माता-पिता मेरे पास ले कर आये थे। सुरभि के एक बार फिर धोखेबाज कहने पर भीष्म सिंह तड़प उठा था।
 "इतने दिन से मैं छल और कपट के आरोप सुने जा रहा हूँ। छल मेरे साथ भी किया गया था किंतु मैंने आज तक वह बात कभी नहीं कही।'
  "उस परिवार के अतिरिक्त भी आपसे किसी ने छल किया था ?... किसने दिया था आपको धोखा ?" सुरभि ने पूछा था।
 "तुम्हारे मम्मी-पापा ने भी मेरे साथ धोखा किया था।"
   "मैं नहीं मान सकती। उन्होंने तुम्हारे साथ क्या छल किया है ?"
     "यदि तुम्हारे मम्मी-पापा ने अपनी गलती स्वीकार कर ली तो क्या तुम मुझे क्षमा कर दोगी ?.. मैं तुम्हें बता तो रहा हूँ किंतु तुम यह कभी मत सोचना कि मैं तुम्हें प्यार नहीं करता या तुम्हारे माता-पिता के छल का बदला लेने के लिए मैंने तुम से छल किया है। सच मानों, मैं तुम्हें दिल से प्यार करता हूँ। किसी बदले की भावना से मैंने ये शादी नहीं की है।"
 सब भौंचक्के हो कर भीष्म को देख रहे थे।
 'बेटे, तुम किस छल की बात कर रहे हो ?...हमारी कुछ समझ में नहीं आ रहा।"
   "पापा मैं अभी बताता हूँ, आपकी बड़ी बेटी यानी मेरी पत्नी पूनम को हार्ट डिजीज थी। डॉक्टर ने उसकी शादी न करने की सलाह भी आपको अवश्य दी होगी। लेकिन इस सच्चाई को मुझसे छिपा कर आपने उसकी शादी मुझसे कर दी। क्या मैं गलत कह रहा हूँ ? '
     पापा की नजरें झुक गई थीं, "हाँ बेटे, हार्ट प्राब्लम तो उसको थी किंतु उसकी शादी न करने की सलाह डॉक्टर ने हमें नहीं दी थी।"
     "किंतु पापा आपने हार्ट प्राब्लम होने वाली बात भी हमें नहीं बताई थी। एक तरह से क्या ये छल नहीं है ? ...पहली प्रेगनेन्सी में डिलीवरी के दौरान पूनम की मौत हो गई। हमारी डॉक्टर ने बताया था कि ऐसे केसेज में हम लड़की की शादी न करने की सलाह देते हैं क्योकि मातृत्व की पीड़ा उसके लिए जानलेवा बन सकती है।"
 सुरभि के माता-पिता मौन थे ।
 "अब मुझे कुछ नहीं कहना है। मैं "सवेरा" होटल में ठहरा हूँ। सुरभि, तुम्हारे पास सोचने के लिए रात भर का समय है यदि तुमने मुझे माफ कर दिया है तो सुबह सात बजे तक मुझे खबर भिजवा देना, मैं तुम्हें लेने आ जाऊँगा वर्ना सुबह की ट्रेन से वापस लौट जाऊँगा।'
 सुरभि ने जाते हुए भीष्म का हाथ पकड़ कर उसे रोक लिया था -- "रुक जाओ, मैंने निर्णय ले लिया है.. मैं  तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूँ।"       


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गुरुवार, 13 अगस्त 2015

अधिकार के लिए

  (     मेरे दूसरे  कहानी संग्रह   'उजाले दूर नहीं "  में से एक कहानी )

            यह कहानी करीब  30 वर्ष पूर्व लिखी गई थी  


कहानी

          अधिकार के लिए
                                                                 
                                                                        पवित्रा अग्रवाल

  उत्तर प्रदेश से दूर दक्षिण के इस प्रांत में अचानक मेरी मुलाकात कमलेश से हो जाएगी ऐसा मैंने सोचा भी नहीं था। मैं बस में चढ़ रही थी और कमलेश उसी बस से उतर रही थी। एक-दूसरे से हमारी नजरें मिली, आँखों में कुछ पहचान उभरी और हम एक-दूसरे से लिपट गए थे।
 "अम्माँ आप लोगों को बस में नहीं चढ़ना तो न सही, लेकिन हमें तो बस में चढ़ने को रास्ता दो।'
  तब हमें ध्यान आया कि हम अन्य लोगों का रास्ता रोके खड़े हैं। मैंने पूछा, "कमलेश तू यहाँ कब आई ?'
 "नीरू यही सवाल तो मैं तुझसे भी पूछना चाहती हूँ।'
 "मैं यहाँ तीन वर्ष से हूँ। मेरे पति बैंक में हैं। ट्रान्सफर होकर यहाँ आए हैं।'
 कमलेश ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे बस में चढ़ने से रोक लिया और बोली, "नीरू मेरा घर पास में ही है, तुझे जल्दी न हो तो घर चल, बहुत सी बातें करेंगे।'
 ठीक है कमलेश, मुझे घर जाने की कोई जल्दी नहीं है। इस बहाने तेरा घर भी देख लूँगी। तुझसे मिलकर मुझे कितनी खुशी हुई है यह मैं व्यक्त नहीं कर सकती लेकिन तेरे पति तो व्यापार करते थे। तू इस शहर में कैसे आ गई ?'
 "नीरू ये बहुत लंबी कथा है।....घर चल कर सब बताऊँगी।'
 हम दोनों बातें करते कमलेश के घर तक पहुँच गए। लिफ्ट में प्रवेश करते हुए मैंने कमलेश से पूछा, "तुम कौन से फ्लोर पर रहती हो ? तुम्हारा ये कोम्पलैक्स तो बहुत खूबसूरत बना हुआ है। यहाँ दो बेड रूम फ्लैट का क्या किराया होगा ?'
   "किराया चार हजार के आसपास है। मैं चौथे फ्लोर पर रहती हूँ।' फ्लैट का ताला खोलकर कमलेश ने मुझे अपने सुसज्जित ड्राइंग रूम में बैठाया। मैं अपनी जिज्ञासा और अधिक रोक नहीं पा रही थी।
 मैंने पूछा, "कमलेश तेरी शादी तो रमेश से हुई थी। उन दिनों तेरी शादी ने उस छोटे से कस्बे को हिलाकर रख दिया था। जैसे कोई भूकंप आ गया हो। तूने जो कदम उठाया था वह सबके लिए एक नई बात थी। इतनी हिम्मत तूने कहाँ से जुटाई थी ? तभी तुझ से मिलने को मेरा बहुत मन कर रहा था, लेकिन उन्हीं दिनों पापा का ट्रांसफ़र हो गया था। शादी के समय तो तू गर्भवती थी। क्या हुआ था बेटा या बेटी ?...और वो कहाँ हैं ?...'
 "हाँ तब मेरे बेटी पैदा हुई थी। वह अब दस वर्ष की हैं। उसका नाम सपना है। इस समय वह स्कूल गई हुई है। नीरू बातें तो आराम से होती रहेंगी पहले ये बता गर्म लेगी या ठंडा ?'
 "पहले तो एक गिलास ठंडा पानी पिला दे कमलेश, फिर चाय चलेगी।'
 "पानी का गिलास मुझे देकर कमलेश रसोई में चली गई। मेरा मन अतीत में भटकने लगा था। करीब दस-ग्यारह वर्ष पहले की बात है एक दिन अचानक शहर में तहलका सा मच गया था। भाई ने बाहर से आकर बताया था कि कमलेश नाम की एक लड़की ने चौराहे की एक दुकान पर आमरण अनशन कर दिया है। सुना है दुकान मालिक के बेटे ने मंदिर में उससे शादी की थी और अब जब वह माँ बनने वाली हैं तो उसने उसे पत्नी मानने से इन्कार कर दिया है। उसकी कल शाम को ही किसी सेठ की बेटी से सगाई होने वाली है।
    महिला संस्था की बहुत सी सदस्याएँ वहाँ लड़के के खिलाफ नारे लगा रही हैं। दुकान पर बैनर लगे हैं---
 "मेरे बच्चे को पिता का नाम दिलाओ या यहीं मेरी चिता जलाओ' "पत्नी का अधिकार लेकर रहूँगी'- तब भाई ने ही बताया था कि कमलेश को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी है। पुलिस को स्थिति सँभालनी पड़ी है। पुलिस वहाँ किसी को ठहरने नहीं दे रही। लोग आते जा रहे हैं और आगे बढ़ते जा रहे हैं।
 यह तो मुझे बाद में पता चला था कि ये कमलेश वही है, जो इंटर में मेरी दोस्त थी। कॉलेज में भी वह बहुत उदास रहती थी। अपनी सौतेली माँ द्वारा सताए जाने के किस्से वह अक्सर मुझे सुनाती रहती थी और बहुत बार तो वह रो भी देती थी। देखने में वह सीधी-सादी लड़की थी। मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि कभी वे ऐसा भी कुछ कर सकती है।
    कमलेश द्वारा चाय की ट्रे मेज पर रखने से मैं अतीत से वर्तमान में लौट आई। मेरे मन में कमलेश को लेकर बहुत सी जिज्ञासा थीं, जिनका समाधान मैं कमलेश से चाहती थी। चाय पीते हुए मैं और अधिक सब्र नहीं कर पाई और बातों की धारा उसी तरफ मोड़ते हुए मैंने पूछा, "कमलेश रमेश के क्या हाल हैं, वह कहाँ हैं ?'
  "रमेश को तो मैंने तभी छोड़ दिया था। वह शादी भी कोई शादी थी। वह ज़बरदस्ती की शादी थी। वह लंबी नहीं खिंचेगी यह मैं पहले ही जानती थी किंतु अपने बच्चे को पिता का नाम दिलाने के लिए मुझे मजबूरी में वह सब करना पड़ा था।'
   "कमलेश तू देखने में तो बड़ी डरपोक सी थी। तुझमें इतनी हिम्मत कहाँ से आ गई कि तू दुकान पर भूख हड़ताल करने बैठ गई ?'
 "असल में मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी। इन हालातों में अन्य कुंवारी माँओं की तरह मैं भी नदी में कूद कर जान देने गई थी किंतु मुझे एक महिला ने बचा लिया, उस महिला का नाम रत्ना था। वह किसी सामाजिक संगठन की सदस्या थी। मेरे आत्महत्या का कारण सुनकर वह मुझ पर बिगड़ पड़ी।
 उसने कहा-- "एक गलती पहले कर चुकी हो अब दूसरी करने जा रही हो। गलती सिर्फ तुम्हारी ही नहीं है। प्यार में रमेश ने तुम्हें धोखा दिया है। सजा तुम अकेली क्यों भुगत रही हो। लड़कियों की इसी कायरता से लड़कों को प्रोत्साहन मिलता है। लड़की में जरा भी हिम्मत हो तो वह ऐसे लोगों को सबक सिखा सकती है। एक को सबक सिखाने का मतलब है समाज के अन्य लोगों को भी सबक मिल जाएगा। इसमें सबक लडकों को ही नहीं, लड़कियों को भी मिलेगा ताकि वह ऐसी बेवक़ूफ़ियाँ न करें जिससे बाद में उन्हें शर्मिंदा होना पड़े।'
       "कमलेश रत्ना ने कहा तो ठीक ही था लेकिन एक बात बता प्यार करना गलत नहीं है किंतु प्यार में शादी से पहले सब सीमाएँ तोड़ देना भी तो सही नहीं है ? तू इस हद तक कैसे पहुँच गई कि गर्भवती हो गई ?'
  "नीरू की तो मैंने भी शादी ही थी किंतु मेरी अज्ञानता की वजह से वह शादी एक छलावा सिद्ध हुई। हमने बाकायदा मंदिर में रमेश के तीन दोस्तों के सामने शादी की थी। शादी की सभी रस्में मंदिर के पुजारी ने पूरी की थीं किंतु मेरे पास इसका काई प्रमाण नहीं था। फोटो भी खिंचवा लिया होता तो कुछ तो सबूत होता।'
  "शादी के बाद क्या तुम साथ रहने लगे थे ?'
  "नहीं नीरू शादी के बाद हम साथ नहीं रहे। रमेश का कहना था "मौका देख कर माँ को सब बता दूँगा। तुम तो जानती हो कि मैं पिता के साथ ही बिजनेस करता हूँ यदि उन्होंने घर से निकाल दिया तो मैं सड़क पर आ जाऊँगा।'
  अत: उसने शादी की बात किसी से भी कहने को मुझे मना कर दिया था। कभी-कभी हम उसके एक दोस्त के कमरे पर मिल लेते थे। उसका दोस्त पढ़ने के लिए किराए पर कमरा लेकर वहाँ रहता था।'
  "फिर क्या हुआ ?'
   "जब मुझे माँ बनने की बात का ज्ञान हुआ तो मैंने रमेश को बताया। यह सुनकर वह घबरा गया और बोला, "तू किसी महिला डॉक्टर से बात कर के गर्भपात करा ले, रुपये मैं दे दूँगा।...मेरे घर वालों को यह बात पता नहीं चलनी चाहिए वरना बात बिगड़ जाएगी' लेकिन मैंने रमेश की बात नहीं मानी तो उसने रंग बदल लिया और बोला    - "क्या सबूत है कि मैं ही इस बच्चे का बाप हूँ या मैंने तुझसे शादी की थी ? यदि सबूत है तो लाकर दिखा।'
    "सच नीरू उसका बदला रूप देखकर समझ गई थी कि मैं छली गई हूँ। मन हो रहा था धरती फट जाए और मैं उसमें समा जाऊँ। मैं मंदिर गई तो पुजारी ने पहचान ने से इंकार कर दिया। उसके तीनों दोस्त दूसरी जगह से यहाँ पढ़ने आए हुए थे। छुट्टियों में वे अपने गाँव वापस चले गए थे। मैं अकेली क्या करती ?...कहाँ से सबूत जुटाती ?'
    "कमलेश तेरे घर वालों को जब इस बात का पता चला तो क्या हुआ ?'
 "घरवाले थे ही कौन ? तुझे तो पता है कि माँ बचपन में ही मर गई थी। पिता ने तभी दूसरी शादी कर ली थी। सौतेली माँ ने एक दिन चैन से नहीं जीने दिया। फिर उनके भी दो बेटियाँ और एक बेटा पैदा हो गया। फिर तो मैं उनकी नौकर बन कर रह गई थी। माँ से झगड़ा करके पिता ने मुझे इंटर करवाया था। रोज-रोज के कलह से तंग आकर वह दिल के मरीज बन गए। उन दिनों तो उन्हें पैरालैसिस का अटैक हुआ था और वह बिस्तर पर थे। माँ को जब पता चला तो उन्होंने चोटी पकड़ कर मुझे घर से बाहर निकाल दिया और बोली, "कलमुही अब कभी लौट कर यहाँ मत आना। जरा भी शर्म बाकी है तो नदी में जाकर डूब मरना। मैं अपने बच्चों पर तेरी छाया भी नहीं पड़ने दूँगी।' घर से निकाले जाने पर मैं नदी में कूद कर आत्महत्या करने गई थी, वहाँ रत्ना ने मुझे बचा लिया।'
 "फिर क्या हुआ कमलेश ?'
 "रत्ना के कहने पर मैं रमेश के घर गई तो उसका घर सजाया जा रहा था, मालूम हुआ कि दूसरे दिन रमेश की सगाई है। उसकी माँ को मैंने अपनी व्यथा-कथा सुनाई किंतु उन्होंने मुझे अपमानित करके घर से निकाल दिया। फिर मैं दुकान पर गई, मुझे देखते ही रमेश का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने मुझसे कहा-  "दस-बीस हजार मुझ से लेकर मेरा पीछा छोड़ दो।'
       तभी मैं वहाँ बैठ गई और बोली, "मैं लौटने के लिए यहाँ नहीं आई हूँ, सबके सामने मुझे पत्नी स्वीकार कर वरना तेरी इस दुकान पर बैठ कर अपनी जान दे दूँगी। वह तो दुकान छोड़ कर भाग गया। थोड़ी ही देर बाद रत्ना महिला मंडल की सदस्याओं को लेकर वहाँ आ गई और उन्होंने मेरे पक्ष में रमेश के खिलाफ नारे लगाने प्रारंभ कर दिये।'
         "हाँ, ये तो मुझे मालूम है। सुना था रमेश के ससुराल वाले भी तेरे पास आए थे।'
 " हाँ रमेश के ससुराल वाले मेरे एहसानमंद थे। वो कह रहे थे कि तुम्हारे इस कदम से ही हमारी बेटी की जिंदगी ख़राब होने से बच गई। वरना रमेश के दुष्कर्मों का हमें पता भी नहीं चलता। वह मुझे आश्वासन दे के गए कि हम तेरे साथ हैं। कभी भी किसी मदद की जरूरत हो तो हमें फोन कर देना। रमेश लापता था .मैंने भी मन में ठान ली थी कि या तो जान दे दूँगी या अपना अधिकार लेकर रहूँगी।"
    "हाँ कमलेश इसके बाद की बात तो मुझे मालूम है। शहर के कुछ उत्साही युवक दूसरे दिन रमेश को कहीं से
ढूँढ़ कर लाए थे और चौराहे पर ही विवाह का मंडप तैयार करके जनसमूह के सामने उससे तेरी शादी कराई थी। सुना है उसके पिता ने भी सबके सम्मुख तुझे अपनी बहू स्वीकार किया था। शादी के बाद शायद तेरे ससुर ने ही जूस पिला कर तेरी भूख हड़ताल समाप्त करवाई थी। यह भी सुना था कि जनसमूह में से बहुत से लोगों ने कन्यादान की रस्म में भाग लिया था। खुली जीप में तुम दोनों को बैठा कर शहर में तुम्हारा जुलूस निकाला गया था। हमारे घर के सामने से भी तुम्हारी जीप गुजरी थी तभी तो मुझे यह ज्ञात हुआ कि यह घटना तुम्हारे साथ घटी है।...उसके बाद क्या हुआ यह मुझे नहीं मालूम।'
  "उसके बाद जीप से मुझे रमेश के घर ले जाया गया। वहाँ तो मातम का माहौल था। माता-पिता दोनों ने रमेश को बहुत फटकारा। यदि रमेश उनका इकलौता बेटा न होता तो शायद वह उसे जायदाद से बेदखल करके घर से ही निकाल देते।'
 "उस घर में मुझसे किसी ने पानी तक भी नहीं पूछा। भूख से बेहाल मैं एक कमरे में पड़ी आँसू बहा रही थी। तभी मैंने सुना रमेश के पिता किसी से कह रहे थे, "उस लड़की को किसी ने खाने को कुछ दिया या नहीं। वैसे भी वह दो दिन से भूखी है। कहीं मर-मरा गई तो हत्या हमारे सिर पड़ेगी। शहर का माहौल बिगड़ा हुआ है और हमारे खिलाफ भी है।' तब से उनकी काम वाली थाली परोस कर कमरे में दे जाती थी। रमेश तो सामने बहुत कम आता था।'
  बस तनावों के बीच ऐसे ही समय गुजरता रहा। कुछ महीनों बाद सपना का जन्म हुआ। रमेश की काम वाली को मुझसे बहुत हमदर्दी थी वह मेरी जरूरतों का ध्यान रखती थी। फिर भी थी तो वह नौकरानी ही। उसकी भी सीमाएँ थीं। बच्ची रोती-बिलखती रहती थी, मुझे भी बच्चे पालने का अनुभव नहीं था।'
   'कमलेश, रमेश या उसके मां-बाप किसी ने भी बच्ची को सँभालने में तुम्हारी कोई मदद नहीं की ?'
  "उन्होंने लोगों के डर से मुझे अपनाया था, मन से नहीं। कोई कभी यह भी नहीं पूछता था कि बच्ची क्यों रो रही है। मैं ही रमेश को बाप की जिम्मेदारी निभाने की याद दिलाती थी तो वह भड़क उठता था। एक-दो बार उसने हाथ उठाने की कोशिश भी की। उसकी माँ भी हर समय ताने मारती रहती थी। मैं चाहती तो पुलिस में रिपोर्ट लिखा सकती थी। जनता से, महिला संगठन से शिकायत कर सकती थी लेकिन मैं भी थक गई थी और कोई नया तमाशा खड़ा करना नहीं चाहती थी।...मैंने रमेश का घर छोड़ने का फैसला रत्ना को बता दिया था।'
  रत्ना बोली-"ऐसे कैसे घर छोड़ देगी ?...यदि वह पत्नी व बहू का सम्मान नहीं दे सकते तो उन्हें बच्ची के पालन पोषन के लिए धन देना होगा।....हम लोग उनसे बात करते हैं'। धन की उनके पास कमी नहीं थी। वह एक लाख रुपये देने को तैयार हो गए।'
  "रुपये देने को वे आसानी से तैयार हो गए ?'
 "रमेश के पिता तो एक बार में तैयार हो गए शायद उन्हें यह सौदा सस्ता ही लगा था पर रमेश की माँ ने डंक मारते हुए कहा था यदि पैसा ले कर ही हमारा पीछा छोड़ना था तो उतना बड़ा तमाशा करने की क्या जरूरत थी...हम तो पहले भी दे रहे थे ।'
   तूने उन्हें जवाब नहीं  दिया ?
   "मैं चुप कैसे रह सकती थी, मैं ने कहा था -- "तमाशा न करती तो आपकी शराफत का नकाब कैसे उतरता ? वह तमाशा आप के लिए होगा... मेरे लिए तो एक लड़ाई थी ,मैं अपने बच्चे को नाजायज औलाद की गाली विरासत में नहीं देना चाहती थी।....अब आप जो दे रहे हैं वह एहसान या खैरात नहीं  हम दोनों का अधिकार है उस पर।'..फिर उनका मुँह बंद हुआ था।....'
  समाज के कुछ जाने-माने लोग जिनमें रत्ना व महिला संगठन की कुछ सदस्याएँ भी थीं, के सामने हमने एक-दूसरे को आपसी सहमति से तलाक़ देने के पेपर साइन किए और एक लाख रुपये लेकर मैंने घर छोड़ दिया। मैं उस शहर से ही बहुत दूर चली जाना चाहती थी।'
   "फिर यहाँ दक्षिण में कैसे आ गई ?'
  "रत्ना के कुछ रिश्तेदार यहाँ रहते थे। मेरे आग्रह पर वह मुझे यहाँ ले आई। उसके रिश्तेदारों ने मेरी बहुत मदद की। अपने घर के पास ही मुझे कमरा दिलवा दिया। बैंक में मेरा खाता खुलवा दिया। यहाँ आकर मैंने ब्यूटीशियन का कोर्स किया। तब मेरी बेटी को वही सँभालते थे।....
 कोर्स करने के बाद मैंने एक बैडरूम का फ्लैट किराए पर ले लिया और उसके एक हाल में ब्यूटी पार्लर शुरू कर दिया। धीरे-धीरे पार्लर चल निकला।...अब मेरे पास अपना ये फ्लैट है। इसी में ब्यूटी पार्लर भी चला रही हूँ। बेटी सपना पाँचवीं क्लास में पढ़ रही है।...बस ऐसे ही जिंदगी कट रही है।'
  मैंने पूछा, "तेरी बेटी सपना कभी अपने पिता के विषय में नहीं पूछती ?'
 "क्यों नहीं पूछती ? रोज-रोज उसके द्वारा पूछे गए सवाल मुझे बेचैन कर देते हैं। पापा देखने में कैसे थे प्रश्न का हल तो मैंने उसे शादी के फोटो दिखा कर कर दिया।"पापा कहाँ है ? हमारे साथ क्यों नहीं रहते,... अनेकों ऐसे सवाल है, जिनका अंत करने के लिए मन होता है उससे कह दूँ कि उसके पिता मर चुके हैं किंतु झूठ नहीं बोल पाती। उसे यही कह कर समझा देती हूँ कि तुम्हारे पिता ने हमें छोड़ कर दूसरी शादी कर ली है। इसलिए वे हमार साथ नहीं रहते।'
     " रमेश ने तो दूसरी शादी कर ली ? '
  "पता नहीं मैंने कभी उसके बारे में जानने की कोशिश नहीं की। जिस राह जाना नहीं उसका पता क्या पूछना ? मैं एक दुःखद स्वप्न समझ कर उसे भुला देना चाहती हूँ।'
   "क्या तेरे मन में पुन: शादी का ख्याल कभी नहीं आया ?'
 "मन का क्या है, यह तो बहुत कुछ चाहता है पर मन को मारना पड़ता है...अपनी नियति से मैंने समझौता कर लिया है। अब तो सपना की अच्छी परवरिश करना ही मेरा एकमात्र स्वप्न है।'
   कमलेश बहुत थकी हुई व उदास दिखने लगी थी। समय बहुत हो चुका था। दुबारा फिर मिलने का वादा करके भारी मन से मैं लौट आई थी।


                                                  ------

पवित्रा अग्रवाल

 ईमेल --  agarwalpavitra78@gmail.com
 


 

 

बुधवार, 1 जुलाई 2015

दुविधा के बादल

    (     मेरे दूसरे  कहानी संग्रह   'उजाले दूर नहीं "  में से एक कहानी )


कहानी  

      दुविधा के बादल


                                         पवित्रा अग्रवाल
 
      करन ने  अपनी पत्नी से कहा--"सुनो रानी ,भैया -भाभी पहली बार घर आ रहे हैं,उन की आवभगत जरा अच्छी तरह करना।'
 रानी ने भृकुटि कुछ टेढ़ी कर के कहा --"तुम कहना क्या चाहते हो ,क्या मैं आने जाने वालों का स्वागत अच्छी तरह नहीं करती ?'
 "अरे यार मैं ऐसा कुछ भी नहीं कहना चाहता ।उन के आने की बात सुन कर जरा एक्साइटेड हो गया हूँ या सच कहूँ तो थोड़ा टेंशन  हो रहा है बस उसी धुन में तुम से यह कह दिया ।असल में तुम्हे तो मालुम हैं भैया बहुत पैसे वाले हैं... वैसे पैसा तो बहुतों के पास होता है पर सब में  पैसे की बू नहीं होती ।'
 "हाँ कह तो तुम ठीक ही रहे हो पर भैया से ज्यादा घमंड भाभी और उनके बच्चों को है ।उनकी बात पैसे से शुरू हो कर पैसे पर ही खत्म होती है ।उनके यहाँ आने जाने वालों का स्वागत भी आने वाले की हैसियत के हिसाब से होता है।हमारे बच्चे तो वहाँ जाना ही नहीं चाहते ।'
 "वैसे वे नए मकान में शिफ्ट होने के बाद आते तो ज्यादा अच्छा होता ।'
 "हाँ... अपना सोफा कितना बेकार हो गया है.. डाइनिंग टेबिल भी यही सोच कर नहीं ली कि अब अपने नए घर में जा कर ही लेंगे ।'
 " चलो छोड़ो अब यह सब बातें....आ रहे हैं तो अपना नया घर तो जरूर देखना चाहेंगे ।'
 "अब जैसा भी है दिखा लाना उनका तो बहुत बड़ा है ।घर क्या उनकी तो कोठी है ..उस की डैकोरेशन में भी बहुत पैसा खर्च किया है ...जब हम उनके गृह प्रवेश में गए थे तो हर कमरे का परिचय देते हुए भाभी हर चीज की कीमत भी बताती जा रही थीं।'
 "हाँ, रसोई भी कितनी बड़ी है उसमें लगी चिमनी की कीमत ही करीब अस्सी हजार की बता रहे थे, चलो छोड़ो यह सब बातें ...उन्हें ठहरायेगे किस रूम में ।'
    "उनकी तरह लौबी में बिस्तर डाल कर जमीन में तो नहीं सुलायेंगे ।'
 "रानी अपन गृह प्रवेश में गए थे ,इतने सब मेहमानों को कमरों में पंलगो पर तो कोई भी नहीं सुला सकता ...उस बात को मन से नहीं लगाना चाहिए ।'
    " मैं तब की बात कर भी नही रही हूँ ।पाँच छह साल पहले जब मैं सुमन दीदी के पास गई थी तो लौटते में हमारी डाइरेक्ट ट्रेन वहीं से तो थी ।ट्रेन सुबह की थी इसलिए एक रात उन के पास रुकना पड़ा था ।..... मिन्नी मेरे साथ थी उसके बाद से तो मिन्नी वहाँ जाने से साफ ना कर देती है ।'
 " मुझे याद नहीं ऐसा क्या हुआ था वहाँ ?'
 " रात को भाई साहब,भाभी जी और बच्चे सब अपने अपने ऐ सी रूम बंद कर के सो गए और हम दोनो के लिए वहीं लिविंग रूम में गद्दा डाल दिया था ।उस रात मिन्नी बहुत रोई थी और बोली थी     "मम्मी अब आगे से मुझे यहाँ आने को कभी मत कहना '..भाभी जी या उनके एक दो बच्चे भी हमारे साथ सो गए होते तो उतना बुरा नहीं लगता पर...
 "यह बातें कोमन सेंस और संस्कारों की होती हैं,भैया तो पहले ऐसे नहीं थे ।'
 " अब हमारे पास तो दो ही कमरे हैं,हमारा कमरा बड़ा है।तुम और भाई साहब पलंग पर सो जाना ,मै और भाभी नीचे गद्दे डाल कर सो जाएगे ।'
 " हाँ यह ठीक रहेगा ।'
  "भाई साहब से भी पूछेंगे कि उन्हों ने भी अपना घर वास्तु के हिसाब से बनवाया था क्या ?''
 "मैं समझता हूँ भैया भी हमारी तरह इन फालतू बातों में विश्वास नहीं करते होंगे...आज कल तो जाने लोगों को क्या हो गया है किराए का मकान लेते समय भी वास्तु के बारे में पूछतें हैं ।'
 "वास्तु शास्त्र पहले तो सुनने में नहीं आता था,इधर तो यह एक बीमारी की तरह फैल रहा है।'
  "रानी वास्तु शास्त्र पहले भी था.. मकान बनाते समय कुछ बातो का ध्यान तब भी रखा जाता था जैसे घर में सूरज की रोशनी अच्छी आये ,घर हवादार व खुला खुला हो पर अब तो अति होती जा रही है।..असल में अब यह एक फलता फूलता व्यवसाय का रूप लेता जा रहा है ।'
 " मजे की बात तो यह है कि हरेक का अपना अपना वास्तु शास्त्र है। अभी कुछ दिन पहले ही पेपर में पढ़ रही थी कि मुख्य मंत्री का आफिस वास्तु के हिसाब से ठीक कराने में लाखों रुपए लग गए ...कुछ दिन बाद नया मुख्य मंत्री आया उसने वह सब तुड़वा कर अपने वास्तु शास्त्री के हिसाब से ठीक कराने में फिर लाखों रुपया लगा दिए, इस सब के बाद भी समय पूरा होने से पहले ही कुर्सी छोड़नी पड़ी ।'
 "जनता का पैसा है उन की जेब से क्या जाता है पर अफसोस तो तब होता है जब आम आदमी भी  इन बातों में फॅस कर बर्बाद होने को तैयार हैं।मैं ने मकान बनवाते समय अलग से किसी वास्तु शास्त्री की सलाह इसी लिए नहीं ली कि फिर उनकी बात न मानो तो मन में बहम हो जाता है ।'
 "पर इन शुभचिंतकों का क्या करूँ ,एक एक दोष निकाल कर मन में बहम पैदा करने लगे हैं...ऐसे ऐसे उदाहरण देते हैं जैसे "घर का मालिक मर गया...लड़की भाग गई' कि विश्वास हिलने लगता है ।'
 "रानी सब से अच्छा तरीका है गृह प्रवेश से पहले किसी को अब घर ही मत दिखाओ ।'
    " उस से कुछ खास फर्क पड़ने वाला नहीं है,वह अभी नहीं तो बाद में अपनी राय देंगे ...उस दिन गुप्ता जी किसी वास्तुशास्त्री के विषय में बता रहे थे और कह रहे थे गृह प्रवेश से पहले मकान का नक्शा दिखा कर उनसे एक बार राय जरूर लेलो ,वह बर्बादी नहीं होने देंगे और सही राय देंगे।'....परिवर्तन कराना न कराना तो अपने हाथ में है,मेरी भी इच्छा है कि तुम एक बार उनके पास चले जाओ ।'
 "अच्छा,सोचूँगा ।कल भाई साहब भी आ रहे हैं देखें वह क्या कहते हैं ।'

   खाना खाते हुए करन ने भाइ साहब से पूछा --" आप वास्तुशास्त्र में विश्वास करते हैं ? '
 " करता तो नहीं था पर तुम्हारी भाभी की इच्छा थी तो सोचा जहाँ इतना खर्च हो रहा हैं वहाँ लाख-पचास हजार और सही। भविष्य में परिवार में कुछ उल्टा सीधा घटा तो कम से कम मुझे तो ताने नहीं सुनने पड़ेगे ।'
 भाभी ने कहा --"करन मकान जिन्दगी में एक ही बार बनता है...वास्तु के हिसाब से ही बनवाना चाहिए, हमने तो पूरी तरह वास्तु के हिसाब से ही बनवाया है ।वास्तु-विशेषज्ञ ने पचास हजार लिए थे ।हमने तो इंटीरियर वाला भी हायर किया था ।'
 "लेकिन भाभी भैया को हार्ट अटैक तो इस नए घर में आने के बाद ही आया था न ?'
 "हाँ,अटैक तो नए मकान में ही आया था पर बच गए,इस लिए मैं तो इसे शुभ संकेत ही मानती हूँ।क्या तुमने भी वास्तु के हिसाब से बनवाया है ?'
 "हमारे पास इतने साधन कहाँ है भाभी ,बैंक लोन ले कर बस एक छोटा सा घर बना लिया है ..जितना घर का किराया यहाँ देते हैं उस से कुछ ज्यादा की किश्त चली जाया करेंगी ।वास्तु में हम
दोनो को ही विश्वास नही है पर मिलने जुलने वालों ने मन में शक पैदा कर दिया है..लेकिन विशेषज्ञ के पास जाते डर भी लगता है कि पता नहीं कितने का बिल और बन जाएगा ।'
 "करन मन में बहम आ ही गया है तो दिखालो ...पर आजकल मकान का नक्शा बनाने वालों को भी वास्तु का ज्ञान होता है ....उसने जरूर इसका ध्यान रखा होगा । ...वैसे एक बात बताऊँ यह बड़े लोगों के चोचल हैं।'
    "मैं भी ऐसा ही सोचता हूँ भैया पर रानी...
 "सोचती तो मैं भी ऐसा ही हूँ भैया कि पंडितों, वास्तु विशेषज्ञों के हिसाब से चलने पर यदि लोगो के जीवन से दुख गायब हो जाता तो सबसे ज्यादा सुखी तो यही लोग होते ..हमारे एक परिचित हैं उनका बिजनस अच्छा नहीं चल रहा था...किराये का दूसरा मकान ढूँढ़ते समय वह एक वास्तु शास्त्री साथ रखते थे। आखिर वास्तु विशेषज्ञ की मदद से उन्होंने एक मकान किराए पर ले लिया...पर तब भी हालत में सुधार नहीं आया तो उन्होंने किसी दूसरे विशेषज्ञ को बुलाया उसने सलाह दी कि अपने घर के पिछवाड़े में एक छोटा सा तालाब बनवाओ जिसमें हर समय पानी भरा रहना चाहिए, साथ ही उसमें सफेद कमल के फूल भी लगाओ...'
 भाई साहब ने चौंक कर पूछा -- "सचमुच का तालाब कैसे बन सकता है ?'
 "हाँ भाई साहब सचमुच का तो कैसे बनता,वहाँ पथरीली जमीन थी... पत्थर फोड़ने वाले को बुला कर वहाँ एक बड़ा गड्ढ़ा करा के उसमें पाइप से पानी भर दिया और उसे हर समय भरा ही रखतें थे पर दो महीने बीत गए हालात ज्यों के त्यो रहे फिर किसी तीसरे को बुलाया वह बोला सबसे पहले तो यह तालाब बन्द करिए,उस गड्ढ़े को फिर मिट्टी से भरा गया ।उसके बाद विशेषज्ञ ने रसोई और पानी के टैंक की जगह बदलने को कहा पर मकान मालिक ने उसकी परमीशन नहीं दी ।आखिर वह थक हार कर बैठ गए और फिर सारा घ्यान अपने बिजनस पर लगाने लगे, अब वह खुश हैं ।''
    भाई साहब के कुछ बोलने से पहले ही करन ने कहा--"रानी जब तुम इतना जानती हो तो लोगों की बातों में क्यों आ रही हो ,मेरी मानों तो जो तारीख हमने चुनी है उसी पर गृह प्रवेश कर लेते हैं...अभी समय है फिर से सोच लो।'
  भाई साहब को स्टेशन छोड़ कर आने के बाद करन ने रानी से फिर पूछा --"बोलो अब क्या इरादा है... कार्ड तो छपे रखे हैं कहो तो बाहर के भेज दूँ ।'
 "सुनो एक दो दिन और रुक जाओ मैं ने गुप्ता जी से वास्तु-विशेषज्ञ का पता ले कर रखा है,   एक बार नक्शे के साथ उनसे से मिल लो यदि मामूली सी फेर बदल करने को कहते हैं तो करा लेंगे वरना छोड़ देंगे।'
     "चलो ठीक है वैसे उनका थोड़ा सा परिवर्तन भी हमारे लिए बहुत होगा, अब और तोड़ फोड़ कराने की न तो मुझ में ताकत है और न हैसियत फिर भी कल उनसे मिलता हूँ ।'
     करन थोड़ा सा परेशान था और सोच रहा था हम अब तक इतने मकानों में रहे पर कभी वास्तु के बारे में नहीं सोचा..बच्चे भी अच्छे हैं ।मिन्नी अगले साल इंजीनियर हो जाएगी, अच्छी कंपनी में सलैक्शन भी हो गया है,संजू इंजीनियरिंग फस्ट ईयर में है  ..अब मकान भी अपना हो जाएगा ।बैंकों में जोड़ने को नहीं है पर गुजारा अच्छी तरह हो रहा है ।आदमी को जीवन में और क्या चाहिए..पर इतनी दुविधा में मैं ने अपने को कभी नहीं पाया।
        करन ने फोन पर वास्तुशास्त्री राजेश जी के सचिव से मिलने का समय लिया, पहुँच कर पहले फीस जमा कराई, कुछ देर के इंतजार के बाद मिलना हुआ।नक्शा देख कर वह बोले -- "अरे करन साहब आप मकान पूरा होने के बाद आए हैं पहले आए होते तो दोहरे खर्चे से बच जाते ,अक्सर लोग यही गल्ती करते हैं फिर हमें दोष देते हैं कि बहुत खर्च करा दिया ।'
 "अच्छा राजेश जी नक्शा देख कर यह तो बताइये कि दोष कहाँ कहाँ हैं ?'
 "करन जी दोष एक जगह हो ता बताऊँ...देखिए पूर्व तथा उत्तर की अपेक्षा आपने दक्षिण में ज्यादा जगह छोड़ रखी है जो ठीक नहीं...पूर्व में स्थित रसोई घर को हटा कर यहाँ बाथरूम की जगह करना पड़ेगा,बोर वैल और ये पानी का टैंक भी यहाँ से दूसरी जगह  शिफ्ट करना पड़ेगा।'
  "अरे राजेश जी इसे सुन कर ही मुझे चक्कर आने लगे हैं ,इतनी मेरी औकात नहीं, भगवान का नाम ले कर मैं तो ऐसे ही घर में रहने चला जाता हूँ।'
 "जैसा आप ठीक समझें पर इतना तय है कि आप वहाँ सुख से नहीं रह पायेंगे ।बाल बच्चेदार आदमी हैं, मुसीबतों को निमंत्रण क्यों देते हैं ?'
"अभी आपने जो दोष बताये हैं उसे सुधारने में कम से कम एक डेढ़ लाख रुपए तो लग जाएगे ?'
"हाँ पहले तो बना बनाया भाग तोड़ना पड़ेगा फिर बनाना पड़ेगा इतने तो आपके लग ही जायेंगे।'
 "मैं तो पेन्ट तक करा चुका हूँ ,पन्द्रह दिन बाद गृह प्रवेश है... कार्ड भी छप चुके हैं।'
  "मैं तो आपको यही सलाह दूँगा कि ठीक कराने के बाद ही उसमें जाए।'
 "ठीक है राजेश जी मैं पत्नी से सलाह करके और फिर पैसे का इंतजाम करके आपसे मिलूँगा ।'
 लौट कर घर की काल बैल बजाने की जरूरत नहीं पड़ी, रानी दरवाजे पर ही खड़ी थी ---
 "क्या कहा ?'
 "वही जो यह लोग कहते हैं कि बिना ठीक कराए उसमें रहने मत जाइये वरना मुसीबतें आपको घेर लेंगी लेकिन वास्तु के हिसाब से उसे ठीक कराने बैठा तो जाने से पहले  ही मुसबतों में घिर जाऊँगा ।'
  "वो कैसे ?'
 "उसे ठीक कराने के लिए एक डेढ़ लाख रुपए कहाँ से लाऊँगा ? हर महीने घर की किश्त भरनी हैं, दोनो बच्चे अभी पढ़ रहे हैं...अब और पैसे के लिए तो कहीं से ब्याज पर फिर कर्जा लेना पड़ेगा ।'
 "चलो इस विषय में बाद में सोचेंगे, थक गए होगे खाना खा कर आराम करो ।'
  दो तीन दिन बाद सुबह - सुबह रानी ने करन को सोते से जगाया -- "सुनो आप जिन वास्तु विशेषज्ञ के पास गए थे उनका नाम राजेश ही है न ?'
 "हाँ ,पर तुम मुझे नींद से जगा कर यह सब क्यों पूछ रही हो ?'
 "अरे बड़ा बुरा हुआ उनके साथ,अखबार में न्यूज है कि प्रसिद्ध वास्तु शास्त्री राजेश जी के बेटे की दुर्घटना में मौत हो गई...रात को दोस्तो के साथ बर्थ डे मना कर घर लौट रहा था पीछे से लौरी ने टक्कर मार दी .. उनके पुत्र की तो घटनास्थल पर ही मौत हो गई, उसके दोस्त की हालत गंभीर है ।'
 करन एक दम से उठ कर बैठ गया --"हे भगवान यह तो बड़ा दुखद समाचार है ..भगवान ऐसा दुख किसी को न दे, पर उनका घर तो निश्चय ही पूरी तरह से वास्तु के आधार पर बना होगा... उनके साथ यह अनहोनी कैसे हो गई ?'
 "हाँ बात तो सोचने लायक है ।'
 "रानी मेरे मन पर घिरे दुविधा के बादल अब छट गए हैं ।अपने हिस्से के दुख-सुख सब को सहने पड़ते हैं,इनसे न कोई बचा है न कोई बचेगा ।मैं आज बाहर के कार्ड पोस्ट कर देता हूँ ..पाँच छह दिन में लोकल कार्ड भी बाँटने शुरू कर देंगे ।'
      
 email -  agarwalpavitra78@gmail.com                                                                  

मेरे ब्लोग्स  --

 

मंगलवार, 2 जून 2015

कितना करूँ इंतजार

मेरे दूसरे कहानी संग्रह "उजाले दूर नहीं " से एक कहानी प्रस्तुत है     
      

     
 कितना करूँ इंतजार 

                                                     पवित्रा अग्रवाल

        मुझे गुमसुम उदास देख कर माँ ने कहा --"क्या बात है रति तू इस तरह मुँह लटकाए  क्यों बैठी है ?.. कई दिन से मनोज का भी कोई फोन नहीं आया,दोनो ने आपस में झगड़ा कर लिया क्या ?'
 "नहीं माँ रोज रोज क्या बात करें।'
     "कितने दिनों से शादी की तैयारी कर रहे थे,सब व्यर्थ हो गई। यदि मनोज के दादा जी की मौत न हुई होती तो आज तेरी शादी को पन्द्रह दिन हो चुके होते। वे काफी वृद्ध थे, तेरहवीं के बाद शादी हो सकती थी लेकिन तेरे ससुराल वाले बड़े दकियानूसी हैं,कहते हैं साये नहीं हैं अब तो पाँच-छह महीने बाद ही शादी होगी। हमारी तो सब तैयारी व्यर्थ हो गई।शादी के कार्ड बट चुके थे...फंक्शन हाल को,कैटर्स को, सजावट  करने वालों को और भी कई लोगों को एडवांस पेमेन्ट कर बुक कर चुके थे।तारीख पन्द्रह- बीस दिन सरक जाती तो कुछ एडजस्टमेंन्ट करा लेते पर छह महीने सरकाने से अच्छा खासा नुकसान हो गया है।'
 "इसी बात से मनोज बहुत डिस्र्टब है माँ पर कुछ कह नही पाता ।'
       "बेटा हम भी कभी तुम्हारी उम्र के थे. तुम दोनो की भावनाए समझ सकते हैं,पर हम चाह कर भी कुछ नही कर सकते।मैं ने तो तेरी सास से कहा था कि साये नहीं  हैं  तो क्या हुआ ,अच्छे काम के लिए सब दिन शुभ होते हैं,अब हमे शादी कर देनी चाहिये किन्तु वह तो भड़क गई।कहने लगीं --"आप के लिये सब दिन शुभ होते होंगे पर हम तो सायों में विश्वास करते हैं ,हमारा इकलौता बेटा है हम अपनी तरफ से पुरानी मान्यताओं को अनदेखा कर मन में कोई बहम पैदा नही करना चाहते।'
    मम्मी इस से ज्यादा क्या कर सकती थीं और मैं भी क्या करूँ।मम्मी को कैसे बताऊँ कि मनोज क्या चाहता है।नर्सरी से इंटर मीडिएट तक हम दोनो साथ साथ पढ़े थे। किन्तु दोस्ती इंटर में आने के बाद ही हुई थी।इंटर के बाद मनोज इंजीनियरिंग करने चला गया और मैं ने बी.एससी. में प्रवेश ले लिया था ।कालेज अलग होने पर भी हम छुट्टियों के दिन कुछ समय साथ बिताते थे। बीच में फोन पर बातचीत कर लेते थे।कमप्यूटर पर चैट हो जाती थी।
    एम.एससी.में आते ही मम्मी -पापा ने शादी के लिए लड़का तलाशने की शुरुआत कर दी।मैं ने कहा  भी मम्मी एम.एससी.के बाद शादी करना।पर मम्मी का कहना था कि तुम अपनी पढ़ाई जारी रखो, शादी कौन सी अभी हुई जा रही है, अच्छा लड़का मिलने में भी समय लगता है।
     शादी का नाम आते ही मनोज की छवि आँखों में तैर गई थी।यों हम दोनो एक अच्छे मित्र थे पर तब तक शादी करने के वादे हम दोनो ने एक दूसरे से नही किए थे।साथ मिल के भविष्य के सपने भी नहीं देखे थे।पर मम्मी द्वारा शादी की चर्चा करने पर मनोज का ख्याल आना ,क्या इसे प्यार समझूँ ।...क्या मनोज भी यही चाहता है,कैसे जानू उसके दिल की बात।
    मुलाकात में मनोज से मम्मी द्वारा शादी की पेशकश के बारे में बताया तो वह बोला-"इतनी जल्दी शादी कर लोगी,अभी तो तुम्हे दो वर्ष एम.एससी.करने में ही लगेंगे।' फिर कुछ सोचते हुए बोला था..."सीधे सीधे बताओ क्या मुझ से शादी करोगी..पर अभी मुझे सैटिल होने में कम से कम दो - तीन वर्ष लगेंगे ...'
 प्रसन्नता की एक लहर तन मन को छू गई थी--"सच कहूँ मनोज जब मम्मी ने शादी की बात की तो एक दम से मुझे तुम याद आगए थे।..क्या यही प्यार है ?'
          "मैं समझता हूँ यही प्यार है,देखो जो बात अब तक नहीं कह सका था , तुम्हारी शादी की बात उठते ही मेरे मुँह पर आ गई और मैं ने तुम्हें प्रपोज कर डाला ।'
 "अब जब हम दोनो एक दूसरे से चाहत का इजहार कर ही चुके हैं तो फिर तो इस विषय में गम्भीरता से सोचना होगा ।'
 "सोचना ही नहीं होगा रति तुम्हें अपने मम्मी-पापा के वर तलाश अभियान को रोकना होगा और उन्हें इस शादी के लिए मनाना भी होगा ।'
 "क्या तुम्हारे घर वाले मान जायेंगे ?'
     "देखो अभी तो मेरे इंजीनियरिंग का अंतिम साल है. मेरी कैट की कोचिंग भी चल रही हैं..उसका एग्जाम भी लिखना है।वैसे इस साल ही हो सकता है किसी अच्छी कम्पनी में प्लेसमेंन्ट हो जाये क्यों कि कालेज में बहुत सी कम्पनी आती हैं,स्टूडेन्ट्स के इंटरव्यू लिये जाते हैं और फिर वह जॉब आफर करती हैं। अच्छा आफर मिला तो मैं स्वीकार कर लूँगा और घर में जैसे ही शादी की चर्चा शुरू होगी मैं तुम्हारे बारे में बता दूँगा।'
       प्यार का अंकुर तो हमारे बीच पनप ही चुका था और हमारा यह प्यार अब जीवनसाथी बनने के सपने भी देखने लगा था। अब इसका जिक्र अपने अपने घर में करना जरुरी हो गया था ।
       मैं ने मम्मी को मनोज के बारे में बताया तो वह बोलीं--" वह अपनी जाति का नहीं है यह कैसे हो सकता है, तेरे पापा तो बिल्कुल नहीं मानेंगे।..क्या मनोज के माता पिता तैयार हैं ?'
       "अभी तो इस विषय में उस के घर वाले कुछ नहीं जानते,फाइनल परीक्षा होने तक मनोज को किसी अच्छी कम्पनी में जॉब का आफर मिल जाएगा और रिजल्ट आते ही वह कम्पनी जोइन कर लेगा । .. उस के बाद ही वह अपने मम्मी पापा से बात करेगा।'
 "क्या जरूरी हैं कि वह मान ही जायेंगे ?'
 "मुझे पहले आप की परमीशन चाहिए।'
 "यह निर्णय मैं अकेली कैसे ले सकती हूँ,तुम्हारे पापा से बात करनी होगी,उनसे बात करने के लिए मुझे हिम्मत जुटानी होगी।...यदि पापा तैयार नहीं हुए तो तुम क्या करोगी ?'
 "करना क्या है मम्मी शादी होगी तो आपके आशीर्वाद से ही होगी वरना नहीं होगी ।'
  "बेटा तुम हमारी इकलौती बेटी हो,तुम्हारी खुशी के लिए मैं पूरा प्रयास करूँगी ।'
  इधर मेरा एम.एससी. फाइनल शुरू हुआ उधर इंजीनियरिंग पूरी होते ही मनोज को "सत्यम' कम्पनी में अच्छा स्टार्ट मिल गया था और यह भी करीब करीब तय था कि भविष्य में कभी भी कम्पनी उसे यू.एस.भेज सकती है । मनोज के घर में भी शादी की चर्चा शुरू हो गई थी।
      मैं ने मम्मी को जैसे तैसे मना लिया था और मम्मी ने पापा को किन्तु मनोज की मम्मी इस  विवाह के लिये बिल्कुल तैयार नही थे।इस निर्णय से मनोज के घर में तूफान उठ खड़ा हुआ था।उसके घर में पापा से ज्यादा उसकी  मम्मी की चलती है,ऐसा एक बार मनोज ने ही बताया था।...मनोज ने भी अपने घर में एलान कर दिया था कि शादी करूँगा तो रति से वरना किसी से नहीं।
     मनोज बहुत डिस्टर्ब रहने लगा था आखिर मनोज के बहन बहनोई ने अपनी तरह से  मम्मी को समझाया था --"मम्मी आप की यह जिद्द मनोज को आप से दूर कर देगी, आज कल बच्चों की मानसिक स्थिति का कुछ पता नहीं चलता कि वह कब क्या कर बैठें। आज के ही अखबार में समाचार है कि माता पिता की स्वीकृति न मिलने पर प्रेमी - प्रेमिका ने आत्महत्या कर ली।..वह दोनो बालिग हैं,मनोज अच्छा कमा रहा है ।वह चाहे तो कोर्ट में शादी कर सकता था पर उसने ऐसा नहीं किया और आप की स्वीकृति का इंतजार कर रहा है ,अब फैसला आपको करना हैं।'
     मनोज के पिता ने कहा था --"बेटा मुझे तो मनोज की इस शादी से कोई एतराज नहीं हैं...लड़की पढ़ी लिखी है, सुन्दर है,अच्छे परिवार की हैं और सब से बड़ी बात मनोज को पसंद है ।बस हमारी जाति की नहीं है तो
क्या हुआ पर हमारी श्रीमती जी को कौन समझाए ।' 
    "जब सब तैयार हैं तो मैं ही उसकी दुश्मन हूँ क्या ...मैं ही बुरी क्यों बनूँ ?..मैं भी तैयार हूँ ।'           
   अब उनका इरादा फिर बदले इस से पूर्व ही मंगनी की रस्म कर दी गई थी। तय हुआ था कि मेरी एम. एससी.पूरी होते ही शादी हो जाएगी ।
     मंगनी हुए  एक साल हो चुका था।शादी की तारीख भी तय हो चुकी थी। मनोज के बाबा की मौत न हुई होती तो हम दोनो अब तक हनीमून मना कर कुल्लू-मनाली,शिमला से लौट चुके होते और तीन महीने बाद मैं भी मनोज के साथ अमेरिका चली जाती।
    पर अब छह सात महीने तक साये नही है अत: शादी अब तभी होगी ऐसा मनोज के मम्मी पापा ने कहा है।पर मनोज शादी के टलने से खुश नहीं है ।पर इस के लिए अपने घर में उसे खुद ही बात करनी होगी. हाँ यदि मेरे घर से कोई रुकावट होती तो मैं उसे दूर करने का प्रयास करती।
 पर मैं क्या करूँ । माना कि उसके भी कुछ जजबात हैं।चार-पाँच वर्षो से हम दोस्तो की तरह मिलते रहे हैं ,प्रेमियों की तरह साथ साथ भविष्य के सपने भी बुनते रहे किन्तु मनोज को कभी इस तरह कमजोर होते नहीं देखा।यद्यपि उसका बस चलता तो मंगनी के दूसरे दिन ही वह शादी को तैयार था परन्तु मेरा फाइनल ईयर था     इस लिए वह मन मसोस कर रह गया। प्रतीक्षा की लम्बी घड़ियाँ हम कभी मिल कर, कभी फोन पर बात कर के काटते रहे।हम दोनो बेताबी से शादी के दिनों का इंतजार करते रहे।दूरी बर्दाश्त नहीं होती थी,साथ रहने व एक होजाने की इच्छा बलवती होती जाती थी।जैसे जैसे समय बीत रहा था ,सपनो के रंगीन समुन्दर में गोते लगाते  दिन मंजिल की तरफ बढ़ते जा रहे थे।शादी के दस दिन पहले हमने मिलना भी बन्द कर दिया था कि अब एक दूसरे को दूल्हा- दुल्हन के रूप मे ही देखेंगे परन्तु विवाह के सात दिन पूर्व बाबा जी की मौत हमारे सपनो के महल को धराशायी कर गई।
      बाबा जी की मौत का समाचार मुझे मनोज ने ही दिया था और कहा था--"बाबा जी को भी अभी ही जाना था ,हमारे बीच फिर अन्तहीन मरुस्थल का विस्तार है ,लगता है अब अकेले ही अमेरिका जाना पड़ेगा । तुमसे मिलन तो मृगतृष्णा बन गया है।'
     तेरहवीं के बाद हम दोनो गार्डन मे मिले थे।वह बहुत भावुक हो रहा था"रति तुम से दूरी अब बर्दाश्त नहीं होती।मन करता है तुम्हें ले कर अनजान जगह पर उड़ जाऊँ. जहाँ हमारे बीच न समाज हो, न परम्पराएं हों,न ये रीति रिवाज हों।दो प्रेमियों के मिलन में समाज ने कायदे कानून की इतनी ऊँची बाड़ खड़ी कर रखी हैं कि उनकी सब्र की सीमा ही समाप्त हो जाये।चलो रति हम कहीं भाग चलें ।...मैं तुम्हारा निकट सानिध्य चाहता हूँ।इतना बड़ा शहर है चलो किसी होटल में कुछ घन्टे साथ बिताते हैं।'
     जो हाल मनोज का था वही मेरा भी था,एक मन कहता था कि अपनी खींची लक्ष्मण रेखाओं को अब मिटा दें किन्तु दूसरा मन संस्कारों की पिन चुभो देता कि बिना ब्याह यह सब ठीक नहीं।वैसे भी एक बार मनोज की इच्छा पूरी कर दी तो यह चाह फिर बार बार सिर उठायेगी,नहीं यह ठीक नहीं।'
    "क्या ठीक नहीं रति क्या तुम को मुझ पर विश्वास नहीं है ? पति पत्नी तो हमें बनना ही है।मेरा मन आज जिद्द पर आया है,मैं भटक सकता हूँ रति मुझे सम्हाल लो।गार्डन के एकान्त झुट पुटे में उसने बाहों में भर कर बेतहाशा चूमना शुरू कर दिया था।मै ने भी आज उसे यह छूट दे दी थी ताकि उसका आवेग कुछ शान्त हो किन्तु मनोज की गहरी गहरी साँसे  और अधिक समा जाने की चाह मुझे  भी बहाकाए उस से पूर्व ही मैं उठ खड़ी हुई.
      "अपने को सम्हालो मनोज,यह भी कोई जगह है बहकने की ?..मैं भी कोई पत्थर नहीं इंसान हूँ..कुछ दिन अपने को और सम्हालो।'
 "इतने दिन से अपने को सम्हाल ही तो रहा हूँ।'
      "जो तुम चाह रहे हो वह हमारी समस्या का समाधान तो नहीं है,स्थाई समाधान के लिये अब हाथ पैर मारने होंगे।चलो बहुत जोर से भूख लगी है,एक गरमागरम काफी के साथ कुछ खिला दो,फिर इस विषय में 
मिल कर कुछ सोचते हैं।'
     रेस्टोरेन्ट में बैरे को आर्डर देने के बाद मैं ने ही बात शुरू की--"मनोज तुम्हे अब एक ही काम करना है किसी  तरह अपने माता पिता को जल्दी शादी के लिए तैयार करना है, जो बहुत मुश्किल नहीं है। आखिर वह हमारे शुभ चिन्तक हैं,तुमने उनसे एक बार भी कहा कि शादी इतने दिन के लिये न टाल कर अभी कर दें ।'
 "नहीं यह तो नहीं कहा ।'
     "तो अब कह दो,कुछ पुराना छोड़ने और नए को अपनाने मे हरेक को कुछ हिचक होती ही है।अपनी इन्टरकास्ट मैरिज के लिये आखिर वह तैयार हो गये न..तुम देखना बिना सायों  के शादी करने को भी वह जरूर मान जायेंगे ।'
     मनोज के चेहरे पर खुशी की एक लहर दौड़ गई थी-"यू आर राइट रति यह बात मेरे ध्यान मे क्यों नहीं आई ? खाने के बाद तुम्हे घर छोड़ देता हूँ।कोर्ट मै रेज की डेट भी तो पास आगई है,उसे भी आगे नहीं बढ़ाने दूँगा।'
 "ठीक है अब मैरेज वाले दिन कोर्ट में ही मिलेंगे ।'
 "मेरे आज के व्यवहार से डर गई क्या ?इस बीच फोन करने की इजाजत तो है या वो भी नहीं है ?
 "चलो फोन करने की इजाजत दे देते हैं ।'
     रजिस्ट्रार के आफिस में मैरेज की ओपचारिकताएं पूरी होने के बाद हम दोनो अपने परिवार के साथ बाहर आये तो मनोज के जीजा जी ने कहा -"मनोज अब  तुम दोनो की शादी पर कानून की मोहर लग गई है, रति अब तुम्हारी हुई।'
    "ऐ जम्हाई बाबू यह इंडिया है,वह तो वीसा के लिये यह सब करना पड़ा है वरना इसे हम शादी नही मानते। हमारे घर की बहू तो रति विवाह संस्कार के बाद ही बनेगी।'
    "वह तो मजाक की बात थी मम्मी,अब आप लोग चलें मैं तो इन दोनो से पार्टी ले कर ही आऊँगा।'
    होटल में खाने का आर्डर देने ,के बाद मनोज ने अपने जीजा जी से पूछा "जीजा जी मम्मी तक हमारी फरियाद अभी पहुँची या नहीं ?'
     "साले साहब क्यो चिन्ता करते हो ..हम दोनो हैं न तुम्हारे साथ।...अमेरिका आप दोनो साथ ही जाओगे,मैं ने अभी बात नहीं की है,मैं आप की इस कोर्ट मैरिज हो जाने का इंतजार कर रहा था।आगे मम्मी को मनाने की जिम्मेदारी आपकी बहन ने ली है।..इस से भी बात नहीं बनी तो फिर मैं कमान संभालूँगा ।'
 "हाँ भैया मैं मम्मी को समझाने की पूरी कोशिश करूँगी।'
 "हाँ तू कोशिश कर ले,न माने तो मेरा नाम ले कर  कह देना "आप अब शादी करो या न करो भैया भाभी को साथ ले कर ही जायेंगे ।'
      "वाह भैया,आज तुम सचमुच बड़े हो गये हो '
 "आफटर आल अब मैं एक पत्नी का पति हो गया हूँ।'
 "ओ.के. भैया अब हम लोग चलेंगे,आप लोगों का क्या प्रोग्राम है ?'
 " कुछ देर घूम घाम कर पहले रति को उसके घर छोड़ूँगा फिर अपने घर जाऊँगा।'
 रति के गले में बाहें डालते हुये मनोज ने शरारत से उसे देखा "हाँ रति अब क्या कहती हो,तुम्हारे संस्कार अब मुझे पति मानने को तैयार हैं या नहीं ?'
 मैं ने शरारती नजरों से उसे देखा और कहा --"अब तुम नाइन्टी परसेन्ट मेरे पति हो।'
 "यानि टैन परसेन्ट की अब भी कमी रह गई है... अभी और इंतजार करना पड़ेगा ?'
 "उस दिन का मुझे अफसोस है मनोज,... पर अब मैं तुम्हारी  हूँ।'

     
         पवित्रा अग्रवाल
   ईमेल --  agarwalpavitra78@gmail.com


 

शुक्रवार, 8 मई 2015

समझौता

कहानी    

  


                (     मेरे दूसरे  कहानी संग्रह   'उजाले दूर नहीं "  में से एक कहानी )
                                   
                            समझौता
                                                 पवित्रा अग्रवाल

      जब माँ का फोन आया, तब मैं स्नान घर से बाहर निकल रहा था। मेरे रिसीवर उठाने से पहले ही शिखा ने फोन उठा लिया था।
 माँ उससे कह रही थीं, "शिखा, मैंने तुम्हें एक सलाह देने के लिए फोन किया है। मैं जो कुछ कहने जा रही हूँ, वह सिर्फ मेरी सलाह है, सास के नाते आदेश नहीं फिर भी उम्मीद है तुम उस पर विचार करोगी...और हो सका तो मानोगी भी...'
 -" बोलिए, माँजी ?'
     "शिखा, तुम्हारे देवर पंकज की शादी है। वह कोई गैर नहीं, तुम्हारे पति का सगा भाई है। तुम दोनों का व्यापार अलग है, घर अलग है, कुछ भी तो साझा नहीं है फिर भी तुम लोगों के बीच मधुर संबंध नहीं हैं बल्कि यह कहना अधिक सही होगा कि संबंध टूट चुके हैं। मैं तो समझती हूँ कि अलग-अलग रह कर संबंधों को निभाना ज्यादा आसान हो जाता है। वैसे उसकी गलती क्या है ? बस यही कि उसने तुम दोनों को इस नए शहर में बुलाया...अपने साथ रखा और नए सिरे से व्यापार शुरू करने को प्रोत्साहित किया।.... हो सकता है, उसके साथ रहने में तुम्हें कुछ परेशानी हुई हो...एक-दूसरे से कुछ शिकायतें भी हों किंतु इन बातों से क्या रिश्ते समाप्त हो जाते हैं ? उसकी सगाई में तो तुम नहीं आई थीं किंतु शादी में जरूर आना ...बहू का फर्ज परिवार को जोड़ना होना चाहिए।'
        "तो क्या मैंने रिश्तों को तोड़ा है ? पंकज ही सब जगह हमारी बुराई करते फिरते हैं। लोगों से यहाँ तक कहा है कि "मेरा बस चले तो भाभी को गोली मार दूँ..उसने आते ही हम दोनों भाईयों के बीच दरार डाल दी।'... माँजी, दरार डालने वाली मैं कौन होती हूँ.... असल में पंकज के भाई ही उनसे खुश नहीं हैं। मुझे तो अपने पति की पसंद के हिसाब से चलना पड़ेगा..वह कहेंगे तो आ जाऊँगी।'
          देखो, मैं यह तो नहीं कहती कि तुमने रिश्ते को तोड़ा है लेकिन कभी जोड़ने का प्रयास भी नहीं किया। रही बात लोगों के कहने की तो कुछ लोगों का काम यही होता है...वे इधर-उधर की झूठी बातें करके परिवारों में, संबंधों में फूट डालते रहते हैं और झगड़ा करा कर मजा लूटते हैं...तुम्हारी गलती बस इतनी है कि तुमने दूसरों की बातों पर विश्वास कर लिया... देखो शिखा, मैंने आज तक कभी तुम्हारे सामने चर्चा नहीं की किंतु आज कह रही हूँ, तुम्हारी शादी के बाद किसी ने हमसे कहा था -" आप कैसे घर की लड़की को बहू बना कर लाए हैं।सुना है कि इस की भाभी को दहेज के लिए सब ने मिल कर बहुत सताया था ..परिवार के सभी लोगों का नाम  हत्या के सिलसिले में  पुलिस में दर्ज था।.. कुँआरी लड़की है, शादी में दिक्कत आएगी, यही सोच कर रिश्वत खिला कर उसका नाम, घर वालों ने उस केस से निकलवाया था।'....
           अगर शादी से पहले हमें यह बात पता चलती  तो शायद हम सच्चाई जानने का प्रयास भी करते लेकिन तब तक तुम बहू बन कर हमारे घर आ चुकी थीं।..हमने कहने वाले को फटकारते हुए कहा था--    "शिखा अब हमारे घर की बहू है, आपको हम से इस तरह की बात नहीं कहनी चाहिए...वैसे भी आज कल तो यह फैशन सा हो गया हैं कि लड़की  की ससुराल में न पटे  या किसी वजह से वह आत्महत्या करले तो पूरे परिवार को दहेज के लिए सताने या हत्या के आरोप में फँसा दो।'... शिखा यह सब पुरानी बातें बता कर मैं तुम्हें दुखी नहीं करना चाह रही बल्कि समझाना चाह रही हूँ कि आँखें बंद करके लोगों की बात पर विश्वास नहीं कर लेना चाहिए.. खैर मैंने तुम्हें पंकज की शादी में आने के लिए फोन किया था...मानना, न मानना तुम्हारी मर्जी पर निर्भर करता है।"
            इतना कह कर माँ ने फोन काट दिया था। माँ ने कई बार हम दोनो भाइयों के खराब रिश्तों को लेकर मुझे भी समझाने की कोशिश की थी किंतु मैंने उनकी पूरी बात कभी नहीं सुनी बल्कि उन पर यही दोषारोपण करता रहा कि वह मुझ से ज्यादा पंकज को प्यार करती हैं इसलिए उन्हें मेरा ही दोष नजर आता
है, पंकज का नहीं। इस पर वह हमेशा यहाँ से रोते हुए ही लौटी थीं।
 लेकिन सच्चाई तो यह है कि मैं खुद भी पंकज के खिलाफ था। हमेशा दूसरों की बातों पर विश्वास करता रहा। इस तरह हम दोनों भाईयों के बीच खाई चौड़ी होती गई लेकिन आज फोन पर की गई माँ की बातें सुन कर मैं कुछ हद तक उनसे सहमत हुआ हूँ।माँ यहाँ नहीं रहती । शादी की वजह से ही यहाँ आई हुई है। वह हम दोनों भाइयों के बीच अच्छे संबंध न होने की वजह से बहुत दुखी रहतीं है। इसीलिए यहाँ बहुत कम आतीं है।
           लोग सही कहते हैं, अधिकतर पति पारिवारिक रिश्तों को निभाने के मामले में पत्नी पर निर्भर हो जाते हैं। उसकी नजरों से ही अपने रिश्तों का मूल्यांकन करने लगते हैं। शायद यही वजह है, पुरुष अपने माता-पिता, भाई-बहनों आदि से दूर होते जाते हैं और ससुराल वालों के नजदीक होते जाते हैं।दूसरे शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि महिलाएँ, पुरुषों की तुलना में अपने रक्त संबंधों के प्रति अधिक वफादार होती हैं। इसीलिए अपने पीहर वालों से उनके संबंध मधुर बने रहते हैं बल्कि कड़ी बन कर वे पतियों को भी अपने परिवार से जोड़ने का प्रयास करती रहती हैं। वैसे पुरुष का अपने ससुराल से जुड़ना गलत नहीं है। गलत है तो यह कि पुरुष रिश्तों में संतुलन नहीं रख पाते। वे नए परिवार से तो जुड़ते हैं किंतु धीरे-धीरे अपने परिवार से दूर होते चले जाते हैं।
 भाई-भाई में, भाई-बहनों में कहा सुनी कहाँ नहीं होती लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं होता कि संबंध समाप्त कर लिए जाएँ। मेरे साथ भी यही हुआ। जाने-अनजाने में पंकज से ही नहीं मैं अपने परिवार के अन्य सदस्यों से भी दूर होता चला गया।सही मायने में देखा जाए तो संपन्नता व कामयाबी के जिस शिखर पर बैठ कर मैं व मेरी पत्नी गर्व महसूस कर रहे है, उसकी जमीन मेरे लिए पंकज ने ही तैयार की थी। उसके पूर्ण सहयोग व प्रोत्साहन के बिना अपनी पत्नी के साथ मैं इस अजनबी शहर में रहने व अल्प पूँजी से नए सिरे से व्यवसाय शुरू करने की बात सोच भी नहीं सकता था। उसका आभार मानने के बदले मैंने उस रिश्ते को दफन कर दिया। मेरी उन्नति में मेरे ससुराल वालों का एक प्रतिशत भी योगदान नहीं था किंतु धीरे-धीरे वही मेरे नजदीक होते गए। दोष शिखा का नहीं, मेरा था। मैं ही अपने निकटतम रिश्तों के प्रति ईमानदार नहीं रहा। जब मैंने ही उनके प्रति उपेक्षा का भाव अपनाया तो मेरी पत्नी शिखा भला उन रिश्तों की कद्र क्यों करती ?
          समाज में साथ रहने वाले मित्र, पड़ोसी, परिचित सब हमारे हिसाब से नहीं चलते। हममें मतभेद भी होते हैं, एक-दूसरे से नाखुश भी होते हैं, आगे-पीछे एक-दूसरे की आलोचना भी करते हैं लेकिन  फिर भी संबंधों का निर्वाह करते हैं। उनके दुख-सुख में शामिल होते हैं फिर अपनों के प्रति ही हम इतने कठोर क्यों हो जाते हैं ? उनकी जरा जरा सी त्रुटियों को बढ़ा चढ़ा कर क्यों देखने लगते हैं ? कुछ बातों को नजरअंदाज क्यों नहीं कर पाते ? तिल का ताड़ क्यों बना देते हैं ?
         मैं सोचने लगा, पंकज मेरा सगा भाई है यदि जाने-अनजाने उसने कुछ गलत किया या कहा भी है तो आपस में मिल-बैठ कर मतभेद मिटाने का प्रयास भी तो कर सकते थे। गलत फहमियों को दूर करने के बदले हम रिश्तों को समाप्त करने के लिए कमर कस लें, यह तो समझदारी नहीं है। असलियत तो यह है कि कुछ शातिर लोगों ने दोस्ती का ढोंग रचाते हुए हमें एक-दूसरे के विरुद्ध भड़काया. हमारे बीच की खाई को गहरा किया। हमारी नासमझी की वजह से वे अपनी कोशिश में कामयाब भी रहे क्योंकि हमने अपनों की तुलना में गैरों पर अधिक विश्वास किया।
 मैंने निर्णय कर लिया कि अपने फैसले मैं खुद लूँगा। पंकज की शादी में शिखा जाए या न जाए किंतु मैं समय पर पहुँच कर भाई का फर्ज निभाऊँगा। उसकी सगाई में भी शिखा की वजह से ही मैं तब पहुँच पाया जब प्रोग्राम समाप्त हो चुका था।सगाई वाले दिन मैं जल्दी ही दुकान बंद करके घर आ गया था लेकिन शिखा ने कलह शुरू कर दी
थी। वह पंकज के प्रति शिकायतों का पुराना पुलिंदा खोल कर बैठ गई थी। उसने मेरा मूड इतना खराब कर दिया था कि जाने का उत्साह ही ठंडा पड़ गया। मैं बिस्तर पर पड़ा पड़ा सो गया था। जब नींद खुली तो रात के दस बज रहे थे। मन अंदर से कहीं कचोट रहा था कि तेरे सगे भाई की सगाई है और तू यहाँ घर में पड़ा है। फिर मैं बिना कुछ विचार किए देर से ही सही, पंकज के घर चला गया था।
      मानव का स्वभाव है कि अपनी गलती न मानकर दोष दूसरे के सिर मढ़ देता है जैसे कि यह दोष मैंने शिखा के सिर मढ़ दिया.... ठीक है, शिखा ने मुझे रोकने का प्रयास अवश्य किया था किंतु मेरे पैरों में बेड़ी तो नही डाल दी थीं । दोषी मैं ही था। वह तो दूसरे घर से आई है। नए रिश्तों में एकदम से लगाव नहीं होता। मुझे ही कड़ी बनकर उसको अपने परिवार से जोड़ना चाहिए था जैसे उसने मुझे अपने परिवार से जोड़ लिया है...।
        शिखा की सिसकियों की आवाज से मेरा ध्यान भंग हुआ। वह बाहर वाले कमरे में थी। वह नहीं जानती थी कि मैं स्नान करके बाहर आ चुका हूँ और दूसरे फोन पर माँ व उसकी पूरी बातें सुन चुका हूँ। मैं सहजता से बाहर गया और उससे पूछा-- "शिखा, रो क्यों रही हो ?'
       "मुझे रुलाने का ठेका तो तुम्हारे घर वालों ने ले रखा है। अभी आपकी माँ का फोन आया था... आपको तो पता है न, मेरी भाभी ने आत्महत्या की थी। आपकी माँ ने आरोप लगाया है कि भाभी की हत्या की साजिश में मैं भी शामिल थी " कह कर वह जोर जोर से रोने लगी।
    "बस, यही आरोप लगाने के लिए माँ फोन किया था ?'
 "उनके हिसाब से मैंने रिश्तों को तोड़ा है...फिर भी वह चाहती हैं कि मैं पंकज की शादी में जाऊँ। मैं इस शादी में हर्गिज़ नहीं जाऊँगी, यह मेरा अंतिम फैसला है...तुम्हें भी वहाँ नहीं जाना चाहिए।'
      "सुनो, हम दोनों अपना-अपना फैसला करने के लिए स्वतंत्र हैं। मैं चाहते हुए भी तुम्हें पंकज के यहाँ चलने के लिए बाध्य नहीं करना चाहता किंतु अपना निर्णय लेने के लिए मैं स्वतंत्र हूँ..मुझे तुम्हारी सलाह नहीं चाहिए।'
 "तो तुम जाओगे ?..... तुम्हारे व मेरे खिलाफ वह जगह-जगह इतना जहर उगलता फिरता है फिर भी जाओगे ?"
       " उसने कभी मुझ से या मेरे सामने किसी से ऐसा नहीं कहा। लोगों के कहने पर हमें पूरी तरह विश्वास नहीं करना चाहिए। लोगों के कहने की परवाह मैं ने की होती तो तुम्हें कभी भी वह प्यार न दे पाता, जो मैंने तुम्हें दिया है। अभी तुम माँ द्वारा आरोप लगाए जाने की बात कर रही थीं। पर वह आरोप उन्होंने नहीं लगाया...लोगों ने उन्हें ऐसा बताया होगा। आज तक मैंने भी इस बारे में तुम से कुछ पूछा या कहा नहीं...आज कह रहा हूँ..तुम्हारे ही कुछ परिचितों ने मुझ से भी कहा था कि शिखा बहुत तेज मिजाज की लड़की है। अपनी भाभी से भी उसकी  नहीं पटती थी। सब के जुल्मों से परेशान होकर उसकी भाभी की मौत हुई थी। पता नहीं वह हत्या थी या आत्महत्या'...लेकिन मैंने उन लोगों की परवाह नहीं की...'
     " क्या तुम भी मुझे अपराधी समझते हो ? मैं तो बस इतना जानती हूँ कि यह  हमारे कुछ दुश्मनों की साजिश थी।... हमारे परिवार को फसाया गया था..इसी वजह से मेरी शादी में कई बार रुकावटें आर्इं।'
     "मैं तुम्हें अपराधी नहीं समझता...न ही मैंने कभी उन लोगों की बातों पर विश्वास किया था। अगर विश्वास किया होता तो तुम से शादी न करता। पर हम यह क्यों नहीं सोचते कि जैसे वह सब बातें पूरी तरह से सच नहीं थीं  वैसे ही पंकज के खिलाफ हमें भड़काने वालों की बातें भी झूठी हो सकती है, उन्हें हम सत्य क्यों मान रहे हैं ?'
     "लेकिन मुझे नहीं लगता कि ये बातें झूठी हैं।.... खैर, लोगों ने सच कहा हो या झूठ, मैं तो उन की शादी में नहीं जाऊँगी। एक बार भी उन्होंने मुझ से शादी में आने को नहीं कहा।'
     "कैसे कहता ?..सगाई पर आने के लिए तुम से कितना आग्रह कर के गया था। यहाँ तक कि उसने
तुमसे अनजाने में हुई किसी गल्ती के लिए माफी भी माँगी थी फिर भी तुम नहीं गर्इं। इतना घमंड अच्छा नहीं...उसकी जगह मैं होता तो मैं  भी दोबारा बुलाने न आता।'
      " सब नाटक था .....लेकिन आज तुम्हें क्या हो गया है ?... आज तो पंकज की बड़ी तरफदारी कर रहे हो ?'
 तभी द्वार की घंटी बजी । पंकज आया था। उसने शिखा से कहा-- "भाभी, भैया से तो आपको साथ लाने की कह चुका हूँ, आप से भी कह रहा हूँ। आप आएँगी तो मुझे खुशी होगी। अब मैं चलता हूँ, बहुत काम करने को पड़े हैं।'
      पंकज प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा किए बिना लौट गया। मैंने पूछा-- "अब तो तुम्हारी यह शिकायत भी दूर हो गई कि तुम से उसने आने को नहीं कहा.. अब क्या इरादा है ?'
    "इरादा क्या होना है...हमारे पड़ोसियों से तो एक सप्ताह पहले ही आने को कह गया था। मुझे एक दिन पहले न्योता देने आया है। असली बात तो यह है कि मेरा मन उनसे इतना खट्टा हो गया है कि मैं जाना नहीं चाहती...मैं नहीं जाऊँगी।'
    "तुम्हारी मर्जी' कह कर मैं दुकान पर चला आया।
       थोड़ी देर बाद ही शिखा का फोन आया -- 'सुनो, एक खुशखबरी है... मेरे भाई हिमांशु की शादी तय हो गई है...दस दिन बाद ही शादी है।...उसके बाद कई महीने तक शादियाँ नहीं होंगी...इसीलिए जल्दी शादी करने का निर्णय लिया है।'
 "बधाई हो, कब जा रही हो ?'
 "पूछ तो ऐसे रहे हो, जैसे मैं अकेली ही जाऊँगी..तुम नहीं जाओगे ?'
 "तुमने सही सोचा, तुम्हारे भाई की शादी है, तुम जाओ, मैं नहीं जाऊँगा।'
 "यह क्या हो गया है तुम्हें...कैसी बातें कर रहे हो ? मेरे माँ-बाप की जग-हँसाई कराने का इरादा है क्या ? सब पूछेंगे, दामाद क्यों नहीं आया तो क्या जवाब देंगे ? लोग कई तरह की बातें बनाएँगे..'
 "बातें तो लोगों ने तब भी बनाई होंगी जब एक ही शहर में रहते हुए सगी भाभी होकर भी तुम देवर की सगाई में नहीं गर्इं..और अब शादी में भी नहीं जाओगी। जग-हँसाई क्या यहाँ नहीं होगी या फिर इज्जत का ठेका तुम्हारे खानदान ने ही ले रखा है...हमारे खानदान की तो कोई इज्जत ही नहीं है ?'
 "मत करो तुलना दोनों खानदानों की...मेरे घर वाले तुम्हें बहुत प्यार करते हैं...क्या तुम्हारे घर वाले    मुझे वह इज्जत व प्यार दे पाये ?'
 "हरेक को इज्जत व प्यार अपने व्यवहार से मिलते है।'
 "तो क्या तुम्हारा अंतिम फैसला है कि तुम मेरे भाई की शादी में नहीं जाओगे ?'
 "अंतिम ही समझो यदि तुम मेरे भाई की शादी में नहीं जाओगी तो मैं भला तुम्हारे भाई की शादी में क्यों जाऊँगा ?'
 "अच्छा, तो तुम मुझे ब्लैकमेल कर रहे हो ?' कह कर शिखा ने फोन रख दिया।
 दूसरे दिन पंकज की शादी में शिखा को आया देख कर माँजी का चेहरा खुशी से खिल उठा था। पंकज भी बहुत खुश था।
 माँ ने स्नेह से शिखा की पीठ पर हाथ रखते हुए कहा -- "शिखा, तुम आ गर्इं, मैं बहुत खुश हूँ..मुझे तुम से यही उम्मीद थी।'
 "आती कैसे नहीं, मैं आपकी बहुत इज्जत करती हूँ। आप के आग्रह को कैसे टाल सकती थी ?'
 मैं मन ही मन मुस्कुराया। शिखा किन परिस्थितियों के कारण यहाँ आई, यह तो बस मैं ही जानता हूँ। उसके ये संवाद भले ही झूठे थे पर अपने सफल अभिनय द्वारा उसने माँ को प्रसन्न कर दिया था।... यह हमारे बीच हुए समझौते की एक सुखद सफलता थी।

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        -पवित्रा अग्रवाल
 

  
  ईमेल --  agarwalpavitra78@gmail.com
 


गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

रिमोट कंट्रोल


कहानी   
 
                 रिमोट कंट्रोल

                                                    पवित्रा अग्रवाल

     
          मुझे रसोई में काम करता देख कर नेहा मेरे पास आ गई --"दीदी क्या कर रही हो ?'
        "कुछ नहीं नेहा किचन कुछ फैल रहा था,सोचा जरा ठीक कर दूँ।'
        "क्या दीदी रात के ग्यारह बज रहे हैं और आप अभी तक रसोई में ही लगी हो ,यह सब काम कल भी तो हो सकते हैं ।इस समय तो आपको जीजा जी के पास होना चाहिए था,वो खाली बैठे टी.वी में टाइम पास कर रहे हैं और आप यहाँ ...।''
       "अरे वो टाइम पास नहीं कर रहे, अपनी पसंद के प्रोग्राम देख रहे हैं ।''
      "जब आप पास नहीं होंगी तो आदमी कुछ तो करेगा ।''
 मैं ने एक क्षण को उस की तरफ नजर उठा कर देखा तो मुझे लगा कि नेहा घुमा फिरा कर मुझ से कुछ कहना चाहती है पर स्पष्ट शब्दो में कुछ कह नहीं पा रही ।मैं ने नेहा से कहा --"तू कुछ कहना चाहती है ?'
       वह एकदम से सकपका गई फिर बोली--"दीदी आज जब हम जीजा जी के साथ बाहर गए थे तो वह कह रहे थे कि "तुम्हारी दीदी के पास तो हमारे लिए समय ही नहीं है,दो लोगों का काम ही कितना होता है ,हमारा खाना रात नौ बजे तक निबट जाता है फिर भी न जाने क्या करती रहती हैं, रोज कमरे में आते आते ग्यारह बजा देती हैं ।'...मैं भी यही देख रही हूँ ।''
      मैंने सोचा यदि मैं शान्त रहती हूँ , कोइ शिकवे शिकायत नहीं करती हूँ या हर दम टी.वी. से चिपके रहने का उलाहना भी नहीं देती हूँ तो अब शिकायत भी वही करेंगे । अरे बोर तो मैं हो रही हूँ,घर में इधर उधर घूम के व्यर्थ के काम करके टाइम तो मैं पास कर रही हूँ---" नेहा तू बिल्कुल ठीक कह रही हैं ,सचमुच मुझे किचन में कोइ काम नहीं है,फालतू की सटर पटर करके टाइम तो मैं पास कर रही हूँ।''
  "आप उनके साथ बैठ कर टी.वी. क्यों नहीं देख लेतीं ?''
 "मेरी रुचि का कुछ हो तो देखूँ न,उनके साथ बैठ कर टी.वी. देखते समय मुझे लगता है मैं टी.वी. नहीं बाइसकोप देख रही हूँ...तुझे याद है न जब हम छोटे थे तब गली में बाइसकोप वाला आता था,उस बाइस्कोप में छोटे छोटे छह सात ढ़क्कन लगे होते थे और वह ढ़क्कन हटा कर छह सात बच्चे एक साथ बाइस्कोप देखने के लिये उसमें आँखे गढ़ा देते थे ।बाइस्कोप वाला एक एक सीन दिखाता जाता था.."बच्चों ये आगरा का ताजमहल देखो,ये जयपुर का हवा महल देखो,ये आमेर का किला देखो,ये दिल्ली की कुतुब मीनार देखो...ये लखनऊ का इमामवाड़ा देखो....वहाँ आवाज व दृश्य में कुछ ताल मेल तो होता था फिर एक सीन समाप्त होने के बाद ही दूसरा सीन आता था और यहाँ एक- एक, दो-दो मिनट पर रिमोट से चैनल बदलते रहते हैं।...अभी हिस्ट्री चैनल लगा, क्षण भर बाद ज्योगरफी चैनल आ गया,जरा घ्यान वहाँ टिकाने की कोशिश की तो फिर शेयर बाजार या कोई न्यूज चैनल आ गया, कभी गाने, कभी सीरियल,कभी कुछ, कभी कुछ  मतलब कोई भी एक प्रोग्राम लगा कर देख ही नहीं सकते।..सच कहूँ तो मेरा सर भन्नाने लगता है पर मैं फिर भी उनसे कोई शिकायत नहीं करती।''
          "दीदी यह तो अब हर घर की कहानी है, कहीं इन वजहों से बीबी परेशान है और कहीं मियां ।मेरा एक कुलीग बता रहा था कि "घर जल्दी जाकर क्या करूँ ...सास बहू दोनो मिल सास - बहू वाले सीरियल देखने में व्यस्त रहती हैं।'...यों होता तो मेरे साथ भी यही है पर आप उन्हें अपनी प्रोबलम बता सकती हो,कोई खास अपनी पंसद का प्रोग्राम देखना हो तो उन्हें चैनल बदलने से रोक सकती हो ।..मैं नहीं समझती कि वह नहीं मानेंगे... जीजा जी आप का तो बहुत ख्याल रखते हैं ।'
        "तो क्या मैं ने कभी तुम लोगों से जीजा जी की बुराई की है ? वह मेरा बहुत घ्यान रखते हैं यह बात भी तुम सब को मैं ने ही बताई है,वह बात गलत भी नहीं है ।सचमुच जब बच्चे छोटे थे और रात में  उठ कर कभी
रोते थे तो शायद ही कभी ऐसा हुआ होगा कि मैं बच्चे को लिए बैठी हूँ और ये आराम से सो रहे हैं,हमेशा मेरे साथ ये भी जगे हैं ।.मैं जो भी खाना बनाती हूँ  खाने में भी नखरे नहीं करते ..और भी बहुत सी क्वालिटीज हैं जो आम पुरुषों में नहीं होतीं ।''
       "बहुत भाग्यशाली हो दीदी आप जो इतना अच्छा जीवन साथी मिला है वैसे आप भी तो घर व बच्चों के लिए पूरी तरह समर्पित रही हो....सर्विस भी छोड़ दी थी।'
       'अच्छे हैं इसका मतलब यह भी नहीं कि उनमें कुछ कमियां या कमजोरियाँ हैं ही नहीं पर कमियाँ तो सब में होती हैं,मुझ में भी होंगी और शादी में सामन्जस्य तो दोनो को ही करना पड़ता है तभी साथ लम्बा चलता है।...पर मैं ने उनकी क्वालिटीज को देखा है । मैं जानती हूँ कि पूरे दिन के व्यावसायिक तनावों को झेलने के बाद आदमी को घर में सुकून मिलना चाहिये।जो आदमी सम्पन्नता होते हुए भी क्लब नहीं जाता,दोस्तो में नहीं घूमता फिरता , उसको इतनी स्वतन्त्रता तो होनी चाहिए कि वह मनोरंजन के लिए अपने घर में अपनी पसंद के प्रोग्राम देख सके या अपनी पसंद की पुस्तक पढ़ सकें ।बस यही सोच कर मैं आम तौर पर उन्हें डिस्टर्ब नहीं करती ।मुझे अपनी पसंद का कोई प्रोग्राम देखना होता है तो लिविंग रूम में बैठ कर देख लेती हूँ या फिर वह काम करने लगती हूँ जो आमतौर पर इनके घर में रहते हुए नहीं करती ताकि कुछ समय इनके साथ बैठ कर बिता सकूँ ।''
      "जिस गहराई से आप अपनी समस्या समझ सकती हो हम दूर रहने वाले उस रूप में नहीं समझ सकते ।यद्यपि रिमोट से खेलने या बार बार चैनल बदलने की बीमारी तो ज्यादातर लोगों में होती है, मेरी कुछ सहेलियाँ  भी इस से त्रस्त हैं।''
       "सोचने की बात यह है कि यदि मैं शिकायत नही करती या शान्त दिखती हूँ सका मतलब यह नहीं कि मैं पत्थर हूँ या मैं इन हालात से खुश हूँ।... मैं भी पूरे दिन अकेले इस घर में बिता देती हूँ ।कभी कभी पछतावा भी होता हे कि अच्छी खासी नौकरी करती थी,बच्चों की सही देख भाल कर सकूँ इस लिए छोड़ दी।..शायद इसी लिए अपना फ्रेण्ड सर्किल भी नहीं बन पाया।'
 "जीजा जी का फ्रेण्ड सर्किल तो होगा ?'
 "न के बराबर ।'
 " फिल्मों का शौक है ?'
 "बिलकुल नहीं ।'
 "हमारे यहाँ उल्टा है।इनको फिल्मों का बहुत शौक है।मुझे उतना नहीं है पर इनको कम्पनी देने के लिए देख लेती हूँ ...फिर आप दिन में कैसे समय बिताती हो ?'
      "अपनी पसंद की पुस्तकें पढ़ लेती  हूँ ,टी.वी देख लेती हूँ फिर भी आँखे घड़ी पर ही टिकी रहती हैं कि  बस ये अब आते होगे ,जनाब आए खाना खाया और बस अपने कमरे में जा कर टी वी देखने में  व्यस्त हो जाते हैं तो मन आहत होता है। कभी अकेले में बैठ कर रो भी लेती हूँ पर फिर अपने को समझा लेती हूँ कि तू पत्नी है जेलर नहीं ...पर अफसोस तो तब होता है जब  शिकायत भी वही करते हैं कि मेरे पास उनके लिए समय नहीं है।''
       न जाने कब से हमारी बातचीत के खामोश श्रोता बने नेहा के पति सौरभ एक दम से प्रकट हुए और बोले --"अरे दीदी आप ऐसा क्यों समझती हैं कि उनके पास आप के लिए समय नहीं है ।हम पुरुष होते ही ऐसे हैं। अब मुझे ही लें मैं चाहे बुक पढ़ता रहूँ या टीवी देखता रहूँ पर नेहा साथ बैठी होती है तो एक सुकून का अहसास सा होता है कि हम साथ साथ हैं।''
 "पर सौरभ, दूसरे को क्या अहसास हो रहा है यह जानना जरूरी नहीं है क्या ?''
 "दीदी आपको तो पढ़ने का बहुत शौक है जब वह टी.वी देख रहे हों तो आप अपनी पसंद की पुस्तक पास बैठ कर पढ़ सकती हैं ...आराम तो कर ही सकती हैं।''
       "सब कर के देख चुकी हूँ ।...बदलते टी.वी चैनलों के शोर के बीच पढ़ने में एकाग्रता नहीं आ पाती और कई बार तो एक पेज पर ही अटक कर रह जाती हूँ ।रही बात आराम करने की तो लाइट और टी.वी के शोर के बीच वह भी संभव नहीं होता । कई बार तो मैं दूसरे कमरे में जा कर सो जाती हूँ''
     "अरे भई यहाँ क्या चर्चा - परिचर्चा हो रही है क्या हम भी शामिल हो सकते हैं ?''
 "हाँ ,जीजा जी आइए न बस आपकी ही कमी थी ।''सौरभ  ने कहा
      पास खड़ी नेहा थोड़े तनाव में आगई--"दीदी जीजा जी मेरे बारे में न जाने क्या सोचेंगे कि एक  बात मन
की कह दी तो साली जी ने फौरन अपनी बहन को बता दी ।''
 "नहीं नेहा तू ऐसा क्यो सोचती है ,मुझे बता कर तो तूने हम दोनों का भला ही किया है।..हम इस पर नए तरीके से विचार कर सकते हैं ।'
 "अरे तुम्हारे किचन का काम अभी निबटा या नहीं..ग्यारह बज चुके हैं ?''
  "मेरा काम तो नौ बजे ही निबट गया था...तुम बताओ तुम्हारे टी.वी. दर्शन का प्रोग्राम अभी समाप्त हुआ  या नहीं ?''
      "टी.वी. तो मैं इस लिए देखता रहता हूँ कि तुम फ्री नहीं होतीं '
 "तुम टी.वी में डूबे होते हो इस लिए मैं ढ़ूंढ़-ढ़ूंढ़ कर काम करती रहती हूँ ।''
  "तो तुम भी टी.वी देखो न कुछ चेन्ज होगा ।''
 "तुम्हारे साथ बैठ कर टी.वी.देखने से तो मेरा दिमाग खराब होने लगता है  ।'
 "क्या मतलब ?''
 "मतलब क्या, बताओ क्या देखूँ ?'
  "जो चाहो वो देखो तुम्हें कौन रोकता है ।'
   "एक टी.वी पर दो लोग अपनी पसंद का प्रोग्राम कैसे देख सकते हैं ?...जो मैं देखना चाहती हूँ वह तुम्हे बकवास लगता है ,जो तुम देखते हो उसे में से बहुत कुछ मेरी रुचि का नहीं होता फिर भी मैं देख सकती हूँ पर तुम्हारा यह रिमोट से खेलना या कहूँ कि हर मिनट चैनल बदलना  मेरे सिर में दर्द कर देता है ।''
     "अरे यार इसमें परेशान होने की क्या बात है,रिमोट अपने हाथ में ले लो और जो देखना चाहो वह देखो ,नींद आ रही है तो टी.वी बन्द कर दो पर प्लीज कुढ़ो मत।''
 नेहा और सौरभ प्रशंसात्मक नजरो से उन्हें देखते हुए बोले--"देखो दीदी जब तक आप अपनी परेशानी बताओगी नहीं दूसरा कैसे समझेगा ...?''
      "लेकिन यह सब कह कर मैं अपनी परेशानी बयां नहीं कर रही हूँ इनकी शिकायत का जवाब  दे रही हूँ...।कभी कभी इस सब से परेशान होती जरूर हूँ पर अपने को समझा लेती हूँ कि  सब की अपनी पसंद व अपने शौक होते हैं और उनको जीवन में शामिल करना ही चाहिए पर अति हर चीज की बुरी होती हैं...देखो न नेहा बच्चे बहुत दूर हैं साल दो साल में कुछ दिन के लिए आ पाते हैं ।हम दोनो को तो अकेले ही रहना है ...जब तक साथ हैं एक दूसरे का ख्याल भी रखना है।''
  "तभी तो कहता हूँ जब तक साथ हैं रूठी रूठी मत फिरो,शिकायत है तो लड़ लो...''
 "वही तो नहीं आता...
 "तो अब सीख लो",तुम्हें उदास देखता हूँ तो मुझे अब तक की अपनी सब उपलब्धियाँ बेमानी सी लगती हैं।''
 मैंने मन में सोचा कुछ ज्यादा ही इम्प्रेसिव डायलौग हो गए हैं,अब बस करो।
 "जाओ दीदी अब सो जाओ ,हम भी सोते हैं फिर सुबह हमें ट्रेन पकड़नी है.. हमारे चक्कर में आपको भी जल्दी उठना पड़ेगा ।''
 ''तू भी क्या बात करती है नेहा,तू जा कर सो मैं समय से उठ जाऊंगी ।'
      दूसरे दिन रिमोट मेरे हाथ में था ।ओ आज तो "सा रे ग म' आएगा और "वोइस आफ इंडिया' भी । ये हम दोनो के ही पसंदीदा प्रोग्राम है किन्तु ये उनके साथ अन्य चैनलो की भी सैर करते रहतें हैं अत: आधा अधूरा देख पाती थी आज पूरा देखूँगी ।
 एक दिन, दो दिन, तीन दिन अब ये कसमसाने लगे थे -- "अरे यार ये क्या सास बहू के बकवास सीरियल देखती हो।जब जिस को चाहा मार दिया ,जब चाहे जिन्दा कर दिया ।प्लास्टिक सर्जरी से चेहरा बदल दिया, एक्सीडेंन्ट में मेमोरी चलीगई,साजिशों का जाल फैला होता है.. सब में एक से ही फार्मूले, इन्हें देख कर तुम लोगों को पता नहीं  क्या मिलता है।...''
  "मैं कहाँ देखती हूँ,मुझे तो ऐसे सीरियल खुद पसंद नहीं हैं। कुछ नहीं होता उनमें वही रोना धोना,साजिशें
।..इन सब से तो अच्छा हैं म्यूजिक व डांस के प्रोग्राम देखो,कोमेडी सीरियल देखो,कौन बनेगा करोड़ पति जैसे ज्ञानवर्धक प्रोग्राम देखो  और वह देखती भी हूँ ।''
 "देखो न कौन मना करता है,मैं भी रिमोट से खेलता नहीं हूँ,बीच बीच में यह सब देखता हूँ ।पर इन सब 
के साथ न्यूज चैनल भी देखने चाहिए ताकि पता रहे कि देश विदेश में, राजनीति में,समाज में क्या हो रहा है।''
       "मुझे भी न्यूज अच्छी लगती हैं पर वे भी तिल का ताड़ बना देते हैं,सनसनी फैलाने में पीछे नहीं रहते। तुम्हें याद है कुछ साल पहले किसी शहर में एक लड़की व एक लड़का शायद पुलिस मुठभेड़ में मारे गऐ थे।मीडिया  ने लड़की के घर वालो , पड़ौसियों , कालेज के साथियों आदि सब से बातचीत दिखा कर टी.वी पर उसकी बड़ी अच्छी इमेज रखी थी पर बाद में पोल खुली कि किस तरह वह एक आतंकवादी के साथ थी और उसके घर का खर्चा भी उसकी इसी कमाई से चल रहा था ..पूरी छान बीन के बिना  इस तरह की विस्तृत न्यूज नहीं आनी चाहिए ।''
  "हाँ सो तो है।''
       'प्रो.मटुकनाथ और जूली को भी कई दिन तक, दिन में कई कई बार इतना हाइलाइट किया गया कि वह तो अपने को हीरो ही समझने लगे होंगे।कहने का मतलब यह हैं कि न्यूज- न्यूज की तरह ही आनी चाहिये ।पता नहीं ये कैसी पत्रकारिता है,पत्रकार की खासियत ही है कि कम से कम शब्दों में अधिक बात कह देना पर अब  क्या हो रहा है किसी एक समाचार को उठा लिया और उसी को आधा-आधा घन्टे तक रिपीट करते रहते हैं जैसे दर्शक मंद बुद्धि हैं एक बार में तो वह समझ ही नहीं पायेंगे और ऐसा करीब करीब रोज ही होता है ।'
      "हाँ आज देखो न "सलमान के घर गणेश' इस को बार बार दिखा कर बोर कर दिया है ।'
 "पिछले दिनों शिल्पा शेट्टी और गेर के चुम्बन प्रसंग पर हाय तोबा मची रही और मजे की बात यह थी कि जिस प्रसंग की आलोचना की जा रही थी उस चुम्बन के सीन को बार बार परोसा जा रहा था ।' 
   "सब टी आर पी बढाने का चक्कर है ।...मैं तो ऐसे चैनल बदल देता हूँ । चलो तुम यहाँ देख लो मैं लिविंगरूम में टी वी देख लेता हूँ।''
 "अरे वहाँ क्यूँ जाते हो,यह लो रिमोट ..वैसे भी मैं ज्यादा देर टी.वी नहीं देख सकती और इस समय कुछ मेरी पसन्द का आ भी नहीं रहा है।''
   'तो फिर लाओ रिमोट, वैसे भी यार रात को तो बिस्तर पर लेट कर ही टी वी देखने में मजा आता है।''
 "मुझे मालुम है तुम्हें क्या अच्छा लगता है ..तभी तो मैं तुम से कुछ नहीं कहती।बाहर टी वी देखते हुए अपना कुछ काम भी निपटा लेती हूँ।''
  "काम क्या निबटाती हो कुढ़ती रहती हो ।''
 "जो भी हो पर तुम्हारी शान्ति तो भंग नहीं करती ।हाँ जब बहुत जोर से नींद आ रही हो और अपने कमरे  में चैन से सो भी न सकूँ तो क्या मुझे कुढ़ने का भी हक नहीं है ?.
  "नींद आ रही हो तो टी.वी  बन्द कर दो ....नेहा अपने पति के साथ कुछ दिन को आई थी उसके सामने तमाशा करना जरूरी था क्या ?''
  "तमाशा ,मैंने कोई तमाशा नहीं किया । मैंने तो सदा अपनी खुशी बांटी हैं और आँसू चुपचाप पिए हैं।'
 "हाँ मैं ने तो जैसे  तुम्हें खूब रुलाया  ही है ।'
       "मैं ने ऐसा तो नहीं कहा पर यह भी सच है कि मैं ने कभी तुम्हारी बुराई किसी से नहीं की ।नेहा से मैं ने नहीं तुमने ही कहा था कि तुम्हारी दीदी के पास मेरे लिए समय ही नहीं हैं,मुझे यह सुन कर अफसोस हुआ कि जो शिकायत मुझे करनी चाहिए थी वह भी तुम्ही कर रहे हो ...सफाई में अपना पक्ष तो मुझे भी रखना चहिए था या नहीं .... अब तो जैसे हर बिजली के उपकरणों के रिमोट कट्रोल आने लगे हैं काश कोई ऐसा रिमोट भी बन जाए जो मानव मन को भी कन्ट्रोल कर सके तो कितना अच्छा हो ।....लो सम्हालो रिमोट और निश्चिन्त  हो कर टी.वी देखो पर जब मुझे नींद आ रही होगी तो मैं तुम्हारे कहे अनुसार यह टी.वी बंद कर दूँगी तब चिढ़ना नहीं ।''

 
पवित्रा अग्रवाल
 
"उजाले दूर नहीं "   कहानी संग्रह में से एक कहानी

ईमेल --  agarwalpavitra78@gmail.com

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