शुक्रवार, 13 मई 2016

आखिर क्यों

    कहानी              आखिर क्यों   
                                                                        
                                                                         पवित्रा अग्रवाल                            
               
       कॉलेज से लौटी तो घर का वातावरण कुछ असहज सा लगा। रोज किवाड़ चाची खोलती थीं, आज माँ ने खोले थे और चाची का कहीं अता-पता नहीं था।इस समय रोज चाची मेरा इंतजार करती मिलती थीं। फिर हम दोनों मिल कर साथ खाना खाते थे।चाचा की शादी के बाद से घर मुझे बहुत प्यारा लगने लगा था।पहले मुझे घर में कंपनी देने वाला कोई नहीं था।न कोई भाई-बहन,न बुआ।दादी के पास बैठने का मतलब था सिर्फ उपदेश "जीन्स नहीं पहनो,सलवार सूट पहनो।घर का काम काज सीखो,'  ...यों चाची मेरी हम उम्र नहीं है ,मुझ से चार-पाँच वर्ष बड़ी हैं किंतु उम्र का ये अन्तराल कुछ भी मानी नहीं रखता, वह मुझे कभी बहन, कभी भाभी और कभी सहेली सी लगती हैं।हम दोनों में खूब अच्छी पटती रही है।
     जब से चाचा की मौत हुई है वह पत्थर बन गई है। हर समय अपनी किस्मत को कोसती रहती है।बड़ी मुश्किल से उन्हें सम्हाला है लेकिन घर में कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है कि वह अधिक दिन तक सामान्य नहीं रह पातीं ..यह कहना अधिक सही होगा कि दादी उन्हें सहज नहीं रहने देतीं।वह चाचा की मौत के लिए चाची को ही जिम्मेदार ठहराती  हैं।उनके हिसाब से चाची के पाँव इस घर के लिए शुभ नहीं हैं,वह मनहूस हैं।
     पापा और छोटे चाचा दादी को उनके इस व्यवहार के लिए कई बार समझा चुके हैं कि माँ ये शुभ- अशुभ कुछ नहीं होता।तुम्हारा बेटा बस इतनी ही उम्र लिखा कर लाया था, इस में बेचारी बहू का क्या दोष है ? तुम्हारे दुख से उसका दुख कही विशाल है।उसे सम्हालो,उसे सांत्वना दो,उसका मनोबल  बढ़ाओ माँ। उसकी जिजीविषा को कम मत करो।'
      पापा ने तो एक बार यहाँ तक कह दिया था कि राहुल तो प्रेम विवाह करना चाहता था किंतु लड़की मंगली है,यह शादी नहीं हो सकती कह कर तुमने उसका दिल तोड़ दिया था और खाना पीना छोड़ कर बैठ गई थी। लड़का अच्छा था, तुम्हारी जिद्द के सामने उसने हार मान ली थी।यह शादी तुम्हारी मर्जी से अच्छी तरह जन्म पत्री मिलवाने के बाद हुई थी,अब तुम किसी को दोष नहीं दे सकती माँ।'
      किंतु दादी कहाँ हथियार डालने वाली थीं बोलीं -"भगवान जाने जो जन्म पत्री हमें दी गई थी वह वास्तविक भी थी या नहीं..मुझे तो अब ऐसा लगने लगा है कि यहाँ भी हमें धोखा दिया गया था।'
      पापा ज्यादा बहस नहीं कर पाए।खीज कर बोले -"माँ बहस में आप से कोई नहीं जीत सकता।जो मन में आए करो।'
      मैं यह सब सुनती रही थी और मन ही मन उबलती रहती थी किंतु कुछ कहने का साहस नहीं जुटा पाती थी। चाचा को अपनी इच्छा के विरुद्ध यह शादी करनी पड़ी थी परंतु उनका उत्साह कहीं खो गया था शायद इसी लिए वह कहीं हनीमून पर भी नहीं गए थे।चाची से उनका व्यवहार कैसा था यह मैं नहीं जानती।
      चाचा बैंक में थे।उनकी मौत के बाद बैंक में जब चाची को नौकरी देने की बात उठी तो दादी ने कहा "बैंक में बात करके देखो कि यह नौकरी मृतक की पत्नी की जगह उसके भाई को दी जा सकती है क्या ? बसंत कब से नौकरी के लिए कोशिश कर रहा है किंतु सफलता नहीं मिल रही।'
      इतने दिनों से खामोश चाची ने पहली बार मुह खोला था "नहीं मम्मी जी यह नौकरी तो मैं ही करूँगी,यही मेरे जीने का सहारा होगी।'
     घर के अन्य सब सदस्यों ने भी चाची की हाँ में हाँ मिलाई थी।तब से दादी चाची से और अधिक नाराज रहने लगी थी।
      आज भी जरूर कुछ हुआ है।मुझे घर में आए इतनी देर हो चुकी है परंतु अभी तक चाची का कहीं पता नहीं है ...जरूर वह अपने कमरे में बैठ कर रो रही होगी।मेरा अनुमान सही निकला।वह अपने कमरे में थीं। उनकी आँखें रोते -रोते सूज गई थीं।
                मुझे देखते ही वह मुझ से लिपट कर रोने लगीं -"दीपा में क्या करूँ ...कहाँ जाऊँ ? अब जिया नहीं जाता। माँ-बाप हैं नहीं ,भाई-भाभी मेरी शादी कर के विदेश चले गए थे और मेरी इस दुख की घड़ी में भी नहीं आ पाए। जरूर उनकी कुछ मजबूरी रही होगी।इसका मतलब यह तो नहीं कि वह मुझ से प्यार नहीं करते।वैसे वह आ कर भी क्या कर लेते ?...अपने दुख तो मुझे खुद ही सहन कर ने होंगे।...बैक की यह नौकरी भी मैं इसी लिए करना चाहती हूँ ताकि व्यस्त रह सकूँ और किसी पर बोझ न बनूँ ।में घर में कुछ दिन और रही तो लगता है पागल हो जाऊँगी या कुछ कर बैठूँगी लेकिन मम्मी जी तो मुझे रुलाने का कोई न कोई बहाना ढूँढ़ती रहती हैं...अब ज्यादा परेशान करेंगी तो मैं यह घर छोड़ दूँगी।'
     मुझे दादी पर बहुत गुस्सा आ रहा था।आखिर वह अपने को समझती क्या हैं..ठीक है यह मकान उन्हीं के नाम है, दादा जी बहुत पैसा छोड़ गए है इसलिये वह किसी पर आश्रित नहीं है।इसका मतलब यह तो नहीं कि वह किसी को कुछ समझें ही नहीं।पता नहीं घर के अन्य सदस्य उनसे सम्मान वश कुछ नहीं कह पाते या उनकी दौलत कही उन्हें विरोध का स्वर ऊँचा करने से रोकती रही है ।किंतु मुझ पर उनका रौब कुछ ज्यादा नहीं चल पाता।उनसे बचने का में ने एक ही तरीका अपना रखा है कि में उनके पास बैठती ही नहीं।पर आज मेरा मन उन से झगड़ने को कर रहा था। में उठने को हुई पर मेरे हाव-भाव देख कर चाची ने मुझे रोक लिया "दीपा आप मेरी तरफ लेकर मम्मी जी से कुछ नहीं कहेगी ,आप को मेरी कसम है।'
      दूसरे दिन सुबह मैं कॉलेज जाने के लिए निकल ही रही थी कि दादी सामने आ गयी। वह पूजा करके मंदिर से लौटी थीं।मुझे देखते ही बोली - "ठहर दीपा ,पूजा पाठ में तो तुझे रुचि है नहीं ,प्रसाद तो लेती जा।'
      मैंने पूजा की थाली में से प्रसाद लेते हुए दादी से पूछा -"दादी आप भगवान में विश्वास करती हैं ?'
      "तू कैसा बेवकूफी का प्रश्न पूछ रही है दीपा ?..क्या तू रोज मुझे पूजा पाठ करते,मंदिर जाते नहीं देखती ?'
      "हाँ वो सब तो देखती हूँ फिर भी पूछ रही हूँ।सुना है जीवन - मृत्यु भगवान के हाथ में है।भगवान की बिना इच्छा के संसार में कुछ भी नहीं हो सकता ?'
      "तूने बिल्कुल ठीक सुना है बिटिया।बिना भगवान की इच्छा के तो पत्ता भी नहीं हिलता।'
      "लेकिन दादी जीवन और मृत्यु तो अब पूरी तरह भगवान के हाथ में नहीं रहे।सही समय पर डॉक्टर की मदद मिल ज़ाए तो कितने ही लोगों को नया जीवन मिल जाता है और यदि कोई अपनी ही जान लेना चाहे तो उसे कौन रोक सकता है ?'
     "नहीं बेटा यह सब मानव का भ्रम है।सच पूछो तो उसके हाथ में कुछ नहीं है, बस परिस्थिति वैसी बन जाती हैं। किस को कितना जीना है सब पहले से निश्चित होता है।'
     "दादी आप तो बहुत ज्ञानी है।मुझे बस एक बात बताइए जब जीवन मृत्यु पर मानव का वश नहीं है फिर सब चाचा की मौत के लिए चाची को दोषी क्यों मानते हैं ? जिस ट्रक ने चाचा को टक्कर मारी थी वह चाची तो चला नहीं रही थी फिर चाची को अशुभ कह कर उनका तिरस्कार क्यों किया जाता है ?'
      चाची का नाम आते ही दादी के चेहरे पर एक दम से कठोरता के भाव आ गये थे -""तो इतनी लंबी चौड़ी भूमिका तू अपनी चाची के लिए बाँध रही थी ?... बहू तेरी  यह बेटी पढ़-लिख कर अब हमको ही पढ़ाने लगी है, इसे हटाले यहाँ से।'
    "दादी  मुझे तो कॉलेज जाना है।गुस्सा छोड़ के बस एक बार अपने ही कहे पर विचार करना कि यदि हम सब अपनी उम्र ऊपर से ही लिखा कर लाते हैं तो पति की मौत के लिए पत्नी को मनहूस क्यों कहा जाता है ?---आखिर क्यों ?
                                                               
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शनिवार, 16 अप्रैल 2016

एक दूजे के लिए

कहानी
                    एक दूजे के लिए
                                                                      पवित्रा अग्रवाल

             एयरपोर्ट पहुँचते ही मेरी नजर उन दोनों पर पड़ी थी। उन दोनों के ही चेहरे , हाथ-पैरों आदि संपूर्ण शरीर पर सफेद दाग थे। उनकी उम्र तीस वर्ष के आसपास रही होगी। उन को देखते ही मेरे मन में विचार उठा कि आखिर इनमें रिश्ता क्या है। ये दोनों भाई-बहन हैं, पति-पत्नी हैं या मित्र हैं ? सुनने में तो यही आया है कि आमतौर पर यह बीमारी वंशानुगत नहीं होती अतः हो सकता है ये भाई-बहन न हों।  तो मित्र हो सकते है या फिर पति-पत्नी। यदि पति-पत्नी ही हैं तो निश्चय ही यह बीमारी दोनों को शादी के बाद तो नहीं हुई है। इसका मतलब दोनों ने जानते-बूझते ये शादी की होगी। उनसे बात करने को मेरा मन उत्सुक था।  जाने-अनजाने मेरी नजरें बार-बार उनकी तरफ उठ जाती थी। इस बात का अहसास उन्हें भी हो चुका था। जब हमारी नजरें आपस में टकरा जातीं तो मैं दूसरी तरफ देखने लगती थी।
          मैं सपरिवार दिल्ली से कुल्लू जा रही थी। मुझे सुखद अनुभूति तब हुई जब मैंने उन्हें भी उसी प्लेन में चढ़ते देखा। कुल्लू के भुंटर हवाई अड्डे पर हम सब उतरे तो वह दोनों हमारे पास आए।
 उन्होंने अपना परिचय दिया। वह संजय और नन्दा थे। वह भी मनाली जाना चाहते थे। मनाली जाने से पहले वह मनीकरण जाने-के इच्छुक थे। हमारा भी यही प्रोग्राम था। वह हमारे साथ टैक्सी शेयर करना चाहते थे। हमने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। मनीकरण के रास्ते में नन्दा से बात करने का अवसर मिला।
         वह दोनों पति-पत्नी थे। चार वर्ष पूर्व ही दोनों का विवाह हुआ था। अपने विवाह की चौथी वर्षगाँठ मनाने वह कुल्लू-मनाली-शिमला घूमने निकले थे। वह अपने विवाह की हर वर्षगाँठ पर इसी तरह देश के विभिन्न भागों में घूम चुके हैं। आगे भी उनकी यही योजना है। उनसे बात करते समय ज्ञात हुआ कि वह सिकंदराबाद में रहते हैं।...दोनों बाहों में बाहें डाले इतने खुश थे, जैसे विवाह की वर्षगाँठ नहीं, हनीमून मनाने आए हैं।
 मैंने नन्दा से पूछा,- "नन्दा तुम्हारा प्रेम-विवाह है या माता-पिता द्वारा तय किया गया विवाह है ?'
 "इसे आप लव मैरेज भी कह सकती हैं और अरेन्ज मैरिज भी।'
 "वह कैसे ?
 "पहले हम दोनों ही मिले थे। घर वालों की मुलाकात बाद में हमने ही कराई थी।'
 "आप दोनों कहाँ टकरा गए ? '
 "हम दोनों तो बने ही एक-दूसरे के लिए थे । अत: कहीं-न-कहीं तो हमें टकराना ही था।' चहकते हुए संजय ने पहली बार मुँह खोला था।
       नई नवेली की तरह लजाती हुई नन्दा बोली, "अपनी इस स्किन डिजीज की वजह से मैं स्किन स्पेशलिस्ट के यहाँ जाती थी। वहाँ इसी बीमारी के बहुत मरीज आते थे। वहीं हमारी मुलाकात हुई थी।...यही मुलाकात धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गई। करीब चार वर्ष लगातार मिलते रहने के बाद हमें लगा कि शादी करके हम एक-दूसरे के साथ खुश रह सकते हैं। अपना-अपना निर्णय हमने अपने घर वालों को बता दिया।'
 "घर वालों ने कोई आपत्ति नहीं की ?'
       "अरे नहीं, वह तो खुश हो गए। उनके तो मन की मुराद ही पूरी हो गई थी। असल में मेरे माता-पिता मेरे भविष्य को लेकर बहुत परेशान रहते थे। उनका सोचना था कि माँ-बाप जीवन भर साथ नहीं दे सकते। भाई अभी तो अच्छे हैं। शादी के बाद पता नहीं उनमें क्या बदलाव आए। भाई के सहारे मुझे छोड़ कर वह खुश नहीं होते। उन्होंने शादी के लिए भी बहुत भागदौड़ की। कुछ जरूरतमंद अपनी व्यक्तिगत परेशानियों की वजह से मुझ से  शादी के लिए तैयार भी हो गए थे। एक लड़के के दो बहनें थीं। माँ-बाप नहीं थे। बहनों की शादी की उम्र निकली जा रही थी किंतु शादी के लिए उसके पास धन नहीं था। वह स्वयं भी बेरोजगार था।
किंतु पढ़ा-लिखा व सुंदर था। पापा ने उसकी बहनों की शादी का खर्च उठाने की जिम्मेदारी ले ली थी और उसे अपनी फैक्ट्री में एक अच्छी पोस्ट देने का विश्वास भी दिलाया था। अत: वह शादी के लिए तैयार हो गया था....
        पर मैंने इस शादी से साफ इन्कार कर दिया। यह शादी नहीं एक सौदा था। अपनी बहनों को अच्छा भविष्य देने के लिए उस भाई ने मुझ जैसी लड़की से शादी करने का फैसला कर लिया था। किंतु मैं जानती थी वह मुझे मन से कभी प्यार नहीं कर पाता। हो सकता है अपना काम पूरा हो जाने पर वह मुझे त्याग देता या न भी त्यागता तब भी मैं और वह दोनों खुश नहीं रह पाते। उसकी नजरों में उपजी उपेक्षा या नफरत मैं सह नहीं पाती।...वह शादी सुखद भविष्य की गारंटी नहीं थी।...इससे तो मैं बिना शादी के ही ठीक थी...मेरा ये विचार मात्र काल्पनिक भी नहीं था। क्लीनिक पर खाली समय में बहुत से मरीजों से हमारी बातचीत होती रहती थी। उन के दुख-सुख, अनुभव सुनने के बाद ही मैंने ये फैसला किया था कि यदि शादी करूँगी तो किसी अपने जैसे से। जब हम दोनों एक ही रोग से पीड़ित होंगे तो एक-दूसरे की उपेक्षा या एक-दूसरे से घ्रणा तो कर नहीं सकते...और उन्हीं दिनों संजय से मुलाकात हुई...और यह मुलाकात प्यार में बदल गई।...फिर हमारी शादी हो गई।'
      संजय बोला- "देखिए हमारी शादी को चार वर्ष हो गए किंतु हमारे बीच कभी कोई समस्या पैदा नहीं हुई।...हम बहुत खुश हैं बल्कि हमने अपने जैसे भाई-बहनों के सामने एक उदाहरण पेश किया है।...एक हल निकाला है।...जिसे वह भी अपना सकते हैं।...मैं ठीक कह रहा हूँ न नन्दा ? '
       "हाँ संजय हमारे रोग से पीड़ित अविवाहित युवक-युवतियों के लिए तो यह एक अनुकरण करने योग्य उदाहरण है।'
 तभी मनीकरण आ गया था। हम टैक्सी से उतरकर घूमने निकल गए और कुछ देर के लिए हमारी बातों का सिलसिला टूट गया।
 कुछ घंटों बाद हम लोग टैक्सी में फिर साथ थे। हमारी टैक्सी मनाली की राह पर भाग रही थी।
 बातों के दौरान नन्दा ने बताया कि सिकंदराबाद में हमारा अपना फ्लैट है। संजय का रेडीमेड गारमेंट्स का शोरूम है।...हम दोनों मिलकर बिजनेस संभालते हैं...हम खुश हैं...तनाव रहित जीवन जी रहे हैं।'
 मैंने पूछा, "नन्दा एक बात बताओ। इस बीच तुम्हारी माँ बनने की इच्छा नहीं हुई ?'
        "कई बार हुई। यद्यपि डाक्टर्स  कहते हैं कि यह बीमारी न तो वंशानुगत है और न संक्रामक है फिर भी मन में कहीं एक भय समाया हुआ है कि हम दोनों ही इस रोग से पीड़ित हैं कहीं हमारा आने वाला बच्चा भी इस रोग का शिकार न हो जाए। हम एक प्रतिशत भी रिस्क नहीं लेना चाहते। इसीलिए हम इसे टालते रहे हैं...और अब हमने अनाथालय से एक बच्चा गोद लेने का निर्णय ले लिया है। यहाँ से लौटते ही हम इस दिशा में प्रयास प्रारंभ कर देंगे।'
 "लड़की गोद लेना चाहोगी या लड़का।'
     "जो जल्दी मिल जाएगा, वही ले लेंगे।...सुना है लड़का लेने वालों की लिस्ट इतनी लंबी है कि कई वर्ष इंतजार करना पड़ेगा। हम अब और इंतजार नहीं करना चाहते। लड़की लेकर भी हम उतने ही खुश होंगे।'
     बातों के दौरान समय का पता ही नहीं चला। मनाली पहुँचने की सूचना टैक्सी ड्राइवर ने दी तो हम ने अपना-अपना सामान सँभाला और टैक्सी से उतर गए। फिर हमने संजय और नन्दा से विदा ली और होटल की तलाश में निकल पड़े ।

( यह कहानी मेरे दूसरे कहानी संग्रह 'उजाले दूर नहीं' से ली गई है )

-- ईमेल - agarwalpavitra78@gmail.com

रविवार, 13 मार्च 2016

बदला

कहानी

                           बदला  

                                                 पवित्रा अग्रवाल  
   
       सीखचों में बंद जेल की अभिशप्त जिंदगी जीते-जीते कुँवर दीप सिंह अब ऊब चुका है। तनिक एकांत पाते ही उसके मस्तिष्क में विचारों का अंधड़ उठ खड़ा होता है।
       कल रूपा मिलने आई थी। वह तो मिल कर तभी लौट गई थी किंतु उसकी आवाज अभी तक उसके कानों में गूंज रही है। लगता है चारों दिशाओं से उसकी आवाज प्रतिध्वनित होकर एक तीखे शोर के साथ उसके कान के पर्दों को फाड़ डालेगी -"सुनो यह तुमने अच्छा नहीं किया, किसी का जीवन लेकर तुम्हें क्या मिला ? बोलो न, तुम्हें क्या मिला ? कुछ तो सोचा होता। एक बात बताऊँ ?.. तुमने बदला लेने के लिए हत्या भी की तो एक निर्दोष, निरपराध व्यक्ति की ! तुमने सोमू की हत्या क्यों की ? झगड़ा तो उसके बड़े भाई से हुआ था न ? जानते हो अपने बड़े भाई से सोमू की कभी खटपट हो गई थी। इस वजह से उन दोनों भाइयों में आपस में बोलचाल तक नहीं थी। उस निर्दोष की आहों की ज्वाला में हमारी पारिवारिक शांति, हमारा जीवन जल रहा है, जलता रहेगा। उसकी तड़पती भटकती आत्मा हमें चैन से नहीं रहने देगी।'
       कई बार यह सब सोचते-सोचते उसके दिमाग की नसें तन कर फटने को हो आती हैं। मन करता है अपने बाल नोच डाले। जमीन पर मार-मार कर सिर फोड़ ले या फिर बापू को ही...
       बापू कभी मिलने आते भी हैं तो वह कुछ क्षणों के लिए सँजोया हुआ संतुलन फिर खोने लगता है। उन्हें दूर से देखते ही उसके चेहरे के भावों में यकायक तीव्रता से परिवर्तन होने लगता है...मुट्ठियाँ बँध जाती हैं...आँखों में लाल डोरे खिंच आते हैं और वह  हिंस्र  पशु सा चीख उठता है-- "बापू मत आओ तुम मेरे पास, तुम मेरे पिता नहीं, दुश्मन हो, तुमने बदला सोमू या उसके भाई से नहीं बल्कि मुझ से व मेरे परिवार से लिया है।...
     तुम अपना अधिकांश जीवन तो जी चुके और कितने दिन जीना था तुम्हें ? पर मैं ने अभी क्या देखा है ?... मात्र चौबीस बसंत और अब ये अनंत, असीम पतझड़, कभी खत्म न होने वाला पतझड़। तुमने यह भी नहीं सोचा कि अपने अपमान का बदला लेना था तो स्वयं लेते, मेरे जीवन से खेलने का तुम्हें क्या हक था ? मेरी ही बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी जो तुम्हारी बातों में आ गया। जान भी ली तो एक मासूम निरपराध व्यक्ति की। मेरे बीबी-बच्चों की तरह उसकी बीवी भी मुझे कोसती रहेगी। दुश्मनी उसके भाई से थी, सोमू से नहीं ! बड़े भाई की सजा छोटा भाई क्यों भुगते ? बाप का बदला बेटा क्यों ले ?
     मैं उसे मारना नहीं चाहता था। शिकार की तलाश में मुझे साथ लेकर घूमते बापू तुमने मुझे सोचने का एक क्षण भी नहीं दिया। सोमू को देखते ही तुमने कहा - "शिकार सामने है यदि तू सच्चे ठाकुर से पैदा है तो उसे इसी क्षण ठंडा कर दे।'
 -"किंतु बापू तुम्हारा झगड़ा तो उसके बड़े भाई से हुआ था ? ' उसने प्रतिवाद किया।
 -"सब आस्तीन के साँप हैं । मार दे, सोच विचार कैसा ? मौका हाथ से निकल जाएगा।'
     मैंने निशाना उसके पैर पर साध कर मारा था किंतु तुमने फौरन बंदूक की नली उसके सीने पर कर दी। वह पीड़ा से कराह उठा था--मुझे क्यों मारते हो ? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ठाकुर ?'
     किंतु उसकी एक न सुनी,तुमने उसकी जान ले ली.... तुमने कहाँ मैंने।
 जेल में मिलने आए दोस्त नरेश ने भी कहा था--"दीप तुम तो पढ़े-लिखे समझदार युवक थे, तुम्हें यह क्या सूझी ? शांत मन कुछ तो आगा-पीछा सोचा होता। हत्या करना सजा देना तो नहीं है ? सजा तो तुमने स्वयं को ही दे ली। वह तो कुछ देर छटपटा कर मौन हो गया। बदला केवल जान लेकर ही लिया जा सकता था क्या ? फिर बदला लेने लायक ऐसी घटना भी भला क्या घटी थी ? साधारण सी कहा-सुनी का यह अंत। दो परिवार नष्ट हो गए।'
     हाँ उसने ठीक ही तो कहा था कि "दो परिवार नष्ट हो गए।' बात भी क्या थी ? बस यही कि सोमू के भाई शराब पिए हुए नौटंकी के समय किसी से लड़ - झगड़ रहे थे तो बापू को गुस्सा आ गया था,उन्होंने  फटकारते हुए कहा था --
 "क्या उधम मचा रखा है ? न साले खुद देखते हैं और न किसी को देखने देते हैं। बाहर जाकर लड़ो  मरो, हमारा मजा किरकिरा क्यों करते हो ?... धक्का देकर निकाल दो इन्हें बाहर।'
      इसी बात पर दोनों आपस में भिड़ गए थे। मार पीट तक की नौबत आते देख कर लोगों ने दोनों को अलग-अलग कर दिया था। एक-दूसरे पर गंदी गालियों की बौछार करते, धमकियाँ देते दोनों पृथक दिशाओं को चल दिये थे. इसी पर बापू ने उनसे बदला लेने की ठान ली थी।
      दीप सोचता है कि गलती बापू ने की थी। वहाँ अन्य इतने लोग नौटंकी देख-सुन रहे थे किसी के झगड़े के मध्य बापू को ही बीच में बोलने या गालियाँ देने की क्या जरूरत थी ? किंतु बापू का ठाकुरी अहम जागृत हो गया था -- "उसकी यह हिम्मत कि ठाकुर को गाली दे जाए ? भुगत लूँगा उसे भी, मिटा दूँगा उसका वंश।'
 और बापू का यही ठाकुरी दंभ हमें ले डूबा। नरेश ठीक ही कह रहा था कि सोमू तो कुछ देर छटपटा कर जीवन मुक्त हो गया किंतु अब मेरा यह जीवन तिल-तिल कर मिटते इस काल कोठरी में ही बीतेगा।
      उसे रूपा का स्मरण हो आया। वह कैसे रूपा के पीछे दीवाना सा घूमता था और तीन वर्ष पूर्व ही उसे ब्याह कर लाते समय वह आत्मविभोर हो खुशी से झूम रहा था जैसे कोई किला फतह कर आया हो।
 अब वह कितनी दुर्बल हो गई है। उसकी झील सी गहरी बड़ी-बड़ी काली आँखों को क्या हो गया है ? चारों तरफ काले घेरे उभर आए हैं। उसके स्वयं कुछ न कहने पर भी उसकी आँखों का सूनापन सब कुछ कह जाता है। उस दिन न चाहते हुए भी वह बोल उठा था--"रूपा कुछ भी नहीं बोलोगी ? अपनी क्या हालत बना ली है ?' इसके आगे उसकी वाणी अवरुद्ध हो गई थी, स्वर ही नहीं निकले थे।
     वह कुछ देर उसे चुप-चुप सी देखती रही थी किंतु वह उससे अपनी निगाह मिला पाने की सामर्थ्य  नहीं जुटा पा रहा था। अपराधी सा नजरों को किसी और दिशा में घुमा कर शून्य में ताकता रहा था।
        तब रूपा के शब्द उसे कहीं दूर से आते प्रतीत हुए थे-"मैं यह अपमानित जीवन नहीं जी सकती। राह चलते लोग उँगली व आँखों से इशारा करके एक-दूसरे को बताते हैं-"सोमू की हत्या इसी के पति ने की है...यह सोमू के हत्यारे की बीवी है---मन होता है डूब मरूँ।' कहते-कहते वह बिलख उठी थी।
      गोद में उसका अपना बच्चा भी माँ के स्वर में स्वर मिला कर रोता हुआ, अपने नन्हें-छोटे हाथों को मारने के लिए ऊपर उठाकर उसे गुस्से से घूरने लगा था मानो कह रहा हो---"मेरी माँ को तुम्हीं ने रुलाया है ! तुम्हीं ने मारा है।' उस समय वह अपने ही बच्चे की नजर में कितना अजनबी हो उठा था।
        बदला...बदला...उसने बदला किससे लिया ? सोमू से...सोमू के भाई से ? सोमू की पत्नी से ? रूपा से ? अपने बच्चे से या स्वयं से ? वह कुछ नहीं समझ पाता और अपने बालों को नोंचने लगता है।


( यह कहानी  मेरे दूसरे कहानी संग्रह    'उजाले दूर नहीं ' से ली गई है )

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--पवित्रा अग्रवाल

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

बोझ

कहानी
                           

                               बोझ                           
                                                
(मेरे पहले कहानी संग्रह 'पहला कदम ' में से .यह कहानी करीब 35- 40 वर्ष पूर्व लिखी गई थी )
                                     
                                                  पवित्रा अग्रवाल   

       न्यू ईयर ग्रीटिंग के साथ उसका पत्र भी आया था .लैटर पैड तो उसने पहले ही सुनील‘एन’सिन्हा नाम से छपवा लिया था .आज मिले ग्रीटिंग कार्ड में भी उसने  इसी नाम का उपयोग किया है.सुनील सिन्हा के बीच ‘एन’ मेरे देखते देखते ही जुड़ा है .’एन’ का अर्थ है नूतन ,यह मैं  जानती हूँ फिर भी इसकी उपेक्षा करती रही .मन की कोमल भावनाओं को स्वयं पर कभी हावी नहीं होने दिया पर आज मैं अपनी प्रकृति के विपरीत संवेदन शील हो उठी हूँ .
      शायद उसने यह पत्र बड़ी उखड़ी हुई मनःस्थिति में लिखा है.पन्नों में अपने भावों के प्रति मेरा कोई रेस्पोंस न पाकर वह खीज जाता है .बहुत कुछ लिखना चाह कर भी लिख नहीं पाता किन्तु उसकी खीज भरी पंक्तियाँ कुछ न कह कर भी सब कह जाती हैं . 
      उसने लिखा है - “मैं ने महसूस किया है कि मेरे पत्रों का उत्तर आपकी तरफ से अधूरा ही रहा है ...यह भी आदत है ...अदा है,जो मुझे प्रिय है. संक्षिप्तता , सारग्रहिता,गंभीरता ही तो जीवन में पे करती हैं वरना हम जैसे लोग कुछ भी कहते रहें क्या लाभ है ?”
      मैं जानती हूँ वह क्या कहता रहा है या क्या कहना चाहता है .यह भी ठीक है कि मैं ने हमेशा ही उसकी भावनाओं को गंभीरता भरे संक्षिप्त पत्रों द्वारा चूर चूर किया है .
     आज वैसे भी मेरा मन क्षोभ से भरा है .भविष्य के सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण निर्णय मैं आज ही लेना चाहती हूँ .अब और सहा नहीं जाता.इधर काफी दिनों से देख रही हूँ कि पापा के चहरे की रौनक ही समाप्त हो गई है ...हड्डियाँ उभर आई हैं .चिड़चिड़ाये से रहते हैं...घर से बाहर जाने में असुविधा महसूस करते हैं .माँ भी मोहल्ले – पडौस,जाति बिरादरी में जाने से कतराने लगी हैं .लोगों के प्रश्न कि नूतन की शादी कब करोगे ?...बड़ी हो गई  है फिर तो कोई दूजिया ही मिलेगा...लड़का ढूँढने में मेहनत तो करनी ही पडेगी ...कोई अपने आप तो तुम्हारे दरवाजे पर तिलक करने आएगा नहीं ...लड़की को इतना नहीं पढ़ाना चाहिए था’ आदि प्रश्नों व् टिप्पणियों से ऊब गए हैं .
       माँ से पापा का दुखी स्वर ...अब मैं किसी लड़की को इतना नहीं पढ़ाऊंगा ...पछताया ...लोग मुझे टोकते हैं .तुम माँ बेटी ने मेरी एक नहीं चलने दी वरना आज नूतन महलों में रहती ,कारों में सफ़र करती और आस पास नौकरों की लाइन लगी होती .लड़का सुन्दर था ,संपन्न था बस नूतन की तुलना में कम पढ़ा था ...वह लोग कितना पीछे पड़े थे कि हमें पैसा नहीं लड़की चाहिए ’.किन्तु तुम्हें पढ़ा लिखा लड़का चाहिए था...कहाँ से उनका मुंह भरूं .किसी को विदेश जाने का खर्चा चाहिए तो किसी को एक मोटी रकम नकद चाहिए .’
    यह सब सुन कर मेरा मन व्यथित हो उठता है .जाति बिरादरी ,परिवार के घेरे में कैद मैं चिड़िया सी फड़फड़ा जाती हूँ.घर में कई बार यह शादी का प्रसंग छिड़ा है पर न जाने क्यों यह प्रसंग मुझ में कभी भी रोमांचित करने वाली सुखद अनुभूति या संवेग उत्पन्न नहीं कर पाया है .इस के प्रति मैं हमेशा तटस्थ ही रही हूँ जैसे यह सब किसी दूसरे के बारे में सोचा जा रहा हो .और इन्ही क्षणों में मैं ने स्वयं को एक निश्चय एक  निर्णय का ताना बाना बुनते पाया है .इच्छा हुई है कि कह दूं ‘मुझे नहीं करनी शादी ’इसी लिए मैं प्रयत्न करने लगी हूँ कि कोई एसी नौकरी मिल जाये जिस से मैं अपने नैतिक मूल्यों को सुरक्षित रख सकूं किन्तु बिना किसी ठोस आधार के उन्हें अपना शादी न करने का निर्णय कैसे सुना दूं .वह तो यही कहेंगे कि कब तक लोगों के ताने सुनते हुए तुम्हारा बोझ उठायें ?’
      तभी सुनील का पत्र मानो मेरी समस्याओं के समाधान रूप में इस कैद से मुक्त करने के लिए प्रस्तुत होगया .किन्तु मैं जानती हूँ कि एक विजातीय से यह विवाह संभव नहीं बिलकुल असंभव है .
   सुनील से मुलाकात भी मात्र एक संयोग ही था .किसी पत्रिका में प्रकाशित लेख पर प्रतिक्रिया स्वरूप एक अंजान इंजीनियर युवक का पत्र, ...पत्र- मित्रता का आग्रह .किसी लडके से पत्र - मित्रता का यह पहला अवसर था .मैं जवाब देने में भी झिझक रही थी .जवाब दिया और पत्रों का सिलसिला चल निकला .धर्म , साहित्य ,घर बाहर .व्यक्तिगत रुचियाँ हमारे पत्रों का विषय रहीं .
     पत्रों में कई बार उसने ‘तुम सॉरी आप ’ लिख कर बड़े नाटकीय ढंग से तुम पर आने का प्रयास किया था .सोचा होगा शायद मैं ही लिख दूं कि ‘तुम’ कह सकते हो...किन्तु मैं ने यह ‘आप’ की दीवार बनी रहने दी .यों अपने लिए आप कहलवाना मेरा शौक नहीं है .ऐसा भी नहीं कि मुझ में अहम् है इसलिए आप कहलाना मुझे पसंद है .असल में ‘तुम’ से जिस अपनत्व या निकटता का अहसास होता है वह अधिकार मैं इस युवक मित्र को नहीं दे पा रही थी .तभी मैंने देखा था कि पत्रों में उस ने मुझ अनदेखी लड़की का नाम नूतन ‘एन‘  रूप में अपने नाम के मध्य संयुक्त कर लिया था ,मैं ने इसकी भी उपेक्षा की .एक अनजान ,अनदेखी लड़की जो कुरूप ,भद्दी कुछ भी हो सकती है ,उसके प्रति आसक्ति ...नाम की संयुक्तता भावुकता ही तो है .
    कई बार किये गए चित्र के आग्रह को भी मैं टाल गई थी किन्तु उसे देखने की लालसा तीव्र होने लगी थी . ऐसे ही एक समय में उसका पत्र आया था .उसने लिखा था ‘मेरा ट्रांसफर हो गया है ...वहां जाते समय आपका स्टेशन भी रास्ते में पड़ेगा’ शायद उसकी इच्छा रही थी कि मैं आने का आग्रह करूं .मैं ने भी पत्र लिख दिया था .
    जब वह आया तो दरवाजा माँ ने खोला था .दूसरे कमरे में से ही मैं ने उसे अपना परिचय देते सुना था –‘मुझे सुनील सिन्हा कहते हैं ’
    सुनील नाम सुन कर मैं चौंकी थी .वह तो दो दिन पहले आने वाला था ...आज तो मैं मिलने को तनिक भी तैयार नहीं थी .सुबह का समय था ...नहाई भी नहीं थी .पिछले दिन के पहने हुए कपड़े भी कहाँ साफ़ रह गए थे .उस पर भी  अस्त व्यस्त,उलझी हुई केश राशि . इच्छा हुई सामने जाने से पहले कपड़े बदल कर बाल जरा ठीक कर लूं .पर स्वयं को संभालने में सकोच सा हुआ कि माँ क्या सोचेंगी . बस फिर एक नजर शीशे पर डाल कर मिलने चली गई थी.
   ‘अच्छा तो आप हैं सुनील ? नूतन दीदी आपकी बहुत चर्चा करती हैं ...अफ़सोस है कि वह इस समय घर पर नहीं हैं ...शाम तक आजाएँगी .अरे आप उदास क्यों हो गए ?...हम लोग तो हैं न ...अच्छा पहले यह बताएं कि आप क्या पीयेंगे...ठंडा या गरम ?’
     बस यही ऑपचारिक बातें होती रहीं .वह कुछ उदास प्रतीत हो रहा था क्यों कि दो घंटे बाद उसे ट्रेन पकड़नी थी .तभी पापा आगये –‘अरे यह क्या नूतन ...इन्हें कुछ खिलाएगी –पिलाएगी भी या यों ही बैठाये रहेगी ?’
   तब तो वह चोंक कर देखता ही रहा गया था जैसे कह रहा हो ‘शैतान लड़की    खूब उल्लू बनाया हमें .                                 
    दो घंटे ठहर कर वह चला गया था .
    कैसी विडम्बना है कि आज चाह कर भी उसका चेहरा आँखों के सामने नहीं ला पा रही,कोई आकृति ही नहीं उभरती .मैं खीज जाती हूँ ,तब उसे ध्यान से क्यों नहीं देखा ? नजरें उठाने में ही लगता था अभी चोरी पकड़ी जायेगी .फिर भी हल्का सा अहसास है कि देखने में बहुत खूबसूरत तो नहीं पर अच्छा ही था .जाने के बाद उसके पत्र की प्रतीक्षा थी ...जानने की उत्सुकता थी कि मेरा उस पर क्या प्रभाव पड़ा... कहीं अपने नाम के साथ ‘एन ‘ की संयुक्तता पर वह पछताया तो नहीं ?
     कुछ दिन बाद ही उसका पत्र आया था .पूर्व की भांति सुनील एन सिन्हा नाम सुन्दर अक्षरों में चमक रहा था .एक क्षण को तो मैं रोमांचित हो उठी थी . उसने लिखा था ‘दैविक संयोग ...आप से मुलाकात .आप का परिचय ,आप का स्वभाव ,आप का आग्रह ,प्यारा सा परिवेश ,सभी कुछ मेरी जिंदगी के प्रिय अहसास हैं .मुझे उन क्षणों की स्मृति है और रहेगी .नहीं भूलूंगा आपके सरल और प्रिय व्यक्तित्व को .पता नहीं आप मेरे लिए कैसा महसूस कराती हैं ? स्पष्ट लिखेंगी न ? 
     जवाब में मैंने अब तक अनकहा बहुत कुछ लिखना चाहा था किन्तु न लिख सकी.मन ने कहा ...पगली कहाँ भटक रही है तू ...इस की परिणति विवाह में असंभव है ,अतः संबंधों को मैत्री तक ही सीमित रख .फिर जवाब में उसके सभी प्रश्नों के उत्तर मैं उड़ा गई थी और जवाब में लिख भेजा था एक ओपचारिक सा पत्र .
      फिर एक अन्य पत्र में उसने लिखा था – ‘यहाँ परिवार वालों द्वारा मेरे जीवन में परिवर्तन का प्रयास हर तरफ से जारी हैं किन्तु मेरी उसमे कहीं कोई रूचि नहीं है .अब तक मैं ने जीवन में जिनको अधिक चाहा है उन्ही से मुझे सब से अधिक निराशा मिली है .अब मैं भी संस्कारों की प्रबलता को स्वीकारने लगा हूँ .आखिर आप जवाब क्यों नहीं देतीं ? कहीं हम सरे राह चलते मिल जाने वाले परिचित नए संबंधों की रचनात्मक नीव में रखे जाने वाले पत्थरों की तरह पीछे तो नहीं छूटते जा रहे ’ पत्र के अंत में सारी व्याकुलता तथा भाव स्पष्ट करने के लिए या निकटता का आभास देने के लिए उसने ‘आपका’ की जगह ‘तुम्हारा अपना ही सुनील’ लिखा था .
   कई दिन तक मुझे ‘तुम्हारा अपना ही ’ शब्द भेदते रहे थे .इच्छा हुई थी पत्र का जवाब ही न दूं .फिर भी न जाने क्यों पत्रोत्तर दिया था, सदा की तरह सीधा, सपाट,संक्षिप्त ,तटस्थ सा .और मेरे उसी पत्र का  प्रत्युत्तर है आज का खीज भरा पत्र जिसमे उसने अधूरा उत्तर देने की शिकायत की है.
     यों आज इच्छा होने लगी है कि उसकी आकांक्षाओं को पूर्ण कर दूं किन्तु जानती हूँ कि इसे पापा किसी दशा में स्वीकार नहीं करेंगे ...और मैं उनका विरोध नहीं कर पाऊंगी .आखिर मैंने उसे पत्र लिख दिया –‘आप को मुझ से पत्रों का अधूरा उत्तर देने की शिकायत है न ? मैं इस आक्षेप का विरोध नहीं करती क्यों कि आपने सही लिखा है .पर उत्तर दूं भी तो क्या ?...पापा का संस्कारी या कहूं तो रूढ़िवादी मन इस विवाह की स्वीकृति नहीं देगा ...शायद यही हमारी नियति है.सोचती हूँ आगे से आपको पत्रोत्तर भी न दूं ...यह अध्याय यहीं समाप्त हो जाये तो अच्छा है . 
       आज फिर वही प्रसंग ...मैं पापा के शब्द सहन नहीं कर पाती ,यों मैं जानती हूँ कि वह मुझे बहुत प्यार करते हैं .उन्होंने पुत्र के अभाव में हम तीनों बहनों को बेटों की तरह पाला है .कभी मेरी आकांक्षाओं की पूर्ति में बाधक नहीं बने .जहाँ तक मैं ने चाहा लोगों के मना करने पर भी उन्हों ने मुझे पढ़ाया ...अपने छोटे से कस्बे में सुविधा न होने पर बाहर होस्टल में रख कर भी पढाया है किन्तु अब वह जाति बिरादरी के वाग्वाणों से आहत हो गए हैं .किसी ने फिर टोक दिया होगा ....इसी पर पापा माँ से कह रहे थे – ‘सुनते सुनते मेरे कान पक गए हैं कि लड़की बड़ी हो गई है ,उस की शादी क्यों नहीं करते ? ’
    मन करता है यह जगह छोड़ जाऊं .इस नौकरी में गुजारा मुश्किल हो रहा है...दहेज़ के लिए धन कहाँ से लाऊं ? काश नूतन की जगह बेटा होता .कुछ तो मुझे सहारा मिलता ,...आज ही प्रोविडेंट फण्ड से दस हजार उधार लेने की अर्जी दी है ...इस से अधिक मिल भी नहीं सकते ...सोचता हूँ इस मकान को बेच दूं ...किराये के मकान में रह लेंगे पर किसी तरह जल्दी से नूतन के हाथ पीले कर देने हैं ’
   मैं विचारों के बवंडर में घिर जाती हूँ .पापा के पास बुढ़ापे के लिए क्या है ... सिवाय प्रोविडेंट फण्ड से मिलने वाली लघु धन राशि और दो कमरों के एक छोटे से मकान के ? उस पर भी दो छोटी बहनों की शिक्षा दीक्षा और उनकी शादी अभी बाकी है .यदि पापा यह सब मुझे दे देंगे तो उनके पास बाकी क्या बचेगा ?... उनका कैसे गुजारा होगा ? नहीं नहीं पापा को यों बरबाद नहीं होने दूँगी .पर यह भी समझ में नहीं आता कि करूं क्या ?  नौकरी करना चाहती हूँ पर मुझे अकेले पापा कहीं दूसरी जगह भेजना नहीं चाहते ...अब समय आगया है कि पापा से खुल कर बात करनी ही होगी .
   ‘अरे सुनो नूतन की माँ ,आज उस सुनील सिन्हा का पत्र आया है ,जो एक बार अपने घर आया था .नूतन का हाथ माँगा है ,दूसरी जाति में विवाह कैसे कर दूं ? जाति वाले कच्चा खा जाएंगे.जब तक कहीं नूतन का विवाह नहीं हो जाता सुख से सो भी नहीं सकूंगा ... मेरे रातों की नींद हराम हो गई है ...बोझ बन गई है नूतन ’
    मस्तिष्क के तार झनझना उठते हैं .घिसे रिकार्ड पर सुई की भांति मन फिर फिर उसी कथन पर आ कर अटक जाता है ‘बोझ बन गई है... नूतन बोझ बन गई है’ मन करता है कहीं जा कर डूब मरुँ .स्वाभिमानी मन आहत हो विद्रोह कर बैठता है ...जबान खुल जाती है .
  ‘ पापा आप परेशान न हों ...सुख की नींद सोयें .लड़का आप को घर बैठे मिल गया है –‘सुनील सिन्हा ’ ...अब आपको किसी का मुंह नहीं भरना पड़ेगा ’
 पापा फुफकार उठते हैं –‘क्या कहा सुनील सिन्हा ?...अच्छा तो वह सब तेरी ही साजिश थी .तभी उस छोकरे की हिम्मत मुझे पत्र लिखने की हो गई .ब्राह्मण की लड़की का विवाह ...कायस्थ के लडके से ?...नहीं यह नहीं हो सकता . पढ़ लिख कर तो तेरी बुद्धि भी भ्रष्ट हो गई है.’
  ‘यह कैसी विडम्बना है पापा...एक तरफ तो मैं बोझ हूँ ...दूसरी तरफ आप उसे हल्का भी नहीं करना चाहते .पापा इस जाति से इतना मोह क्यों ? यह कैसी  जाति है जिस के लोग  बिना लम्बी चौड़ी मांग के शादी की बात आगे बढ़ाना भी पसंद नहीं करते ? प्लीज पापा अपना द्रष्टिकोण विकसित कीजिये....जो विवाह के नाम पर आदमी को बेच खाने को तैयार हैं ,उन्हें आप जाति भाई कहते हैं ?...मैं आप पर अब और बोझ बनना नहीं चाहती...अपने लिए आप को बरबाद होते ,लुटते नहीं देख सकती.अब मैं अपने निश्चय पर दृढ हूँ ... मेरा विवाह अब  सुनील से ही होगा ...वैसे यह अब आप पर निर्भर करता है कि यह आप द्वारा संपन्न होता है या .....’
    मैं प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा किये बिना उस कमरे से बाहर निकल आती हूँ ...जानती हूँ मेरे इतना बोल जाने के साहस को देख कर मेरी उच्च शिक्षा को कोसा जा रहा होगा ...लड़कियों को अधिक न पढ़ाने के निर्णय को दोहराया जा रहा होगा
 
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गुरुवार, 7 जनवरी 2016

उजाला ही उजाला

कहानी 
                          उजाला ही उजाला

मेरे प्रथम कहानी संग्रह 'पहला कदम ' में से . यह कहानी अक्तूबर 1995 में कादम्बिनी पत्रिका में प्रकाशित हुई थी )  

                                                  पवित्रा अग्रवाल

   जैसे ही मैं अस्पताल के पास पहुंचा मि.सरीन मुझे अस्पताल के मुख्य द्वार पर ही मिल गए .उनके चहरे पर संतोष के भाव उभर आये थे .वह बोले –‘बेटा डाक्टर ने जितने टैस्ट कराये थे,सब की रिपोर्ट आगई है.शायद तुम्हें पता भी हो कि अब तुम्हारा गुर्दा मेरे बेटे को लगाया जा सकता है.हो सकता है तीन – चार दिन में ही ऑपरेशन भी हो जाये .डॉक्टर साहब अभी थोड़ी देर में आते ही होंगे . आप जाकर अन्दर बैठो .वह आज ओप्रेशनकी तारीख बताएँगे .’
    जितनी जल्दी मि.सरीन को है उतनी ही व्यग्रता से मुझे भी आप्रेशन की तारीख का इंतजार है क्यों कि इस से मेरे भी अनेक सपने जुड़े हैं .जब से दुर्घटना में मैं ने अपना हाथ खोया है तब से मैं बहुत परेशान रहा हूँ.जीने की चाह ही जैसे समाप्त हो गई है .घर परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने में असमर्थ हो गया हूँ .इस दुर्घटना की वजह से मेरा हाथ ही नहीं मेरी नौकरी भी चली गई .एक अपाहिज बेरोजगार आदमी जो अपने परिवार पर बोझ बन गया हो ,वह खुश कैसे रहा सकता है ?
    लक्ष्मी मेरी पत्नी जिस से मैंने प्रेम विवाह किया था ,साथ जीने मरने की कसमे खाई थीं ,आज परिवार की गाड़ी खीचने का काम अकेले उसके कन्धों पर आ पड़ा है ..फिर भी मेरे सामने हर समय खुश दिखने का प्रयास करती है.कभी घर ग्रहस्थी,बच्चों का भविष्य ,आर्थिक परेशानियों का रोना लेकर मेरे पास नहीं बैठती .किन्तु मेरी निराशा ,मेरे मन में व्याप्त अशान्ति व बेचैनी उसे भी चैन से नहीं रहने देतीं .मुझे उदास देख कर वह भी उदास हो जाती है .
    एक सप्ताह पहले ही उसके पूँछने पर कि इतना उदास क्यों बैठे हो ?’मैं अपने को रोक नहीं पाया.न चाहते हुए भी मुंह से निकल गया – ‘एक ठलुआ , बेरोजगार ,अपाहिज आदमी जो अपने परिवार के लिए नकारा हो गया है ,उससे खुश रहने या दिखने की उम्मीद कैसे की जासकती है लक्ष्मी ?’
      वह आँखों में आंसू भर लाई थी – ‘तुमने कैसे समझ लिया कि तुम घर   या मेरे लिए नकारा हो गए हो ? दुर्घटनाएं किस के साथ नहीं होतीं ? पर जिन्दगी से इस तरह हार तो नहीं मान लेते...यह दुर्घटना मेरे साथ भी हो सकती थी . तुम्हारा बस एक हाथ ही तो गया है...अपने से ज्यादा दुखी और लाचार लोगों को देखो तो खुद को उन से लाख गुना बेहतर पाओगे .सोचो उन के बारे में जो जन्म से ही द्रष्टिहीन हैं या बाद में अन्धता के शिकार हो गए हैं ...सोचो उन के बारे में जो बोल और सुन नहीं सकते .सोचो उनके बारे में जो चल नहीं सकते या दोनों हाथ खो चुके हैं .क्या तुम्हें नहीं लगता कि उनकी तुलना में तुम्हें कुछ भी नहीं हुआ है .तुम ढंग से चल व दौड़ सकते हो ,देख सुन सकते हो .भगवान की कृपा से तुम्हारा एक हाथ सलामत है,अपना सब काम तुम खुद ही कर लेते हो. धीरे धीरे लिखने व कुछ दूसरे काम जिन्हें उल्टे हाथ से काम करने की  तुम्हें आदत नहीं है वह भी अभ्यास करने से आदत में आजायेंगे .रही बात नौकरी की....नहीं मिलती तो कोई बात नहीं .अपनी एक छोटी सी दुकान खोल लेंगे लेकिन हर काम में समय लगता है.दुर्घटना हुए अभी एक वर्ष भी तो पूरा नहीं हुआ ,तुम अभी से मायूस होने लगे हो .’
    इस तरह से वह मुझे सांत्वना देती रहती है .मेरा मनोबल बढ़ाने और मेरे आत्मविश्वास को लौटाने के लिए वह अक्सर मुझे समझाती रहती है .कभी कभी मैं उसे भी झिड़क देता हूँ ...फिर पछताता हूँ कि उसने एसा कुछ नहीं कहा था जिस पर नाराज हुआ जा सके.किन्तु उस दिन मैं उसकी इन बातों पर चिड़ा नहीं था बल्कि उसे छेड़ा था –‘तुम लैक्चर बहुत अच्छा दे लेती हो तुम्हें हाईस्कूल में टीचर नहीं डिग्री कालेज में लैक्चरार होना चाहिए था ‘ वह हँस कर चाय बनाने चली गई थी . 
   उसे कैसे समझाऊँ कि लाख चाहने पर भी यह विचार ,ये अंतरद्वन्द मेरा पीछा नहीं छोड़ते.खाली बैठे उल्टे सीधे विचार मकड़ी के जाल की तरह मुझे चाहे जब अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं .उद्देश्यहीन जीवन किस काम का ?...यह कहना  गलत होगा कि जीवन में कोई उद्देश्य हैं ही नहीं .उद्देश्यों की कमी नहीं है .पांच और सात वर्ष की दो बेटियां हैं .उनको पढ़ा लिखा कर योग्य बनाना ...बाद में अच्छे घर वर देख कर उनका विवाह करना है ...क्या यह जिम्मेदारियां जीवन का उद्देश्य नहीं हैं ? सच कहूं तो यही उद्देश्य था .इन्ही उद्देश्यों के लिए जीना ,कुछ करना सार्थक लगता था पर लगता है अपना दायित्व निभाने में मैं अक्षम हो गया हूँ .यही अक्षमता ,जीने की लालसा को समाप्त किये दे रही है .क्यों जियूं ,किस के लिए जियूं ? यही सवाल प्रश्नचिन्ह बन कर सामने खड़े हो जाते हैं .एसी  परेशानियों में घिर कर लोग सिगरेट ,शराब की लत लगा लेते हैं .मेरा भी मन करता है किन्तु मैं ने तो लंच के बाद एक पान खाना,दिन में दो सिगरेट पीना तथा महीने में एक दो बार बीयर पीने जैसे शौक कहूँ या आदत को भी छोड़ दिया है .पत्नी को आर्थिक मदद तो नहीं कर पाता पर अपने फालतू के शौकों पर होने वाले खर्चे तो रोक सकता हूँ .
    लक्ष्मी के बार बार समझाने से जीवन में कुछ करने की चाह व उस चाह को पूर्ण कर पाने का आत्मविश्वास मन में पैदा होने लगा है.लक्ष्मी  ने कितनी ही बार दोहराया है की न सही नौकरी ,अपनी छोटी सी दुकान खोल सकते हैं ’ मुझे भी लगता है दुकान मैं आराम से संभाल सकता हूँ . अपने घर के तीन कमरों में से एक कमरे को दुकान के रूप में स्तेमाल किया जा सकता है .घर के आस पास काफी बस्ती है किन्तु पास में  कोई दुकान नहीं है . छोटे छोटे सामान के लिए दूर बाजार जाना पड़ता है .एक छोटा सा प्रोवीजनल स्टोर खोल लिया जाए तो निश्चय ही अच्छा चलेगा .मदद के लिए एक लडके को काम पर रखा जा सकता है.
 किन्तु अड़चनें यहाँ भी हैं .कमरे को दुकान में बदलने व व्यापार शुरू करने के लिए भी धन की जरुरत होती है .बाप दादा से विरासत में मिला यह मकान पिता जी को बहन की शादी के समय गिरवी रखना पड़ा था जो अभी तक छुड़ाया नहीं जा सका है. जो जमा पूँजी थी वह मेरे इलाज में खर्च हो गई .कहीं से तीस-पैंतीस हजार रुपयों की व्यवस्था हो जाए तो फिर मैं सब सम्हाल लूँगा .हर दम सोते-जागते, उठते-बैठते बस एक ही विचार मन को घेरे रह्ता है की कहीं से तीस – पैंतीस हजार का कर्जा मिल जाये .भगवान ने चाहा तो अब इन रुपयों का इंतजाम हो जायेगा.गुर्दा देकर चालीस हजार रुपये मिल जाये ...इस बात से मैं बहुत खुश हूँ .सोचता हूँ वह दिन भी कितना शुभ था जिस दिन मैं विचारों में उलझा सुबह सुबह लम्बी सैर पर निकल गया था , घूमते घूमते जब थक गया तो गार्डन की एक बैंच पर बैठ कर सुस्ताने लगा था.गार्डन से बाहर का नजारा भी दिख रहा था .तभी मेरे पास एक आदमी आकर बैठ गया था.बात करने की गरज से मैं ने उससे ऐसे ही पूछ लिया था कि गार्डन के बाहर बनीं उस इमारत पर इतनी भीड़ क्यों है ?’
 उस आदमी ने बताया था कि वहां एक ब्लड बैंक है .लोग वहां अपना खून बेचते हैं.’
‘खून बेचते हैं ? लेकिन क्यों ?’                                     ‘ये लोग रुपयों के लिए खून बेचते हैं. खून बेचना अब इनका धंधा बन गया है.  कुछ शराब के लिए ,कुछ ड्रग्स के लिए ,कुछ रोटी के लिए अपना खून बेचते हैं.इन में बहुत से तो भिखारी हैं .’
‘यह लोग पैसों के लिए खून बेचते हैं ?’ मैं आश्चर्य में था .
‘ये तो खून बेच रहे हैं .पैसे के लिए तो लोग शरीर के अंग भी बेच देते हैं’
‘धन के लिए स्त्रियों द्वारा शरीर बेचने की बात तो सुनी थी किन्तु धन के लिए अंग बेचते हैं यह बात मेरी समझ में नहीं आई .’
‘दूसरों की कौन कहे मैं ने ही धन के लिए अपना गुर्दा बेचा है .बेटी की शादी के लिए मुझे धन की जरुरत थी . जो कमाया था वह बच्चों की परवरिश व पढ़ाने - लिखाने में खर्च होता रहा ….बेटे को तो होस्टल में रख कर पढाया था , सोचा था जब वह कमाने लगेगा तो पहले बेटी की शादी करूंगा फिर बेटे की .       नौकरी लगते ही बेटे ने साथ में काम करने वाली लड़की पसंद करली और मुझे भी समझाया कि ‘बाबू जी कामकाजी लड़की से शादी करना अपने परिवार के हित में रहेगा .हम दोनों कमाएंगे और आप की मदद करेंगे .अब तक आपसे लेता ही रहा हूँ ...अब अपना फर्ज निभाने का समय आया है .देखना अपनी बहन की शादी कैसे धूम धाम से करता हूँ.’
बेटे की  शादी की ...लोग बेटियों को बोझ कहते हैं ,मेरे लिए तो बेटे की शादी भी बेटी की शादी की तरह ही भारी पड़ी .जो कुछ गहने,कपड़े और धन पत्नी ने बेटी की शादी के लिए जोड़ कर रखे थे वह सब बेटे की शादी में खर्च हो गया ...बहु जो कुछ लाई थी वह तो बहू का था ही ,शादी के कुछ दिन बाद ही बेटा पत्नी को लेकर अलग हो गया.बहन की शादी में भी कोई मदद करने को तैयार नहीं था .अकेले में आकर  खूब रोया था ‘बाबूजी यदि बहन की शादी में मैं ने मदद की तो वह मुझे छोड़ कर अपनी माँ के घर चली जायेगी और हम सब को दहेज़ के लालच में सताने के जुर्म में जेल के अन्दर करा देगी ... ऐसी धमकियां वह मुझे दे रही है ...उससे छिपी मेरी कोई आमदनी नहीं है ..मैं आप की कैसे मदद करूं ?’
बेटे से क्या कहता...अपना गुर्दा बेच कर मुझे चालीस हजार मिले थे ,उस से बेटी की शादी में बहुत मदद मिली .
‘अपना गुर्दा तुम ने किसको बेचा ? उसके बिना तुम जीवित कैसे हो ? ‘
    ‘लगता है तुम्हें इस विषय में कुछ भी नहीं मालूम.पहले मुझे भी कुछ नहीं मालुम था .यह भी पता नहीं था कि गुर्दा क्या होता है ?...मेरे एक परिचित ने अपना गिरवी रखा मकान छुड़ाने के लिए अपना गुर्दा किसी को दिया था .उसी ने बताया था कि हरेक के शरीर में दो गुर्दे होते हैं .किसी भी आदमी को जीने के लिए एक गुर्दा काफी होता है .दूसरा गुर्दा तो स्टेपनी की तरह होता है .किसी वजह से एक गुर्दा काम करना बंद करदे तो दूसरे गुर्दे के सहारे आदमी जीवित रह सकता है .परेशानी तब पैदा होती है जब दोनों गुर्दे ख़राब हो जाते हैं...ऐसी स्थिति में यदि मरीज को किसी स्वस्थ व्यक्ति का एक गुर्दा लगा दिया जाए तो वह जिन्दा रह सकता है...डॉक्टर साहब ने मेरा गुर्दा निकाल कर एक औरत को लगा दिया था .मरीज के घरवालों ने मुझे चालीस हजार रुपये दिए थे .’
मैंने पूछा ‘इस से गुर्दा दाता की जान को तो कोई खतरा नहीं होता ?’
   ‘खतरा कहाँ नहीं है ? ...गुर्दा निकालने के लिए भी बड़ा आप्रेशन करना पड़ता है .वैसे मेडिकल साइंस ने बहुत प्रगति करली है फिर भी ओप्रेशन तो ओपरेशन ही होता है.कुछ प्रतिशत खतरा तो रहता ही है. ...पर मैं तो स्वस्थ हूँ ...छह –सात दिन बाद हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गई थी ...बदले में मिले धन से मेरा काम भी चल गया था और मेरी वजह से किसी को नया जीवन भी मिल गया था .’
पैसे की मुझे भी जरुरत थी .उस आदमी से पूरी जानकारी ले कर मैं भी अस्पताल पहुँच गया और अपना गुर्दा देने की इच्छा व्यक्त की.उन्होंने मेरा नाम , पता लिख लिया .डॉक्टर ने रक्त परीक्षण के बाद जब मेरा ब्लड ग्रुप देखा तो बोले हो सकता है तुम्हारा गुर्दा मेरे मरीज के काम आजाये ...तीन महीने से मरीज डायलेसिस पर है .इस ब्लड ग्रुप का डोनर नहीं मिल रहा था .यदि गुर्दा दान करने का तुम्हारा इरादा मजबूत है तो अभी कुछ परीक्षण और कराने पड़ेंगे .’
मेरी स्वीकृति पाकर उन्होंने कुछ और परीक्षण कराये और पाया कि मेरा गुर्दा उस मरीज को लग सकता है .अब तक मैं निराशाओं की बंद गुफा में कैद  था . उजाले की किरण तो अब दिखी थी .मरीज के घर वाले चालीस हजार देने को तैयार थे .मेरा मन योजनायें बनाने में डूबा था की पहले गिरवी रखा मकान छुड़वाऊँगा बाकी के रुपयों से घर पर छोटी सी दुकान खोलूँगा .सोचा था इस विषय में पत्नी को कुछ नहीं बताऊँगा .कह दूंगा सात आठ दिन के लिए गाँव जारहा हूँ .  आज ओप्रेशन की तारीख पता करने ही यहाँ आया था .
     डाक्टर  साहब आगये थे ,उन्होंने आप्रेशन की पांच तारीख बताई थी और कहा था चार तारीख की रात को ही तुम्हें अस्पताल में दाखिल हो जाना है .एक दो परीक्षण अभी और करने हैं . पांच की सुबह आप्रेशन द्वारा तुम्हारा गुर्दा निकाल कर मरीज को लगा दिया जायेगा .लेकिन आपरेशन से पहले तुम्हारे रिश्तेदार माँ ,बाप या पत्नी किसी एक का यहाँ रहना जरुरी है.उनकी स्वीकृति के बिना हम तुम को हाथ भी नहीं लगायेंगे .’
मैं परेशान होगया , अब तक पत्नी को तो इस विषय में कुछ पता ही नहीं है पर अब तो को बताना ही पड़ेगा और वह इसके लिए किसी दशा में राजी नहीं होगी...उससे बात करना बड़ा मुश्किल नजर आ रहा था.तीन दिन इसी उलझन में निकल गए .जिस दिन मुझे भरती होना था उस दिन बड़ी हिम्मत जुटा कर मैं ने भूमिका बांधी थी – ‘लक्ष्मी मुझे एक जगह से चालीस हजार रुपये मिल रहे हैं ,उन से हम अपना मकान छुड़ा लेंगे और दुकान भी खोल पायेंगे .’
जब उसे पता चला कि रुपयों के बदले मुझे अपना गुर्दा निकलवा कर दूसरे मरीज को देना होगा तो रो रो कर उसने बुरा हाल कर लिया और बोली ‘नहीं चाहिए मुझे चालीस हजार ...हम रुखी – सूखी खा कर गुजारा कर लेंगे.मुझे और मेरे बच्चों को तुम्हारी जरुरत है .तुम्हारे बिना हम जीते जी मर जायेंगे .’   
मैं उस आदमी को भी घर लाया जो दो साल पहले अपना गुर्दा दे चुका था . उसने भी मेरी पत्नी को बहुत समझाया किन्तु उस पर किसी के समझाने का असर नहीं हुआ तो मैं ने उसे धमकी दी ‘देखो लक्ष्मी मेरे मन की दशा तुम्हें नहीं मालुम . कई बार आत्महत्या का विचार मेरे मन में आचुका है किन्तु मैं ने तब खुद को सम्हाल लिया .तुम मेरी घुटन...मेरी तड़प को नहीं समझ पा रहीं .मैं अंधेरों में जी रहा हूँ ,रोशनी की एक किरण मुझे दिखी है .यदि तुम ने उसे भी रोक लिया तो नहीं मालुम अवसाद के उन क्षणों में मैं कब क्या कर बैठूँ.’
असल में यह धमकी थी भी नहीं ,मेरे मन की सच्ची दशा थी .पत्नी एकदम से घबड़ा गई – ‘तुम यह क्या कह रहे हो ? क्या तुम्हारा जीवन इतना सस्ता है ? ...मात्र चालीस हजार रुपयों के लिए उसे दाव पर लगा दोगे ?...कोई डेढ़ दो लाख दे रहा हो तो सोचती भी ’
मैं जानता हूँ उसने भी अंधेरे में तीर छोड़ा है .वह जानती है डेढ़ दो लाख रुपये कोई छोटी रकम नहीं होती है ,इतने कौन देगा ? ...इस तरह वह मुझे रोक लेगी .
 किन्तु उसकी यह बात मुझे ठीक लगी.मेरी आँखों के सामने पच्चीस वर्ष का नाजुक सा युवक घूम गया.जो लखपति बाप का इकलौता पुत्र है .तीन वर्ष पूर्व ही उसकी शादी हुई थी ,दो नन्ही मासूम बच्चियों का पिता है.बीस बाईस वर्ष की सुन्दर सी बीबी है उसकी .उसके चेहरे पर हरदम उदासी छाई रहती है .मुझे मालूम है उस मरीज के माँ बाप अपना शहर छोड़ कर दूसरे प्रान्त के इस अजनवी शहर में बेटे के इलाज के लिए तीन महीने से पड़े हैं .वे इतने समर्थ हैं कि दो लाख भी दे सकते हैं .
मैंने लक्ष्मी से कहा—‘मुझे तुम्हारी बात मंजूर है यदि वे लाख – सवा लाख देने को तैयार हो गए तो ही अपना गुर्दा दूंगा वरना ना कह दूंगा.’
 शाम को मुझे अस्पताल में दाखिल होना था पर मैं नहीं गया .मुझे मालुम था वे लोग मुझे ढूढेंगे .शायद मेरे दोस्त के यहाँ भी गए हों जिसका पता मैं ने अस्पताल में (मुझ से संपर्क करने को) दिया था किन्तु मेरा वह दोस्त सपरिवार शहर से बाहर गया हुआ है .रात को मैं आराम से घर पर सोया .दूसरे दिन मैं सुबह अस्पताल पहुंचा तो मरीज के घरवालों को बहुत परेशान पाया .मुझे देखते ही सब इस तरह खुश हो गये जैसे खोई हुई अमूल्य वस्तु मिल गई हो .
 मरीज की माँ बोली –‘बेटा कल तुम कहाँ चले गए थे ? तुम्हें न जाने कहाँ कहाँ ढूँढा ,इस समय तक तो ओप्रेशन भी हो चुका होता . जल्दी से चल कर एडमिट हो जाओ ’
‘नहीं माता जी मैं अपना गुर्दा नहीं दे सकता ...मेरी पत्नी ने रो रो कर बुरा हाल कर लिया है .वह नहीं चाहती की पैसों के लिए मैं अपनी जान खतरे में डालूँ ‘
 ‘यह तुम क्या कह रहे हो बेटा ? अंत समय में धोखा मत दो ,चाहिए तो कुछ रुपये ज्यादा ले लो ...मना मत करो, मेरे बेटे को बचालो ’माँ रोने लगी थी
‘प्लीज भैय्या मेरे पति को बचा लो ...मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ ’
‘मैं कौन होता हूँ बहन, बचाने वाला तो वो भगवान है ’ पर उन्हें बिलखता देख कर मन कर रहा था बिना किसी शर्त या मांग के मैं अपना गुर्दा दान करदूं किन्तु मेरी परिस्थितियां भी तो भयंकर थीं .मेरी गृहस्थी की नाव भी तो मझधार में हिचकोले खा रही थी ,उसे भी तो डूबता हुआ नहीं देखा सकता .मैं ने मन को भावुक होने से बचाया और कहा – ‘नहीं बहन आप रो मत ,आपके पति जरूर ठीक हो जायेंगे.अपनी पत्नी की इच्छा के विपरीत मैं अपना गुर्दा देने को तैयार हूँ ,मेरी  दो छोटी छोटी बेटियां हैं ...मेरा मकान गिरवी रखा है .हाथ कट जाने की वजह से मैं बेरोजगार हो गया हूँ .मुझे धन की सख्त आवश्यकता है .यदि आप मुझे सवा  लाख रूपए दें तो मैं अपनी पत्नी को मना लूँगा...मुझे गलत मत समझना बहन . मजबूरी में मुझे अपने शरीर के एक हिस्से का सौदा करना पड़ रहा है...गरीबी व हालात के हाथों मजबूर हूँ ’
 माँ ने कहा - ‘ठीक है हम तुम्हें सवा लाख दे देंगे’          
     तभी मरीज के पिता मि. सरीन आगये .अपनी पत्नी को गुस्से से घूरते हुए बोले –‘इतने रूपए हमारे पास नहीं हैं ...हम नहीं दे पायेंगे .’
 पत्नी हाथ पकड़ कर उन्हें कौने में ले गई –‘तीन महीने से हम इस शहर में पड़े हैं .इतने दिन से तुम्हारा व्यापार भी बंद पड़ा है.बेटे की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है.पैसों क वजह से यह भी हाथ से निकल गया तो ? एसा न हो दूसरे डोनर के इंतज़ार में हम अपना बेटा ही खो दें .रूपए मत देखो ...उसे हाथ से मत जाने दो...रोक लो उसे .’कह कर उनकी पत्नी बिलख बिलख कर रोने लगी थी .
 ‘ठीक है... ठीक है बेटा मैं तैयार हूँ .अब चल कर तुम अस्पताल में भरती हो जाओ . डाक्टर साहब कह रहे हैं कल सुबह ओप्रेशन भी हो जायेगा ’
 ‘सरीन साहब एक प्रार्थना और है ,मुझे पूरी रकम आप्रेशन से पहले चाहिए .आप्रेशन के दौरान यदि मेरी मौत हो गई तो पता नहीं रुपये मेरी पत्नी को मिल पायेंगे या नहीं ?...मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहता ’
 मि.सरीन को गुस्सा आ गया –‘सब धन राशि हम तुम्हें पहले कैसे दे दें ? कल से तुम्हें ढूंढ रहे हैं किन्तु नहीं ढूंढ पाए .अस्पताल में तुमने गलत पता लिखा रखा था .रुपये ले कर तुम्हारा मन बदल गया तो हम तुम्हें कहाँ ढूंढेगे ?’
‘आपका सोचना गलत नहीं है सरीन साहब .आप मेरे साथ चलें ,आपको अपना घर भी दिखा दूंगा .अपनी इस योजना को पत्नी से छुपाने के लिए मैं ने अपने दोस्त के घर का पता दे दिया था किन्तु अब तो वह सब जान गई है .आप रुपये ले कर आइये .पहले हम उसके पास जायेंगे जहाँ मेरा मकान गिरवी रखा है.उसके पैसे चुका कर अपने मकान के कागज़ वापस ले लेंगे .पंद्रह पंद्रह हजार बैंक में अपनी दोनों बेटियों के नाम फिक्स कराऊँगा .बाकी बचे हुए रुपये पत्नी के खाते में डाल दूंगा .यह सब काम निबटा कर अपने घर जाऊँगा .लौटते समय पत्नी को लेकर अस्पताल आ जायेंगे.आकर मैं भरती हो जाऊँगा .पूरे समय आप मेरे साथ रहेंगे .’
‘लेकिन अभी तो मेरे पास एक लाख रूपया ही है ’
‘चलिए कोई बात , मैं न रहूँ तब भी बाद में पच्चीस हजार आप मेरी पत्नी को दे दीजियेगा .’
इस सौदेबाजी में मुझे बड़ा मजा आ रहा था .इतने दिनों से जिल्लत भरी जिंदगी जी रहा था. नौकरी के लिए कहाँ कहाँ नहीं भटका पर मांगने पर एक नौकरी नहीं मिली.सब जगह एक ही जवाब था बिना एक हाथ के काम कैसे करोगे ? पैसे वाले सगे रिश्तेदार भी कन्नी काट गए कि उधार दिया तो पता नहीं यह वापस कर पायेगा या नहीं ?इस बुरे समय में अपने पराये सब की पहचान हो गई.किसी ने किसी तरह की मदद नहीं की .आज इन साहब की भी गरज है तो मिन्नतें कर रहे हैं ...आगे पीछे घूम रहे हैं .पर मैं आज स्वयं को न कारा महसूस नहीं कर रहा .कौन कहता है मैं किसी काम का नहीं .कुछ तो है मेरे पास तभी एक लखपती मेरी हर शर्त मानने को तैयार है ,मुंह माँगा पैसा दे रहा है .सब गरज के सौदे हैं .इस हाथ दे उस हाथ ले का जमाना है .आपसी रिश्ते भी अब भावनाओं से नहीं ,फायदे नुकसान का हिसाब लगा कर निभाए जाने लगे हैं...तो मैं क्या कुछ गलत कर रहा हूँ ?
 यों मैं ने भी उनकी मजबूरी का फायदा उठाया है फिर भी एक सीमा तक . चाहता तो और अधिक मांग सकता था ...और वह देते यह भी मैं जानता हूँ .पर मन के किसी कौने से उठती मेरी अंतरात्मा की आवाज इस सौदे बाजी के लिए मुझे धिक्कार रही थी और उस आवाज को मैं अपने तर्कों द्वारा दबाने की कोशिश कर रहा हूँ .
 मैं अपने मन को समझा रहा हूँ कि जिससे मैं ने यह सौदा किया है वह गरीब, लाचार इन्सान नहीं है.उसे इस सब के लिए अपना घर द्वार नहीं बेचना पड़ेगा .वह एक समर्थ ,संपन्न व्यक्ति है .लाख दो लाख का उस के लिए कोई महत्व नहीं है,भाग्यशाली है वह ,पैसे के बल पर अपने बेटे की जिन्दगी की आखिरी साँस तक उसे जीवित रखने का प्रयास तो कर पा रहा है वरना देश में हजारों लोग दवा या इलाज नहीं, रोटी के अभाव में भूख से दम तोड़ देते हैं .
 मैं ने रुपये झपटमारी कर के तो नहीं लिए हैं ...बस मांग की है.मांग करना कोई गुनाह तो नहीं है .मरीज का इलाज करने की डाक्टर फीस लेता है .आपरेशन करने की सर्जन अच्छी मोटी रकम लेता है .मैं ने तो अभावों की दलदल से अपने परिवार को बचाने के लिए अपनी जिन्दगी का सौदा किया है ,अपने जीवन को दाव पर लगाया है .
 सरीन साहब रुपये लेकर आ गये थे .पूरे दिन वह मेरे साथ रहे.अपने सब काम मैं ने पूरे कर लिए .अंत में घर जाकर मकान व बैंक के कागजात पत्नी के हाथ में सोंपते हुए स्वयं को बहुत हल्का महसूस कर रहा था.अब मुझे मौत से जरा भी डर नहीं था ,आती है तो आये .
 कागजात हाथ में लेकर पत्नी रोती रही थी .मैं उसे समझता रहा था कि यह सच है कि पैसा सब कुछ नहीं होता पर जिन के पास नहीं है उनके लिए बहुत कुछ होता है .जीवन में उसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता .कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है .अपने बच्चों के सुखद भविष्य के बारे में हम नहीं सोचेंगे तो और कौन सोचेगा ? रहने को तुम्हारे पास अब अपना घर है .कोई साहूकार कर्ज वसूलने या मकान मालिक किराये के लिए हर माह पठान की तरह आकर तुम्हारे दरवाजे पर खड़ा नहीं होगा .घर के गुजारे के लायक तुम कमा लेती हो.बच्चों के भविष्य के लिए ,उनकी उच्च शिक्षा के लिए पैसा बैंक में है ही .दुर्भाग्य से मुझे कुछ हो भी गया तो मेरी रूह भटकेगी नहीं .यों मुझे कुछ नहीं होगा ...आज मुझे दवाखाने में दाखिल होना है .कल सुबह आपरेशन भी हो जाएगा ...मैं बहुत खुश हूँ ...वापस आकर मुझे बहुत कुछ करना है ...अँधेरी गुफा से मैं निकल आया हूँ ...बाहर उजाला ही उजाला है .                                 

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-पवित्रा अग्रवाल
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शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

चमत्कार का इंतजार

कहानी

              चमत्कार का इंतजार   

                                    पवित्रा अग्रवाल
 
         मम्मी जी किसी सत्संग से लौट कर आई थीं। वह बहुत खुश नजर आ रही थीं। आते ही मुझसे बोली, "सपना आज एक बड़ा अच्छा समाचार सुनकर आई हूँ। गुजरात में एक माताजी है, उनके आशीर्वाद से कई निसंतानों की गोद भरी हैं। सुना है उन्हें बस कुछ हजार बच्चों का आशीर्वाद देने का वरदान प्राप्त हुआ है। शायद इसीलिए जगह-जगह से सैकड़ों लोग वहाँ जा रहे हैं। कई जगह से स्पेशल बसें भी जा रही हैं। तू भी अर्जुन के साथ वहाँ चली जा। हो सकता है हमारे यहाँ भी कोई चमत्कार हो जाए।'
 उनकी बातें सुनकर मैं ने चुप रहना ही उचित समझा ।...अब तक उनके कहने पर न चाहते हुए भी मैं कई जगह भटक चुकी हूँ।...अब और कहीं जाने का मन नहीं करता।
 "सपना तू चुप क्यों है...कोई जवाब नहीं दिया तू ने ?...'
 "यदि अर्जुन चलने को तैयार हो गए तो चली जाऊँगी मम्मी।...वैसे आप स्वयं अर्जुन से क्यों नहीं कहती ?
 मम्मी चुप रहती हैं।...मैं जानती हूँ वह अर्जुन से कुछ नहीं कहेंगी क्योंकि अर्जुन का इस सब में विश्वास नहीं है। मम्मी कहेंगी भी तो अर्जुन साफ़ मना कर देंगे।...इसलिए वह मेरे ही पीछे पड़ी रहती हैं।
 मम्मी जी से गुजरात की माता जी की चर्चा सुन कर मुझे अपनी सहेली गरिमा का स्मरण हो आया। हम दोनों ने एक साथ हाई स्कूल पास किया था। उसके बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी थी। तीन-चार महीने पूर्व वह मुझे मिली थी। बहुत खुश नजर आ रही थी। शर्माते हुए उसने बताया था कि वह शायद माँ बनने वाली है। तीसरा महीना चल रहा है।
  "मैंने कहा था -" शायद का क्या मतलब है, कोई शक है तो डॉक्टर को दिखा ले..टेस्ट से पता चल जाएगा।'
 वह रहस्यमय ढंग से मुस्कुराई थी - "ना तो मैं डॉक्टर के पास जा सकती हूँ और ना कोई टेस्ट करवा सकती हूँ। जिनके आशीर्वाद से मुझे ये सौभाग्य प्राप्त हुआ है उनका स्पष्ट आदेश है कि बच्चा होने तक न तो किसी डॉक्टर को दिखाना है और न ही कोई टेस्ट करवाना, न कोई दवा खानी है।...वर्ना आशीर्वाद नहीं फलेगा।'
 "मैन्सेज कब हुई थी, इससे अंदाजा लगाया जा सकता है।'
 "मेन्सेज तो मेरा बंद नहीं हुआ है।'
 "फिर तू गर्भवती नहीं है।'
 "माताजी के आशीर्वाद से जो महिलाएँ गर्भवती होती हैं, उनका मेन्सेज बंद होना जरूरी नहीं है।...खास बात तो ये है कि बच्चा नौ महीने से लेकर अठारह महीने के बीच कभी भी हो सकता है।'
 मैं अविश्वास से भर उठी थी "गरिमा मैं डॉक्टर तो नहीं हूँ, किंतु अपने ज्ञान के आधार पर कह सकती हूँ कि गर्भवती होने का पहला लक्षण मेन्सेज बंद होना ही है। दूसरी बात बच्चा नौ महीने ही माँ के गर्भ में रहता है, दस-पंद्रह या अठारह महीने नहीं।'
 "लेकिन सपना ये सच है। हमारी पहचान की जितनी भी महिलाएँ माताजी के आशीर्वाद से गर्भवती हुई है सबका हाल मेरे जैसा ही है।'
 "फिर तुझे कैसे पता चला कि तू माँ बनने वाली है ..माताजी ने कोई दवाई भी खाने को दी थी ?'
 "दवा तो नहीं, किंतु प्रसाद में मिश्री और इलायची दी थी और कहा था इसे पीसकर एक महीने तक रोज सुबह खाली पेट कच्चे दूध के साथ लेना। उनके पास से लौटने के कुछ ही दिन बाद से मेरी तबियत खराब रहने लगी। भूख नहीं लगती, खाने से अरुचि होने लगी। सारे दिन लगता कि उल्टी हो जाएगी। लक्षण तो सारे वही हैं। अब कुछ दिन में फिर उनके पास गुजरात जाना है।...मेरी बात मान कर सपना एक बार वहाँ तू भी हो आ।'
 "तुझे सफलता मिली तो मैं भी हो आऊँगी पर अभी नहीं।'
 "फिर तो माताजी के पास वरदान देने को कुछ बचेगा ही नहीं।'
 "कोई बात नहीं' कह कर मैं ने बात को टाल दिया था।
       पर आज मम्मी जी की बात सुन कर मैं गरिमा का हालचाल जानने के लिए  उत्सुक हो उठी।
 जब मैं गरिमा के घर पहुँची तो उसके यहाँ कोई छोटा सा आयोजन था। गरिमा ने बताया कि उसका सत मासा पूजा जा रहा है। माताजी ने इसके लिए आज की ही तारीख दी थी। फिर भी हमने कोई भीड़ इकट्ठी नहीं की है। बस मेरे पीहर और ससुराल के लोग ही हैं।
 उसे देखकर मुझे आश्चर्य हो रहा था, क्योंकि उसका वजन मैं समझती हूँ एक किलो भी नहीं बढ़ा था। पेट पर जरा भी उभार नहीं था। मैं यह सवाल उससे पूछना भी चाहती थी किंतु वह बहुत खुश थी। सपनों के संसार में खोई थी। फिर भी एक सहेली होने के नाते मैंने कह दिया था, "गरिमा, माताजी के आशीर्वाद के प्रति इतनी आस्थावान भी मत होना कि आशीर्वाद के न फलने पर तुम बेहद निराश हो जाओ या मानसिक रोगी बन जाओ। मन ही मन यह मान कर चलना कि माताजी का रचा संसार छलावा भी हो सकता है।'
 "सपना तू बिल्कुल ठीक कह रही है।...मैं भी पूरी तरह आशावान नहीं हूँ। मेरे मन में भी शंकाएँ समाई हुई हैं, पर मेरी सास पूरी तरह आश्वस्त हैं। एक बार मैंने उनके सामने शंका प्रकट की थी तो उन्होंने मुझे नास्तिक कह डाला था और यह भी कहा था कि किसी आशीर्वाद के फलने के लिए उसमें पूरा विश्वास जरूरी होता है। तब से मैं चुप रहती हूँ। वर्ना सब दोष मुझे दे दिया जाएगा। वैसे माता जी के घर में बहुत सी ऐसी माताओं के फोटो उनके बच्चों के साथ लगे हुए हैं, जिन्हें माता जी के आशीर्वाद से बच्चे हुए हैं। वहाँ मुझे कई महिलाएँ मिलीं, जिन्होंने कहा कि उन्हें माताजी के आशीर्वाद से संतान सुख मिला हैं।'
 "मैं गरिमा को अधिक निरुत्साहित नहीं करना चाहती थी, किंतु मन में कई सवाल थे कि संतान सहित महिलाओं के फोटो लटके होने से ये कहा साबित होता है कि जो कहा जा रहा है वह सच है। जिन महिलाओं ने स्वयं ये बात कही कि वह उनके आशीर्वाद से माँ बनी हैं वह उनकी एजेंट भी हो सकती हैं।'
 मेरी इस मुलाकात के तीन-चार महीने बाद एक दिन गरिमा मेरे पास आई थी। कुछ निराश दिख रही थी। कह रही थी, "दस-ग्यारह महीने तो हो गए और कुछ महीने इंतजार कर लेती हूँ। उसके बाद पुनः: अपनी डॉक्टर के पास इलाज के लिए जाऊँगी।'
 "मैंने गरिमा से पूछा, "तुम्हारे परिचितों में कई महिलाएँ गर्भवती थीं, उनको कुछ हुआ ?'
 "एक महिला ने तो पाँचवें महीने में सोनोग्राफी करवा ली थी। माताजी ने इस सबके लिए मना किया था इसलिए नहीं हुआ होगा।...एक महिला जल गई थी तो डॉक्टर से इलाज कराना पड़ा और दवा भी खानी पड़ी शायद इसलिए उसे भी कुछ नहीं हुआ, लेकिन मैंने अब तक एक बार भी दवा नहीं खाई है। कई बार तबियत खराब हुई किंतु डॉक्टर के पास नहीं गई। देखो क्या होता है। वैसे मेरी सास की पहचान में एक औरत को आशीर्वाद प्राप्त करने के पंद्रह महीने बाद बेटा हुआ है। इससे मन में विश्वास ने फिर जड़ें जमाई हैं।'
 "तुझे उस महिला का पता मालूम है ?...मैं उससे मिलना चाहती हूँ।'
 "सपना एक दिन तू मेरे घर आ जा। सासु जी के साथ उसके घर चलेंगे।'
 एक दिन मैं अचानक  गरिमा के घर पहुँच गर्इं। वहाँ कुछ महिलाएँ बैठी हुई थीं किन्तु गरिमा वहाँ नहीं थी ।पूछने पर उसकी सास ने बताया कि वह बीमार है और अपने कमरे मैं है ।
  "क्या हुआ गरिमा को ?'
  "देखने मैं तो भली-चंगी है ।डॉक्टर की समझ मैं भी कुछ नहीं आया। वैसे भी हम अभी उसे कोई दवा नहीं दे सकते ।'
      अपने कमरे मैं वह उदास लेटी थी - "गरिमा क्या हुआ है तुझे  ?'
  "कुछ नहीं बस डिप्रेशन है।'
  "डिप्रेशन का कारण तू भी जानती है और मैं भी।क्यों अपने को मानसिक रोगी बना रही है  ? माता जी के भ्रम जाल से बाहर निकल ,उससे कुछ हासिल नहीं होगा।'
 "तेरी ये बातें मेरी सास ने सुन लीं तो वह तुझ से भी चिढ़ने लगेंगी । मेरे घर वालों का तो  उन्हें  यहाँ आना भी पसंद नहीं है।.'..
  तभी एक महिला को बच्चे के साथ अपने कमरे आते देख कर  गरिमा ने कहा "सपना मै ने तुम्हें बताया था न  ?.. यह वही बच्चा है जो माताजी के आशीष से हुआ है।'
  मै ने उस महिला से पूछा, "सुना है आपको ये बच्चा माताजी के आशीर्वाद से हुआ है।'...
 "हाँ मैं तो इसे माताजी का आशीर्वाद ही मानती हूँ।...इससे पहले मैं सब कुछ कर के निराश हो गई थी।.. शादी के सात वर्ष बाद माँ बनी हूँ।'
 "ये कितने महीने में हुआ ?'
 "माताजी से आशीर्वाद प्राप्त करने के पन्द्रह महीने बाद हुआ है।'
 "गर्भकाल में आपका मासिक धर्म बंद हुआ था या नहीं ?'
 "शुरू के कुछ महीने तो बंद नहीं हुआ था।...बाद में बंद हो गया था।'
 "आप पहले की तरह दुबली-पतली रहीं या गर्भवती दिखती थीं ?'
 "...अंतिम चार-पाँच महीनों में गर्भवती दिखने लगी थी।...वजन भी काफी बढ़ गया था।'
 मैं समझ गई थी माँ बनने का समय नौ महीने से अठारह महीने तक क्यों रखा गया है।...इस बीच कुछ महिलाएँ यदि प्राकृतिक रूप से गर्भवती हो जाती हैं तो उसे भी माता जी का आशीर्वाद ही समझा जाएगा। खून, पेशाब या कोई भी परीक्षण  इसीलिए मना है कि भेद खुल जाएगा फिर भी किसी ने उत्सुकता वश टेस्ट करा भी लिया तो ये तो पहले ही कह दिया है कि इन स्थितियों में आशीर्वाद नहीं फलेगा। कोई दवा खा लेने से भी आशीर्वाद व्यर्थ हो जाएगा। जबकि अठारह महीने की इस अवधि में बिना किसी दवा के रहना भी हरेक के लिए संभव नहीं है। कोई-न-कोई दवा लेनी पड़ जाती है। फिर मजबूरी में उन्हें विश्वास करना पड़ता है कि माताजी के निर्देशों का पालन नहीं किया गया इसीलिए सफलता नहीं मिली।...माताजी पर अविश्वास की गुंजाइश कम ही है। सब भोली-भाली जनता को बेवकूफ बनाने के तरीके हैं। आश्चर्य तो तब होता है, जब पढ़े-लिखे जागरूक लोग भी इस जाल में फँस जाते हैं।
 मैं घर लौटी तो मम्मी जी ने पूछा कहाँ चली गई थीं ?'
 "अपनी सहेली गरिमा के घर गई थी।...वह भी माताजी के आशीर्वाद से गर्भवती है। ग्यारह-बारह महीने तो हो गए..अभी तक तो कुछ हुआ नहीं है ..अभी भी वे सब चमत्कार का इंतजार कर रहे हैं।..वह
डिप्रेशन का शिकार हो गई है फिर भी इलाज की तरफ़ कोई ध्यान नहीं दे रहा ...उसे पागल बना कर छोड़ेगे ।'
 "उसने भी कोई दवा खाली होगी या कोई टेस्ट करा लिया होगा या फिर वह भी तेरी तरह नास्तिक होगी। सुना है माता जी के आर्शीवाद कई ऐसी औरतों को भी बच्चे पैदा हुए हैं, जो ऑपरेशन करा चुकी हैं या जिनकी बच्चे दानी निकाली जा चुकी है।...भगवान की लीला अपरंपार है।...बस उसमें विश्वास होना चाहिए।'
 "मम्मी जी आप भी कैसी-कैसी बे-सिर-पैर की बातों पर विश्वास कर लेती हैं। यह सब गलत प्रचार है।...लोगों की अज्ञानता का फायदा उठाया जा रहा है।...हम पढ़े-लिखे लोग भी ऐसे जाल में फँसने लगे तो व्यर्थ है हमारी पढ़ाई।'
 "तुम लोग पढ़-लिख कर नास्तिक हो गए हो। न अर्जुन सुनता है न तू समझती है। एक बार मेरी बात मान कर तुम भी वहाँ चले गए होते तो तुम्हारा कुछ बिगड़ जाता ?'
 "मम्मी जी पता नहीं मैं आस्तिक हूँ या नास्तिक। बस इतना जानती हूँ कि डॉक्टर ने हम दोनों में कोई खराबी नहीं बताई है। वैसे तो संतान प्राप्ति की कई नई तकनीक विकसित हुई है, जिससे कुछ प्रतिशत लोगों को सफलता भी मिली है, लेकिन वह पद्धति बहुत खर्चीली है और सफलता की कोई गारंटी भी नहीं है। हमारे पास इतना धन नहीं है कि हम भी किस्मत आज़मा कर देख लें...और इन जादू,टोने, तांत्रिक-फ़क़ीरों    में हमारा विश्वास नहीं हैं।...अब किस्मत में संतान सुख लिखा कर लाए हैं तो वह हमें जरूर प्राप्त होगा वर्ना हम दोनों ने फैसला कर लिया है कि एक साल इंतजार करके किसी अनाथालय से एक बच्चा गोद ले लेंगे।'
 "अपना फैसला मम्मी जी को बता कर कपड़े बदलने के बहाने अपने कमरे में चले जाना ही मैंने उचित समझा क्योंकि मैं किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहती थी। लेकिन मैं जानती हूँ कि वह अब  बड़बड़ा रही होगी कि कितनी बार इन्हें समझाया है कि अनाथालय में पल रहे बच्चों के न माँ-बाप का पता होता है न उनके जाति-धर्म का। वहाँ से बच्चा गोद लेने की जिद्द छोड़ दे...लेकिन मेरी कौन सुनता है।...करेंगे ये लोग वही जो इनके मन में है।...करो जो मन में आए मैं कौन होती हूँ रोकने वाली।'

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-पवित्रा अग्रवाल
 

शनिवार, 7 नवंबर 2015

पहला कदम

कहानी
                           पहला कदम 


                                               
     पवित्रा अग्रवाल

        आज बुआ फिर आई थीं .बुझा बुझा सा मन ,शिथिल सा तन ,भावहीन चेहरा देख कर मैं दुखी हो जाती हूँ .जब फूफा जी जीवित थे ,एक स्निग्ध सी मुस्कराहट बुआ के व्यक्तित्व का हिस्सा थी .हर समय मैं ने उन्हें खुश देखा था .बीमारी में भी उन्हें कभी मुह लटकाये या हाय हाय करते नहीं देखा था .एक मेरी माँ हैं हर समय खीजती ,झुंझलाती रहती हैं जैसे उनसा दुखी इन्सान कोई दूसरा नहीं .ज़माने भर के सारे गम भगवान ने जैसे उनकी झोली में ही डाल दिए हों .पर बुआ अपने जीवन में बड़ी संतुष्ट थीं .कम से कम देखने वाले को तो ऐसा ही महसूस होता था .एसा भी नहीं कि उनके जीवन में उलझनें नहीं थीं.बच्चों की पढाई की वजह से उन्हें फूफा जी से अलग रहना पड़ता था क्यों की फूफा जी की तबादले वाली नौकरी थी .कहीं छह महीने, कही साल तो कहीं दो तीन साल भी उन्हें रहना पड़ जाता था .इस अनिश्चितता की वजह से बच्चों की पढाई में बाधा पड़ती थी , इसलिए बुआ इस कसबे में बच्चों के साथ रहती थीं .फूफा जी जब तब आते रहते थे .छुट्टियों में बुआ बच्चों के साथ उनके पास चली जाती थीं .
        मुझे याद है आसपास की महिलाएं अक्सर बुआ से मजाक करतीं व उन्हें छेड़ती रहती थीं – ‘अरे रेड्डी गारु पर नजर रखना .तुम यहाँ रहती हो वह बाहर अकेले रहते हैं... आंध्रा में तो दो बीबी रखने का रिवाज सा रहा है .किसी दूसरी के जाल में फंस गए तो सारी  उम्र पछताओगी .’
         कभी बुआ हंस कर टाल देती थीं तो कभी कह भी देती थीं –‘इस तरह की बातें मैं नहीं सोचती ,यह रिश्ता विश्वास का है और विश्वास पर दुनियां कायम है .बिना किसी आधार के मैं शक करूँ या भविष्य की कल्पना करके अपने सुखी वर्तमान को दुखी बनाऊं ,यह मुझे पसंद नहीं .फिर भी यदि किस्मत में वैसा लिखा है तो जब होगा तब सोचेंगे की क्या करना है ’.
        बुआ का घर हमारे घर से बहुत दूर नहीं था .एक दिन अचानक हैदराबाद से फूफाजी के एक्सीडेंट का समाचार आया था कि ‘हालत गंभीर है,सर में बहुत चोट आई है’, सुन कर माँ ,पापा, बुआ तभी चले गए थे किन्तु मौत किसी छलिया सौत सी फूफा जी को बुआ से छीन कर लेजा चुकी थी .बुआ की जिंदगी रेगिस्तान बन गई थी और छोटे बड़े झंझावतों से निरंतर जूझते रहना उनकी नियति थी . फूफाजी पांच बच्चे छोड़ गए थे ,तीन बेटियां ,दो बेटे .सबसे बड़ी कात्यायनी सोलह साल की रही होगी .तब वह इंटर प्रथम वर्ष में पढ़ रही थी .उससे छोटा राघव हाई स्कूल में था .मुझे याद है सब रिश्तेदारों का सुझाव था की जल्दी से जल्दी कात्यायनी की शादी करदी जाये तो एक जिम्मेदारी ख़तम हो जायेगी .बाकी की दोनों तो अभी बहुत छोटी हैं .शादी के कई रिश्ते भी आये थे लेकिन बुआ ने मना  कर दिया . उनका कहना था कि बिना बाप की बच्ची है पर माँ तो अभी जिन्दा है न.उसे मैं खूब पढाऊँगी ताकि भविष्य में जरुरत पड़ने पर वह आत्मनिर्भर बन सके .उसके पिता की इच्छा अपने बच्चों को खूब पढ़ाने की थी ,रिश्तेदारों को बुरा भी लगा पर बुआ अपने फैसले पर अडिग थीं .
        वह ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थीं ,हाई स्कूल पास थीं .उनकी योग्यता के हिसाब से उन्हें फूफाजी के दफ्तर में ही नौकरी मिल गई थी .छोटे बच्चों को घर में छोड़ कर कैसे ऑफिस जाऊँगी यह सोच कर वह परेशान थीं.हमारी दादी हमारी मम्मी से परेशान थीं और हमारी मम्मी को भी अपनी सास यानि हमारी  दादी का साथ रहना अच्छा नहीं लगता था .दादी को राह मिल गई थी और वह बुआ के साथ रहने चली गई थीं.अपनी माँ का साथ पाकर बुआ की परेशानियाँ कम हो गई थीं .      
        हैदराबाद में मकान बनाने के लिए फूफा जी ने प्रोविडेंट फंड से लोन  लिया हुआ था,अतः आफिस से तो ज्यादा पैसा नहीं मिला था .हाँ बीमा कंपनी से बुआ को करीब अस्सी हजार रुपये मिले थे जिन्हें वह बैंक में फिक्स करना चाह रही थीं पर हमारे पिता का कहना था कि बैंक में पैसा रखने से अच्छा है तुम वह रुपये मुझे देदो .मैं तुम्हारे नाम से कोई  जमीन खरीद देता हूँ ...प्रापर्टी पर बहुत तेजी से दाम बढ़ते हैं ,कुछ वर्षों में ही तीन चार गुने हो जायेंगे ,जब जरुरत हो बेच लेना .’
      बुआ ने बीस हजार अपने पास रख कर साठ हजार अपने भाई यानि हमारे पिता को देदिए थे. फूफा जी की मृत्यु हुए करीब सात आठ वर्ष हो चुके हैं .बुआ उनकी मौत के दो वर्ष बाद ही हैदराबाद चली गई थीं क्यों कि बच्चो की पढाई की सुविधाएँ वहां अधिक थीं .
        वही बुआ रात भर का सफ़र कर के हैदराबाद से आई हैं. करीब करीब हर महीने आती हैं, पापा से अपने पैसे वापस मांगने और यहाँ से हर बार कोई नया बहाना बना कर ,नये आश्वासनों के साथ बैरंग लिफाफे की तरह लौटा दी जाती हैं .बुआ को ड्राइंग रूम में बैठा कर मैं माँ  के स्नान घर से बाहर आने की प्रतीक्षा कर रही थी. उनके आते ही मैंने उन्हें बुआ के आने की सूचना दी थी तो माँ ने मुझे डांट दिया –‘अरे कह देती पापा बाहर गए हैं, चार पांच दिन में वापस आयेंगे....जब देखो तब पठान की तरह तकाजा करने चली आती हैं ...उनका पैसा खाना थोड़े ही है , जब होगा तब दे देंगे ’
‘अम्मा बुआ को तुम्हारे घर आने का कई शौक नहीं है .अकेली औरत के लिए नक्सलवादी इलाके में रात को बस का सफ़र करना खतरे से खाली भी नहीं है...किन्तु बेचारी मजबूर हैं .जब तक तुम उनका पैसा नहीं लौटाओगी इसी तरह उन्हें धक्के खाने पड़ेंगे ....पापा से कह कर उनके रुपये अब तो वापस करा दो माँ.अब तक तो बैंक में भी उनके पैसे डबल हो जाते,यहाँ तो उनका मूल धन भी फंस गया है ’
         ‘अच्छा ! तेरे को इतना पढाया लिखाया ,अब तो तू हमें ही कानून पढाने लगी है और गैरों की तरफदारी करने लगी है ’
        ‘वो गैर नहीं हैं अम्मा . जो रिश्ता तुम्हारा मामा से है ,वही रिश्ता बुआ का पापा से है .जब मामा गैर नहीं हैं तो बुआ गैर कैसे हो गई ? ’ 
        ‘श्रीलता ,तेरी जवान आज कल बहुत चलने लगी है .तेरी ही वजह से उसका पैसा फंसा रखा है .उसका बेटा राघव डाक्टरी की पढाई कर रहा है .चिराग लेकर ढूंढने पर भी वैसा लड़का अपनी बिरादरी में नहीं मिलेगा और मिल भी गया तो लाखों रुपयों की मांग होगी .मैं तेरी शादी उससे करना चाहती हूँ .हमें उसका एक पैसा नहीं रखना है ,ब्याज के साथ सब लौटा देंगे.मैं तो सोचती थी कात्यायनी की शादी भी हम ही करा दें .एक रिश्ता लेकर तेरे पापा हैदराबाद उनके पास गए भी थे . माँ बोले तो बोले उनकी बेटी कात्यायनी ने भी तेरे पापा की कैसी इज्जत उतारी थी .क्या नहीं कहा उनसे ?...कहा था मामा तुम्हारा नाम दया शंकर नहीं कंस मामा होना चाहिए था जो अपनी बहन और उसके बच्चों का दुश्मन बना है .एक बच्चे के बाप ,जिसकी बीबी ने जल कर आत्म हत्या करली थी ,उस से मेरी शादी करना चाहते हो ? ...कितनी दलाली मिली है तुम्हे ? बहुत अच्छा है तो उससे अपनी बेटी की शादी क्यों नहीं करा देते ?’
      ‘कात्यायनी अक्का  ने कुछ गलत नहीं कहा अम्मा .मेरे लिए कोई ऐसा रिश्ता लाता तो मैं भी ऐसा ही कहती .अम्मा एसा कौन सा एब है जो उस आदमी में नहीं है ... तंग आकर उसकी पत्नी ने आत्महत्या करली थी और पापा उससे कात्यायनी अक्का की शादी कराने की सोच रहे थे...ऐसा तो कोई दुश्मन ही कर सकता है , शुभचिन्तक नहीं ’ अम्मा बुआ के पास चली गई थीं .
      बिना पढ़ी लिखी मेरी माँ इतनी षडयंत्रकारी और जालिम हो सकती हैं देख कर मुझे अचरज होता है .तभी ड्राइंगरूम से माँ ने मुझे पुकारा था ‘श्री लता बुआ के लिए चाय नाश्ता ले कर आ’ ...मैं समझ गई थी की बुआ को शादी के लिए पटाना है इसीलिए उनकी आवभगत की जा रही है .
       अम्मा की आवाज मुझे रसोई घर में भी सुनाइ दे रही थी –‘राघव की शादी के बारे में क्या सोचा है तुमने ? मुझे वह बहुत पसंद है .मैं श्री लता की शादी राघव से करना चाहती हूँ ...अपनी श्रीलता भी देखने में सुन्दर है बी ए पास है ...पैसे की चिंता तुम मत करो .तुम्हारे भाई तुम्हारा पैसा लौटने के लिए परेशान हैं.एक जमीन बेचने को तैयार हैं ...अच्छा ग्राहक मिलते ही सौदा कर देंगे और वह पैसे तुम्हें ही देंगे .’
यह बात तो तुम पिछले छह साल से कह रहे हो पर जमीन का ग्राहक तुम्हें अभी तक नहीं मिला ...जाने मिलेगा भी या नहीं ?...मेरे इन पैसों का श्रीलता की शादी से क्या सम्बन्ध है …शादी पैसे लौटाने की शर्त है क्या ?’
       ‘नहीं ऐसा कुछ नहीं है .तुम्हारा पैसा तो तुम को देना ही है पर मेरी दिली इच्छा है की राघव को ही अपना दामाद बनाऊ ’
     ‘राघव ने अभी एम.बी.बी.एस. पूरा नहीं किया है .उसके बाद वह एम.डी.करना चाहता है,उसके बाद शादी की सोचेंगे .उस से पहले तो कात्यायनी की शादी करनी है .हाथ में पैसा हो तो कहीं शादी की बात भी करूँ.बिना पैसे के तो मेरी बेटी ऐसे ही रह जाएगी,बिना शादी के .तभी तुम्हारे यहाँ चक्कर लगा रही हूँ .मेरे पैसे लौटा दो ,मुझे ब्याज भी नहीं चाहिए ’
        ‘आज तक किसी की बेटी बिना शादी के रही है जो तुम्हारी रह जाएगी ...हम लोग हैं न ...सब मिल कर कोशिश करेंगे .तुम राघव से श्रीलता की शादी के लिए हाँ करदो बस ,शादी की हमें कोई जल्दी नहीं है,बाद में कर लेंगे ’
     ‘राघव अब बड़ा हो गया है ,मैं उससे जबरदस्ती नहीं कर सकती .एक बार मैं ने श्रीलता के बारे में उससे बात की थी तो उसने कहा – ‘मैं निकट रक्त सबंधों में शादी के खिलाफ हूँ, ऐसी शादियाँ करना  मेडिकल पॉइंट आफ व्यू से ठीक नहीं हैं ...बच्चे शारीरिक ,मानसिक रूप से विकलांग पैदा हो सकते हैं और भी बहुत कुछ हो सकता है .’
    ‘रहने दो यह बातें ,हमेशा से हम लोगों में एसी शादी होती आ रही हैं .तुम्हारी और मेरी शादी भी सगी बुआ के बेटे से हुई थी .हमारा तुम्हारा  कौन सा बच्चा ख़राब या विकलांग है ?’
    ‘अब उससे बहस तो मैं नहीं कर सकती.अपने ही पैसे वापस लेने के लिए श्रीलता से उसकी शादी जबर्दस्ती करा भी दूं तो क्या गारंटी है वह तुम्हारी बेटी को खुश रखेगा ?’
   अम्मा ने बुआ से न जाने क्या कहा था कि वह पापा से बिना मिले ही वापस लौट गई थीं ...शायद रोती हुई .वैसे हमेशा ही वह रोती हुई लौटती हैं .उनके जाते ही मैं अम्मा पर बरस पड़ी थी –‘तुम क्यों राघव के पीछे पड़ी हो ,मुझे उससे शादी नहीं करनी .मेरे जीवन को ,मेरी छोटी छोटी खुशियों को दाव पर मत लगाओ माँ . उनकी मजबूरी का फायदा उठा कर मुझे उनके गले में बांधने की कोशिश क्यों कर रही हो ?मुझे जान बूझ कर कुए में मत फेंको .तुम्हारे द्वारा इतना सताए जाने के बाद भी क्या वो तुम्हारी बेटी को प्यार या उचित सम्मान दे सकेंगे ? मैं उस घर में सर उठा कर चल सकूंगी ? तुम्हारे गुनाहों की वजह से, मैं तो वैसे ही शर्मिंदा हूँ...मुझे वहां शादी नहीं करनी है .बुआ चाहेंगी तब भी नहीं ’ कह कर मैं वहां से हट गई थी .तभी पडौस की राव आंटी आ गई थीं,वह माँ से कह रही थीं ‘तुम्हारी ननद आज रोती हुई लौटी हैं ...कुछ कहा सुनी हो गई थी क्या ?’
      ‘अरे नहीं वह अपनी बेटी की शादी को लेकर परेशान हैं ...उन्हें पचास साठ हजार रुपयों की जरुरत है ...तुम तो जानती ही हो अपनी भी चार बेटियां हैं .इतनी बड़ी रकम कहाँ से देदें ?कहीं से इंतजाम करा भी दिया तो वह वापस कहाँ से करेगी ? इसी लिए दुखी है ,हम भी क्या करें ?’
     मैं माथा थाम के बैठ गई थी,ओ माँ तुम इतनी झूठी हो यह मुझे अब तक नहीं पता था .मुझे क्या होता जा रहा है ,दिन पर दिन मैं माँ के खिलाफ होती जा रही हूँ .उनका व्यवहार असहय होता जा रहा है .मन करता है जाकर सब के सामने उनका असली रूप प्रकट करदूं .सब से कहूं वह बेईमान और धोखेबाज हैं .इस घर में अब एक मिनट भी दिल नहीं लगता ,दम घुटता है मेरा यहाँ ...कहीं दूर भाग जाने की इच्छा बलवती होने लगती है,पर कहाँ जाऊं ?
          पहले मुझे यह सब बातें विस्तार से नहीं मालूम थीं .जब बुआ आती थीं तो मैं अक्सर स्कूल में होती थी .घर में होती भी थी तो अम्मा वहां बैठने नहीं देती थीं फिर कभी इतनी रूचि भी नहीं रही थी कि कुछ जानने की कोशिश करूँ .एक बार बुआ की बेटी कात्यायनी अक्का  भी उनके साथ आई थी .तब उन्ही से सब कुछ जाना था . अक्का ने बड़े करुण स्वर में कहा था –‘श्रीलता मामा –मामी से कह  कर हमारे रुपये वापस करा दे न ,हम बहुत परेशानी मे हैं .जैसे अपनी संतान को सही राह दिखाना माता पिता का काम होता है वैसे ही माता पिता द्वारा जाने अनजाने में यदि कुछ गलत हो रहा है तो बच्चों में उसका विरोध करने का साहस होना चाहिए .’
      तभी कात्यायनी अक्का ने एक घटना सुनाई थी—‘जब हमारे पिता जीवित थे तब उन्होंने हैदराबाद में मकान बनवाते समय अपने एक दोस्त से पंद्रह-बीस हजार रुपये यह कह उधार लिए थे कि एक दो महीने में ऑफिस से मिलते ही लौटा दूंगा .जब ऑफिस से रुपये मिले तो मेरे छोटे भाई बहन पीछे पड़ गए कि फ्रिज और टी वी चाहिए .पापा भी लाने को तैयार हो गए थे .मैं ने पापा को याद दिलाया कि यह रुपये तो आप को अपने दोस्त को वापस देने हैं .पापा ने लापरवाही से कहा मकान का किराया आना शुरू हो गया है.थोड़े पैसे ऑफिस से अभी और आने हैं ,तब लौटा दूंगा .बच्चे बहुत दिन से टी वी ,फ्रिज की फरमाइश कर रहे हैं ,पहले वही ला देता हूँ ’...पर मैं अड़ गई थी ‘हमें अभी कुछ नहीं चाहिए, पहले कर्जा वापस करिए.यह सामान बाद में भी आ सकता है .’
       पापा बहुत खुश हुए थे ‘थैंक यू कात्यायनी मैं बच्चों के मोह में भटक गया था , तुम ने बिलकुल ठीक कहा ,पहले हमें कर्जा वापस करना चाहिए .’       
     कात्यायनी अक्का के जाने के बाद भी उनकी बातें मेरे कानों में गूंजती रही थीं   ‘हम मामा से कोई खैरात तो नहीं मांग रहे.पापा के बाद अब पैसा ही हमारी डूबती नाव को पार लगा सकता है .वो पैसा उनके मेहनत की गाढ़ी कमाई का था .पैसा न होने की वजह से सलेक्शन के बाद भी मैं मेडिकल में दाखिला नहीं ले पाई क्यों कि हम दोनों भाई बहनों की मेडीकल की पढाई का खर्चा अम्मा नहीं उठा सकती थीं .इसीलिए मैं ने राघव को एडमीशन लेने दिया ,खुद पीछे हट गई .अब पैसे नहीं मिले तो उसको पढाई बीच में छोड़नी पड़ेगी .दूसरा भाई इंजीनियरिंग में नहीं जा पायेगा .दोनों छोटी बहने भी पढ़ रही हैं .भाई तो बहनों की मदद करते हैं .मम्मी  के इन भाई ने तो हमारा ही पैसा न देकर हमारी तकलीफें और बढा दी हैं .’
      अपनी माँ से बात करना व्यर्थ था और पापा से बात करने की हिम्मत नहीं थी . पता नहीं आम परिवारों की तरह हम अपने पापा से क्यों नहीं घुल मिल पाए थे  .शायद माँ व पिता दोनों को ही बेटा न होने का मलाल रहा है .वैसे हमारी सुख सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा गया है .कभी कोई अभाव महसूस नहीं होने दिया लेकिन कभी व्यर्थ का लाड़ भी नहीं लड़ाया गया .
     अम्मा जब बीमार नानी से मिलने दो तीन दिन के लिए गाँव गई थीं तब पापा और बहनों की देखभाल और खाने पीने की जिम्मेदारी मेरी हो गई थी .तभी एक दिन पापा को अच्छे मूड में देख कर मैं ने कहा था –‘पापा आप बुआ का पैसा लौटा दो ,उन्हें बहुत जरुरत है ’
       ‘बेटा ,पैसा हाथ में होता तो कब का लौटा चुका होता ...सब इधर उधर फंसे हैं '
  मैं कहना तो चाहती थी कि फंसे नहीं हैं,सब एक के दो और दो के चार हो रहे हैं लेकिन कह नहीं पाई .बस इतना ही कहा – ‘दस बीस हजार अभी भेज दें बाकी के कुछ दिन बाद भेज देना ‘
     ‘ठीक है.कुछ भेजने की कोशिश करता हूँ...अपनी माँ को नहीं बताना .’
पूछने का मन हुआ था कि आप माँ से इतना डरते क्यों हैं ?बुआ आप की कमाई मे से उधार या उपहार नहीं मांग रही हैं, वे अपने  पैसे मांग रही हैं ,माँ बीच में कहाँ से आ गयीं  ? उनसे पूछने या न पूछने या छिपाने का प्रश्न ही कहाँ उठता है. पर चाह कर भी कुछ नहीं कह पाई .
पता नहीं पापा माँ से इतना क्यों दबते हैं या तो घर में कलह से कतराते हैं या माँ को हाई ब्लड प्रेशर है ,उनको तनाव न हो इस लिए चुप हो जाते हैं या  फिर समय  समय पर  माँ द्वारा जान देने की दी गई धमकी से डर जाते हैं कि कहीं सचमुच ही वह कुछ कर न बैठें .यदि पापा की नीयत साफ है तो अम्मा को बिना बताये ,चाहे किश्तों में ही सही बुआ को पैसे लौटा सकते थे...लेकिन उन्हों ने ऐसा नहीं किया .इस से तो एसा लगता है कि पापा की नीयत भी ठीक नहीं है .
     बुआ तो कहती हैं शादी से पहले तेरे पापा बहुत सरल ,स्नेही, मददगार और साफ नीयत के इन्सान थे.पैसों से उन्हें जरा भी मोह नहीं था .घर में सभी उन पर बहुत विश्वास करते थे .शादी के बाद शुरू में उनकी तेरी माँ से जरा भी नहीं पटती थी .भाभी तुनक तुनक कर पीहर चली जाती थीं .तब भैया बहुत उदास हो जाते थे ,कहते थे पता नहीं इसके साथ जीवन कैसे कटेगा ?...यह तो बहुत स्वार्थी व पैसे के मामले में बहुत ‘मीन’ है .मेरे विचार तो इस पर किसी बिंदु पर मेल नहीं खाते.उसके घर में उसकी मम्मी का शासन चलता है ,यहाँ भी वह अपना शासन चाहती है.पता नहीं फिर क्या हुआ था ,धीरे धीरे भैया बदलते गए और एक दिन  ऐसा लगा की हमारे भाई अपने स्नेही व्यक्तित्व के साथ कहीं खो गए हैं ...वह वही देखते थे जो भाभी दिखाती थीं ,वही सोचते थे जो वह समझाती थीं .अपनी बुद्धि तो जैसे कहीं गिरवी रखदी थी .फिर भी न जाने कैसे मैं उनकी बातों में आगई .उन पर विश्वास करके सब रुपये उन्हें थमा दिए ...मेरी ही बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी .
      पिता का आज का रूप देख कर मुझे भी नहीं लगता कि कभी वह बहुत अच्छे इंसान रहे होंगे .माँ को अपने अनुरूप नहीं ढाल पाए तो शायद घर की सुख शांति के लिए खुद को ही अम्मा के रंग में रंग लिया था .औरत हो कर भी माँ बुआ का दुःख नहीं समझ पाईं.उनकी संवेदनाएं क्यों नहीं जागती. खुद को बुआ के हालात में रख कर कभी क्यों नहीं सोचा उन्हों ने.उनके साथ भी एसा ही हुआ होता ,उनका भाई भी उनके रुपये हड़प कर जाता तो वे क्या करतीं ? यही बात एक बार मैं ने अम्मा से कह दी थी तो वह तड़प उठी थीं ‘तू हमारा खून है. गैरों के लिए तेरे मन मे इतना दर्द है कि अपनी अम्मा के विधवा होने की बात भी सोच गई ...बाप तुम लोगों की चिंता में घुला जा रहा है .और ज्यादा कमाने के लिए रात दिन एक किये हुए है ताकि तुम लोगों को पार लगा सके .तेरे बुआ के तो दो बड़े बेटे हैं .फूफा के आफिस में नौकरी भी कर रही है .हैदराबाद जैसे बड़े शहर में अपना मकान है .तेरे पापा को कुछ हो गया तो हम तो बरबाद हो जायेंगे .’
      ‘तुम्हारे बेटा नहीं है...अपना मकान नहीं है...हम चार बेटियां हैं तो इसमे बुआ का दोष कहाँ हैं ?बेटियां हैं इस का मतलब यह तो नहीं की दूसरे का पैसा दबा लो , बेईमान बन जाओ ?’            
    फिर मैं ने खुद को थोड़ा शांत कर ,संयत स्वर में कहा था ‘तभी कहती हूँ अम्मा ,किसी का दिल मत दुखाओ...किसी की बद्दूआयें मत लो.बुआ को पूरी रकम लौटा दो ’ पर माँ पर कोई असर नहीं हुआ था .
      अम्मा की आवाज से मेरा ध्यान भंग हुआ था .वह पापा से कह रही थीं ‘तुम्हारी बहन आज फिर आई थी .श्रीलता की शादी के विषय में मैं ने बात की थी लेकिन वह तैयार नहीं है .कहती है राघव नजदीकी रिश्तों में शादी के खिलाफ है .अब वहां तो ना ही समझो .अपनी श्रीलता के लिए दूसरा लड़का तलाशना शुरू करो .अब पहले श्रीलता की शादी करनी है...उसका पैसा बाद में लौटाते रहेंगे ‘ पापा चुप थे .
     पहले पापा अपनी आमदनी की चर्चा घर पर करते थे कि  उस जमीन  की कीमत पांच साल में इतनी बढ़ गई .जो मकान बुक कराया था उसका कब्ज़ा लेते ही इतने प्रॉफिट में खड़े खड़े बेच लो .लेकिन अम्मा ने इस चर्चा पर घर में पाबन्दी लगा दी थी – ‘सब के सामने आमदनी का लेखा जोखा ले कर क्यों बैठ जाते हो ?ज़माना रोने का है.खूब कमाओ तब भी रोते रहो की आमदनी ही नहीं है ...इतने खर्चे कैसे पूरे करूँ ...कर्जे में डूबा हूँ .’
    ‘तुम कैसी बातें करती हो ...घर में तुम्हारी सास नन्द बैठी हैं क्या ,जो सुन लेंगी ?...अपनी बेटियां ही तो हैं .’
     ‘उनके सामने भी यह सब बातें करने की क्या जरुरत है ?...तुम कुछ नहीं समझते .तुम्हारी बड़ी बेटी श्रीलता तो अपनी बुआ की पूरी चमची है .जब तब बुआ का पक्ष लेकर मुझे उल्टा सीधा सुनाती रहती है ,उनके पैसे वापस करने को कहती है और हमें बेईमान समझती है .’
      ‘ठीक ही कहती है, हमें उसके पैसे अब लौटा देने चाहिए.सब सगे रिश्तेदार मुझे कैसी नज़रों से देखते हैं ,तुम को क्या मालूम ?’
    ‘तुम ने एसा किया तो अच्छा नहीं होगा...उसने हमारे साथ कौन सा अच्छा व्यवहार किया है .हमारे घर में बेटी बैठी है ...फिर भी वह अपने बेटे के लिए बाहर की लड़की लाएगी...मैं भी उसे सबक सिखाऊँगी...तुम ने बिना मेरे पूछे एक पैसा  भी दिया तो ...जहर खाके मर जाऊंगी .फिर संभालना अपनी चारों बेटियों को’ कह कर अम्मा रोने लगी थीं .
‘अरे कौन दे रहा है...इस घर में तो हमेशा वही होता रहा है जो तुम ने चाहा है...बात बात पर मरने की धमकी देती रहती है .’ पापा ने कहा था
       मैं बहुत बेचैन रहने लगी हूँ .मन न जाने कहाँ कहाँ भटकता रहता है .अपने आप से ही तर्क वितर्क में उलझी रहती हूँ.हमारे देश में तो औरत ही औरत की दुश्मन है .यदि औरतें एक दूसरे का दुःख समझने लगें तो महिलाओं के पचास प्रतिशत दुःख मिट जायेंगे . हत्या आत्महत्याओं में भी कमी आजायेगी .कभी कभी तो मन करता है कि खाना पीना छोड़ कर अनशन चालू करदूं कि पहले बुआ का पैसा लौटाओ तब ही अन्न जल ग्रहण करूंगी .कभी मन करता है घर से रुपये चोरी करके बुआ को दे दूं ,बाद में जो होगा देखा जायेगा .पर यह सब सोचती रह जाती हूँ ,कर कुछ नहीं पाती किन्तु मुझे कुछ करना चाहिए ...सब से पहले मुझे आत्म निर्भर बनना होगा ,उसके बाद ही कोई ठोस कदम उठा पाऊंगी .
       तभी एक दिन पापा को माँ से कहते सुना था – ‘रोज पीछे पड़ी रहती हो कि श्रीलता के लिए लड़का ढूंढो ,लड़का ढूंढो.मैं ने एक लड़का देखा है ...पढ़ा लिखा है ,सुन्दर है ,घर में खूब पैसा है...सब से बड़ी बात उनकी मांग कुछ नहीं है .बस उन्हें सुन्दर ग्रेजुएट लड़की चाहिए .परसों वह लोग आरहे हैं ,लड़की पसंद आगइ  तो एक महीने के अन्दर शादी भी करना चाहते हैं '
         वह लोग आये थे .मधुकर मुझे भी अच्छा लगा था ,एक महीने के बाद बारात भी आगई थी .शादी की रस्म से पहले अचानक मधुकर मेरे पिता को भीड़ से अलग एकांत में ले गये .उपस्थित लोगों को यह सब अप्रत्याशित सा लगा .उन में कानाफूसी होने लगी कि लगता है दहेज़ की कोई नई मांग करनी होगी .मैं,मम्मी, मधुकर के पापा,बुआ आदि कुछ निकटतम रिश्तेदार भी उनके पीछे पीछे वहां पहुँच गए कि आखिर बात क्या है .मधुकर पापा से  कह रहा था ‘मुझे शादी से पहले एक लाख रुपये चाहिए ‘
       यह मांग सुन कर मधुकर के पिता घबड़ा गए थे कि बेटे को अचानक यह क्या हो गया .वह बोले – ‘मधुकर यह क्या तमाशा है ...शादी के बीच पैसा कहाँ से आगया ? मैं एक सच्चा समाज सुधारक हूँ ,सच्चे मन से इस काम में लगा हूँ .मैं दहेज़ के सख्त खिलाफ हूँ .अखवारों में फोटो छपवाने या सरकारी ,गैर सरकारी पुरस्कार पाने के लिए मैं ने समाज सेवा का ढोंग नहीं रचा है...तुझे जितना चाहिए मैं दूंगा.’
       मुझे ध्यान आया की सुबह राघव के हाथ से मधुकर ने एक पत्र मुझे भेजा था ,उसमें लिखा था – ‘ राघव से मुझे पता चला है कि तुम ने शादी के इस अवसर पर रिश्तेदारों के सामने बुआ को अपने रुपये वापस  मांगने की सलाह दी है , इसका मतलब घर में इतने रुपये तो होंगे ही .बुआ की मदद के लिए मैं एक नाटक करना चाह रहा हूँ...मेरा विश्वास है कि तुम मेरे साथ हो ’
    मैं ने अपनी स्वीकृति लिख कर भेज दी थी . मैं समझ गई कि अचानक यह मांग उसी नाटक का पहला भाग है अतः मैं शांत रही .
      पापा के हाथ पांव फूल गए थे .घबराये हुये वह मेरे पास आये –‘पहले तो इन्होंने कुछ नहीं माँगा था ...अब अचानक यह मांग रख दी .बेटी तेरी ख़ुशी के लिए मैं  यह मांग पूरी कर भी दूं...पर क्या भरोसा है कि एसी मांग आगे भी बार बार नहीं की जायेगी ?...और पूरा न किये जाने पर वही अंत होगा...जल जाएगी ...जला दी जाएगी या घर से निकाल दी जायेगी ‘ पापा अनिर्णय की स्थिति में थे
       तभी मधुकर का स्वर गूंजा –‘ आप लोग मुझे गलत न समझें ,भगवान की कृपा से हमारे पास सब कुछ है ,मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए ...पर आप के पास भी कोई कमी नहीं है फिर भी आपने अपनी बहन के साथ एसा क्यों किया ? आप ने बहुत वर्षों पहले अपनी बहन से साठ हजार रुपये लिए थे कि उनके नाम से कोई प्रोपर्टी खरीद देंगे और कीमत बढ़ जाने पर उसे बेच देंगे .इस बात को सात –आठ वर्ष हो गए .ना तो आपने प्रोपर्टी खरीद कर दी और और न ही मांगने पर भी रुपये वापस किये .आप की बहन रुखा सूखा खाकर गरीबी में दिन काट रही है फिर भी बच्चों को ऊंची शिक्षा दिलाने की कोशिश में लगी है .पैसे के अभाव में बेटी को डॉक्टरी नहीं पढ़ा पाई .अब उसकी शादी भी नहीं कर पा रही हैं .यह किस्सा बहुत दिन पहले मैं ने अपने दोस्त राघव से सुना था .तब मुझे नहीं मालूम था कि कभी राघव के उन्हीं मामा की बेटी से मेरा विवाह होगा .आज राघव को यहाँ देख कर मैं चोंका था .फिर पता चला कि आप, राघव के वही मामा हैं जिन्हों ने अपनी बहन के पैसे वापस नहीं किये हैं .अब तक दस हजार ही दिए हैं .राघव की माँ भी यहाँ आई हुई हैं .सुबह से मैं उलझन में था कि कैसे उनकी मदद करूँ .और उनकी मदद के लिए ही मैं ने एक लाख की यह मांग की है .मैं आप से प्रार्थना करता हूँ कि एक लाख रुपये अभी राघव की माँ को लाकर दे दें .’
    अम्मा फिर बुआ को कोसने लगी थीं “मैं ने तो पहले ही कहा था कि अपनी बहन को शादी में मत बुलाओ .सबके सामने हमारी इज्जत का कचरा कर दिया ’ माँ रोने बैठ गई थीं .
        सात आठ दिन पहले ही पापा ने कोई जमीन बेच कर डेढ़-दो लाख रुपये घर में लाकर रखे थे कि शादी के घर में न जाने कब क्या जरुरत पड़ जाए.पापा ने बिना माँ की तरफ देखे तत्काल एक लाख रुपये लाकर बुआ के हाथ में रख दिए -- ‘ले बहन तेरी अमानत ,शर्मिंदा हूँ अभी तक नहीं दे पाया था .ये रुपये परसों ही तेरे लिए लाकर रखे थे .सोचा था शादी से लौटते समय तुझे सरप्राइज दूंगा लेकिन उससे पहले ही दामाद जी ने हमें सरप्राइज दे दिया .’
       मैं जानती हूँ बुआ को रुपये वापस करने का पापा का कोई इरादा नहीं था किन्तु इस समय उनके इस झूट से मुझे राहत मिली है .मजबूरी में ही सही बुआ का पैसा उनके हाथ से निकला तो .अब उन्हें रिश्तेदारों से नजर नहीं चुरानी पड़ेगी .मेरे पापा बेईमान हैं ,सगी विधवा बहन का पैसा खा गए ,मुझे इस अहसास के साथ नहीं जीना पड़ेगा .
        बुआ ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि इतने सारे रुपये उन्हें एक साथ मिल जायेंगे .उन के चहरे पर अजीब से भाव थे जैसे उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह सच है.कहीं एसा न हो कि वह यह ख़ुशी बर्दाश्त ही न कर पायें ,राघव ने उन्हें बाँहों का सहारा दे दिया था ....सब ठीक हो गया था .
      मेरी आखों से अविरल अश्रु बह रहे थे.शादी के बाद मधुकर के साथ मिल कर मैं  एसा ही कुछ हंगामा  करना चाहती थी ताकि बुआ के पैसे वापस करा सकूं किन्तु मधुकर का मेरी तरफ बढ़ता पहला कदम सब समस्याएं सुलझा चुका था .  मैं भूल गई थी कि मधुकर से मेरी शादी अभी हुई नहीं ,होने वाली है . मुझे लग रहा था उससे तो मेरा जन्मों का नाता है .मैं लाज शर्म ,लोगों की भीड़ सब भूल कर उस से लिपट गई थी – ‘मुझे तुम पर नाज है .जो काम मैं अब तक बेटी हो कर नहीं कर पाई ,तुम ने कर दिखाया .’
       ‘लेकिन तुम्हारे सहयोग व सहमति के बिना मैं यह नहीं कर सकता था .अपने विचारों के अनुरूप तुम्हें पा कर मैं बहुत खुश हूँ .’
        बुआ ने भाव विभोर हो कर हम दोनों को अपने सीने से लगा लिया था                           
                        
( यह कहानी  1997 में प्रकाशित मेरे पहले कहानी संग्रह 'पहला कदम ' में से ली गई है .यह  1993 में मनोरमा में प्रकाशित हुई थी )


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-पवित्रा अग्रवाल
 
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