गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

रिमोट कंट्रोल


कहानी   
 
                 रिमोट कंट्रोल

                                                    पवित्रा अग्रवाल

     
          मुझे रसोई में काम करता देख कर नेहा मेरे पास आ गई --"दीदी क्या कर रही हो ?'
        "कुछ नहीं नेहा किचन कुछ फैल रहा था,सोचा जरा ठीक कर दूँ।'
        "क्या दीदी रात के ग्यारह बज रहे हैं और आप अभी तक रसोई में ही लगी हो ,यह सब काम कल भी तो हो सकते हैं ।इस समय तो आपको जीजा जी के पास होना चाहिए था,वो खाली बैठे टी.वी में टाइम पास कर रहे हैं और आप यहाँ ...।''
       "अरे वो टाइम पास नहीं कर रहे, अपनी पसंद के प्रोग्राम देख रहे हैं ।''
      "जब आप पास नहीं होंगी तो आदमी कुछ तो करेगा ।''
 मैं ने एक क्षण को उस की तरफ नजर उठा कर देखा तो मुझे लगा कि नेहा घुमा फिरा कर मुझ से कुछ कहना चाहती है पर स्पष्ट शब्दो में कुछ कह नहीं पा रही ।मैं ने नेहा से कहा --"तू कुछ कहना चाहती है ?'
       वह एकदम से सकपका गई फिर बोली--"दीदी आज जब हम जीजा जी के साथ बाहर गए थे तो वह कह रहे थे कि "तुम्हारी दीदी के पास तो हमारे लिए समय ही नहीं है,दो लोगों का काम ही कितना होता है ,हमारा खाना रात नौ बजे तक निबट जाता है फिर भी न जाने क्या करती रहती हैं, रोज कमरे में आते आते ग्यारह बजा देती हैं ।'...मैं भी यही देख रही हूँ ।''
      मैंने सोचा यदि मैं शान्त रहती हूँ , कोइ शिकवे शिकायत नहीं करती हूँ या हर दम टी.वी. से चिपके रहने का उलाहना भी नहीं देती हूँ तो अब शिकायत भी वही करेंगे । अरे बोर तो मैं हो रही हूँ,घर में इधर उधर घूम के व्यर्थ के काम करके टाइम तो मैं पास कर रही हूँ---" नेहा तू बिल्कुल ठीक कह रही हैं ,सचमुच मुझे किचन में कोइ काम नहीं है,फालतू की सटर पटर करके टाइम तो मैं पास कर रही हूँ।''
  "आप उनके साथ बैठ कर टी.वी. क्यों नहीं देख लेतीं ?''
 "मेरी रुचि का कुछ हो तो देखूँ न,उनके साथ बैठ कर टी.वी. देखते समय मुझे लगता है मैं टी.वी. नहीं बाइसकोप देख रही हूँ...तुझे याद है न जब हम छोटे थे तब गली में बाइसकोप वाला आता था,उस बाइस्कोप में छोटे छोटे छह सात ढ़क्कन लगे होते थे और वह ढ़क्कन हटा कर छह सात बच्चे एक साथ बाइस्कोप देखने के लिये उसमें आँखे गढ़ा देते थे ।बाइस्कोप वाला एक एक सीन दिखाता जाता था.."बच्चों ये आगरा का ताजमहल देखो,ये जयपुर का हवा महल देखो,ये आमेर का किला देखो,ये दिल्ली की कुतुब मीनार देखो...ये लखनऊ का इमामवाड़ा देखो....वहाँ आवाज व दृश्य में कुछ ताल मेल तो होता था फिर एक सीन समाप्त होने के बाद ही दूसरा सीन आता था और यहाँ एक- एक, दो-दो मिनट पर रिमोट से चैनल बदलते रहते हैं।...अभी हिस्ट्री चैनल लगा, क्षण भर बाद ज्योगरफी चैनल आ गया,जरा घ्यान वहाँ टिकाने की कोशिश की तो फिर शेयर बाजार या कोई न्यूज चैनल आ गया, कभी गाने, कभी सीरियल,कभी कुछ, कभी कुछ  मतलब कोई भी एक प्रोग्राम लगा कर देख ही नहीं सकते।..सच कहूँ तो मेरा सर भन्नाने लगता है पर मैं फिर भी उनसे कोई शिकायत नहीं करती।''
          "दीदी यह तो अब हर घर की कहानी है, कहीं इन वजहों से बीबी परेशान है और कहीं मियां ।मेरा एक कुलीग बता रहा था कि "घर जल्दी जाकर क्या करूँ ...सास बहू दोनो मिल सास - बहू वाले सीरियल देखने में व्यस्त रहती हैं।'...यों होता तो मेरे साथ भी यही है पर आप उन्हें अपनी प्रोबलम बता सकती हो,कोई खास अपनी पंसद का प्रोग्राम देखना हो तो उन्हें चैनल बदलने से रोक सकती हो ।..मैं नहीं समझती कि वह नहीं मानेंगे... जीजा जी आप का तो बहुत ख्याल रखते हैं ।'
        "तो क्या मैं ने कभी तुम लोगों से जीजा जी की बुराई की है ? वह मेरा बहुत घ्यान रखते हैं यह बात भी तुम सब को मैं ने ही बताई है,वह बात गलत भी नहीं है ।सचमुच जब बच्चे छोटे थे और रात में  उठ कर कभी
रोते थे तो शायद ही कभी ऐसा हुआ होगा कि मैं बच्चे को लिए बैठी हूँ और ये आराम से सो रहे हैं,हमेशा मेरे साथ ये भी जगे हैं ।.मैं जो भी खाना बनाती हूँ  खाने में भी नखरे नहीं करते ..और भी बहुत सी क्वालिटीज हैं जो आम पुरुषों में नहीं होतीं ।''
       "बहुत भाग्यशाली हो दीदी आप जो इतना अच्छा जीवन साथी मिला है वैसे आप भी तो घर व बच्चों के लिए पूरी तरह समर्पित रही हो....सर्विस भी छोड़ दी थी।'
       'अच्छे हैं इसका मतलब यह भी नहीं कि उनमें कुछ कमियां या कमजोरियाँ हैं ही नहीं पर कमियाँ तो सब में होती हैं,मुझ में भी होंगी और शादी में सामन्जस्य तो दोनो को ही करना पड़ता है तभी साथ लम्बा चलता है।...पर मैं ने उनकी क्वालिटीज को देखा है । मैं जानती हूँ कि पूरे दिन के व्यावसायिक तनावों को झेलने के बाद आदमी को घर में सुकून मिलना चाहिये।जो आदमी सम्पन्नता होते हुए भी क्लब नहीं जाता,दोस्तो में नहीं घूमता फिरता , उसको इतनी स्वतन्त्रता तो होनी चाहिए कि वह मनोरंजन के लिए अपने घर में अपनी पसंद के प्रोग्राम देख सके या अपनी पसंद की पुस्तक पढ़ सकें ।बस यही सोच कर मैं आम तौर पर उन्हें डिस्टर्ब नहीं करती ।मुझे अपनी पसंद का कोई प्रोग्राम देखना होता है तो लिविंग रूम में बैठ कर देख लेती हूँ या फिर वह काम करने लगती हूँ जो आमतौर पर इनके घर में रहते हुए नहीं करती ताकि कुछ समय इनके साथ बैठ कर बिता सकूँ ।''
      "जिस गहराई से आप अपनी समस्या समझ सकती हो हम दूर रहने वाले उस रूप में नहीं समझ सकते ।यद्यपि रिमोट से खेलने या बार बार चैनल बदलने की बीमारी तो ज्यादातर लोगों में होती है, मेरी कुछ सहेलियाँ  भी इस से त्रस्त हैं।''
       "सोचने की बात यह है कि यदि मैं शिकायत नही करती या शान्त दिखती हूँ सका मतलब यह नहीं कि मैं पत्थर हूँ या मैं इन हालात से खुश हूँ।... मैं भी पूरे दिन अकेले इस घर में बिता देती हूँ ।कभी कभी पछतावा भी होता हे कि अच्छी खासी नौकरी करती थी,बच्चों की सही देख भाल कर सकूँ इस लिए छोड़ दी।..शायद इसी लिए अपना फ्रेण्ड सर्किल भी नहीं बन पाया।'
 "जीजा जी का फ्रेण्ड सर्किल तो होगा ?'
 "न के बराबर ।'
 " फिल्मों का शौक है ?'
 "बिलकुल नहीं ।'
 "हमारे यहाँ उल्टा है।इनको फिल्मों का बहुत शौक है।मुझे उतना नहीं है पर इनको कम्पनी देने के लिए देख लेती हूँ ...फिर आप दिन में कैसे समय बिताती हो ?'
      "अपनी पसंद की पुस्तकें पढ़ लेती  हूँ ,टी.वी देख लेती हूँ फिर भी आँखे घड़ी पर ही टिकी रहती हैं कि  बस ये अब आते होगे ,जनाब आए खाना खाया और बस अपने कमरे में जा कर टी वी देखने में  व्यस्त हो जाते हैं तो मन आहत होता है। कभी अकेले में बैठ कर रो भी लेती हूँ पर फिर अपने को समझा लेती हूँ कि तू पत्नी है जेलर नहीं ...पर अफसोस तो तब होता है जब  शिकायत भी वही करते हैं कि मेरे पास उनके लिए समय नहीं है।''
       न जाने कब से हमारी बातचीत के खामोश श्रोता बने नेहा के पति सौरभ एक दम से प्रकट हुए और बोले --"अरे दीदी आप ऐसा क्यों समझती हैं कि उनके पास आप के लिए समय नहीं है ।हम पुरुष होते ही ऐसे हैं। अब मुझे ही लें मैं चाहे बुक पढ़ता रहूँ या टीवी देखता रहूँ पर नेहा साथ बैठी होती है तो एक सुकून का अहसास सा होता है कि हम साथ साथ हैं।''
 "पर सौरभ, दूसरे को क्या अहसास हो रहा है यह जानना जरूरी नहीं है क्या ?''
 "दीदी आपको तो पढ़ने का बहुत शौक है जब वह टी.वी देख रहे हों तो आप अपनी पसंद की पुस्तक पास बैठ कर पढ़ सकती हैं ...आराम तो कर ही सकती हैं।''
       "सब कर के देख चुकी हूँ ।...बदलते टी.वी चैनलों के शोर के बीच पढ़ने में एकाग्रता नहीं आ पाती और कई बार तो एक पेज पर ही अटक कर रह जाती हूँ ।रही बात आराम करने की तो लाइट और टी.वी के शोर के बीच वह भी संभव नहीं होता । कई बार तो मैं दूसरे कमरे में जा कर सो जाती हूँ''
     "अरे भई यहाँ क्या चर्चा - परिचर्चा हो रही है क्या हम भी शामिल हो सकते हैं ?''
 "हाँ ,जीजा जी आइए न बस आपकी ही कमी थी ।''सौरभ  ने कहा
      पास खड़ी नेहा थोड़े तनाव में आगई--"दीदी जीजा जी मेरे बारे में न जाने क्या सोचेंगे कि एक  बात मन
की कह दी तो साली जी ने फौरन अपनी बहन को बता दी ।''
 "नहीं नेहा तू ऐसा क्यो सोचती है ,मुझे बता कर तो तूने हम दोनों का भला ही किया है।..हम इस पर नए तरीके से विचार कर सकते हैं ।'
 "अरे तुम्हारे किचन का काम अभी निबटा या नहीं..ग्यारह बज चुके हैं ?''
  "मेरा काम तो नौ बजे ही निबट गया था...तुम बताओ तुम्हारे टी.वी. दर्शन का प्रोग्राम अभी समाप्त हुआ  या नहीं ?''
      "टी.वी. तो मैं इस लिए देखता रहता हूँ कि तुम फ्री नहीं होतीं '
 "तुम टी.वी में डूबे होते हो इस लिए मैं ढ़ूंढ़-ढ़ूंढ़ कर काम करती रहती हूँ ।''
  "तो तुम भी टी.वी देखो न कुछ चेन्ज होगा ।''
 "तुम्हारे साथ बैठ कर टी.वी.देखने से तो मेरा दिमाग खराब होने लगता है  ।'
 "क्या मतलब ?''
 "मतलब क्या, बताओ क्या देखूँ ?'
  "जो चाहो वो देखो तुम्हें कौन रोकता है ।'
   "एक टी.वी पर दो लोग अपनी पसंद का प्रोग्राम कैसे देख सकते हैं ?...जो मैं देखना चाहती हूँ वह तुम्हे बकवास लगता है ,जो तुम देखते हो उसे में से बहुत कुछ मेरी रुचि का नहीं होता फिर भी मैं देख सकती हूँ पर तुम्हारा यह रिमोट से खेलना या कहूँ कि हर मिनट चैनल बदलना  मेरे सिर में दर्द कर देता है ।''
     "अरे यार इसमें परेशान होने की क्या बात है,रिमोट अपने हाथ में ले लो और जो देखना चाहो वह देखो ,नींद आ रही है तो टी.वी बन्द कर दो पर प्लीज कुढ़ो मत।''
 नेहा और सौरभ प्रशंसात्मक नजरो से उन्हें देखते हुए बोले--"देखो दीदी जब तक आप अपनी परेशानी बताओगी नहीं दूसरा कैसे समझेगा ...?''
      "लेकिन यह सब कह कर मैं अपनी परेशानी बयां नहीं कर रही हूँ इनकी शिकायत का जवाब  दे रही हूँ...।कभी कभी इस सब से परेशान होती जरूर हूँ पर अपने को समझा लेती हूँ कि  सब की अपनी पसंद व अपने शौक होते हैं और उनको जीवन में शामिल करना ही चाहिए पर अति हर चीज की बुरी होती हैं...देखो न नेहा बच्चे बहुत दूर हैं साल दो साल में कुछ दिन के लिए आ पाते हैं ।हम दोनो को तो अकेले ही रहना है ...जब तक साथ हैं एक दूसरे का ख्याल भी रखना है।''
  "तभी तो कहता हूँ जब तक साथ हैं रूठी रूठी मत फिरो,शिकायत है तो लड़ लो...''
 "वही तो नहीं आता...
 "तो अब सीख लो",तुम्हें उदास देखता हूँ तो मुझे अब तक की अपनी सब उपलब्धियाँ बेमानी सी लगती हैं।''
 मैंने मन में सोचा कुछ ज्यादा ही इम्प्रेसिव डायलौग हो गए हैं,अब बस करो।
 "जाओ दीदी अब सो जाओ ,हम भी सोते हैं फिर सुबह हमें ट्रेन पकड़नी है.. हमारे चक्कर में आपको भी जल्दी उठना पड़ेगा ।''
 ''तू भी क्या बात करती है नेहा,तू जा कर सो मैं समय से उठ जाऊंगी ।'
      दूसरे दिन रिमोट मेरे हाथ में था ।ओ आज तो "सा रे ग म' आएगा और "वोइस आफ इंडिया' भी । ये हम दोनो के ही पसंदीदा प्रोग्राम है किन्तु ये उनके साथ अन्य चैनलो की भी सैर करते रहतें हैं अत: आधा अधूरा देख पाती थी आज पूरा देखूँगी ।
 एक दिन, दो दिन, तीन दिन अब ये कसमसाने लगे थे -- "अरे यार ये क्या सास बहू के बकवास सीरियल देखती हो।जब जिस को चाहा मार दिया ,जब चाहे जिन्दा कर दिया ।प्लास्टिक सर्जरी से चेहरा बदल दिया, एक्सीडेंन्ट में मेमोरी चलीगई,साजिशों का जाल फैला होता है.. सब में एक से ही फार्मूले, इन्हें देख कर तुम लोगों को पता नहीं  क्या मिलता है।...''
  "मैं कहाँ देखती हूँ,मुझे तो ऐसे सीरियल खुद पसंद नहीं हैं। कुछ नहीं होता उनमें वही रोना धोना,साजिशें
।..इन सब से तो अच्छा हैं म्यूजिक व डांस के प्रोग्राम देखो,कोमेडी सीरियल देखो,कौन बनेगा करोड़ पति जैसे ज्ञानवर्धक प्रोग्राम देखो  और वह देखती भी हूँ ।''
 "देखो न कौन मना करता है,मैं भी रिमोट से खेलता नहीं हूँ,बीच बीच में यह सब देखता हूँ ।पर इन सब 
के साथ न्यूज चैनल भी देखने चाहिए ताकि पता रहे कि देश विदेश में, राजनीति में,समाज में क्या हो रहा है।''
       "मुझे भी न्यूज अच्छी लगती हैं पर वे भी तिल का ताड़ बना देते हैं,सनसनी फैलाने में पीछे नहीं रहते। तुम्हें याद है कुछ साल पहले किसी शहर में एक लड़की व एक लड़का शायद पुलिस मुठभेड़ में मारे गऐ थे।मीडिया  ने लड़की के घर वालो , पड़ौसियों , कालेज के साथियों आदि सब से बातचीत दिखा कर टी.वी पर उसकी बड़ी अच्छी इमेज रखी थी पर बाद में पोल खुली कि किस तरह वह एक आतंकवादी के साथ थी और उसके घर का खर्चा भी उसकी इसी कमाई से चल रहा था ..पूरी छान बीन के बिना  इस तरह की विस्तृत न्यूज नहीं आनी चाहिए ।''
  "हाँ सो तो है।''
       'प्रो.मटुकनाथ और जूली को भी कई दिन तक, दिन में कई कई बार इतना हाइलाइट किया गया कि वह तो अपने को हीरो ही समझने लगे होंगे।कहने का मतलब यह हैं कि न्यूज- न्यूज की तरह ही आनी चाहिये ।पता नहीं ये कैसी पत्रकारिता है,पत्रकार की खासियत ही है कि कम से कम शब्दों में अधिक बात कह देना पर अब  क्या हो रहा है किसी एक समाचार को उठा लिया और उसी को आधा-आधा घन्टे तक रिपीट करते रहते हैं जैसे दर्शक मंद बुद्धि हैं एक बार में तो वह समझ ही नहीं पायेंगे और ऐसा करीब करीब रोज ही होता है ।'
      "हाँ आज देखो न "सलमान के घर गणेश' इस को बार बार दिखा कर बोर कर दिया है ।'
 "पिछले दिनों शिल्पा शेट्टी और गेर के चुम्बन प्रसंग पर हाय तोबा मची रही और मजे की बात यह थी कि जिस प्रसंग की आलोचना की जा रही थी उस चुम्बन के सीन को बार बार परोसा जा रहा था ।' 
   "सब टी आर पी बढाने का चक्कर है ।...मैं तो ऐसे चैनल बदल देता हूँ । चलो तुम यहाँ देख लो मैं लिविंगरूम में टी वी देख लेता हूँ।''
 "अरे वहाँ क्यूँ जाते हो,यह लो रिमोट ..वैसे भी मैं ज्यादा देर टी.वी नहीं देख सकती और इस समय कुछ मेरी पसन्द का आ भी नहीं रहा है।''
   'तो फिर लाओ रिमोट, वैसे भी यार रात को तो बिस्तर पर लेट कर ही टी वी देखने में मजा आता है।''
 "मुझे मालुम है तुम्हें क्या अच्छा लगता है ..तभी तो मैं तुम से कुछ नहीं कहती।बाहर टी वी देखते हुए अपना कुछ काम भी निपटा लेती हूँ।''
  "काम क्या निबटाती हो कुढ़ती रहती हो ।''
 "जो भी हो पर तुम्हारी शान्ति तो भंग नहीं करती ।हाँ जब बहुत जोर से नींद आ रही हो और अपने कमरे  में चैन से सो भी न सकूँ तो क्या मुझे कुढ़ने का भी हक नहीं है ?.
  "नींद आ रही हो तो टी.वी  बन्द कर दो ....नेहा अपने पति के साथ कुछ दिन को आई थी उसके सामने तमाशा करना जरूरी था क्या ?''
  "तमाशा ,मैंने कोई तमाशा नहीं किया । मैंने तो सदा अपनी खुशी बांटी हैं और आँसू चुपचाप पिए हैं।'
 "हाँ मैं ने तो जैसे  तुम्हें खूब रुलाया  ही है ।'
       "मैं ने ऐसा तो नहीं कहा पर यह भी सच है कि मैं ने कभी तुम्हारी बुराई किसी से नहीं की ।नेहा से मैं ने नहीं तुमने ही कहा था कि तुम्हारी दीदी के पास मेरे लिए समय ही नहीं हैं,मुझे यह सुन कर अफसोस हुआ कि जो शिकायत मुझे करनी चाहिए थी वह भी तुम्ही कर रहे हो ...सफाई में अपना पक्ष तो मुझे भी रखना चहिए था या नहीं .... अब तो जैसे हर बिजली के उपकरणों के रिमोट कट्रोल आने लगे हैं काश कोई ऐसा रिमोट भी बन जाए जो मानव मन को भी कन्ट्रोल कर सके तो कितना अच्छा हो ।....लो सम्हालो रिमोट और निश्चिन्त  हो कर टी.वी देखो पर जब मुझे नींद आ रही होगी तो मैं तुम्हारे कहे अनुसार यह टी.वी बंद कर दूँगी तब चिढ़ना नहीं ।''

 
पवित्रा अग्रवाल
 
"उजाले दूर नहीं "   कहानी संग्रह में से एक कहानी

ईमेल --  agarwalpavitra78@gmail.com

मेरे ब्लोग्स --